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नज़रिया: ‘इमरान ख़ान ने चोरों को घर बिठा लिया है’
- Author, मुहम्मद हनीफ़
- पदनाम, बीबीसी पंजाबी के लिए
पाकिस्तान की सबसे पुरानी फ़िल्म 'शक्तिया' का नया प्रिंट आ गया है. इस फ़िल्म का हीरो शुरू से ही इमरान ख़ान रहा है. जितना प्यार उन्हें मिला उतना किसी पाकिस्तानी को नहीं मिला.
इमरान ख़ान कई साल तक यह कहते रहे कि प्यार की मुझे कोई कमी नहीं है, मुझे वोट दो. अब लोगों ने कहा है कि दिल तो आपको पहले ही दे दिया गया था पर अब वोट भी आपका. इस फ़िल्म का विषय कुछ पुराना-सा लगता है.
इमरान ख़ान को तख़्त पर बिठाने के लिए पुराने हीरो को जेल जाना पड़ा. जिन लोगों का हीरो जेल गया है वह इमरान ख़ान को गाली-गलौज करते हैं और कहते हैं कि उनका मैंडेट चोरी हो गया है.
इमरान ख़ान के नवाज़ शरीफ के ख़िलाफ़ नारा लगाया था, यह भी चोर और इसका पूरा परिवार भी चोर. अब आधा परिवार जेल में है और बाकी कह रहे हैं कि हम शरीफ़ बच्चे हैं और हमारा ज़रा ध्यान रखना.
इमरान ख़ान को प्यार करने वाले कहते हैं कि वह मर्द का बच्चा है और पूरा मोमिन है, वह मंच पर चढ़कर नमाज़ पढ़ लेता है.
जिन्हें इमरान ख़ान हज़म नहीं होता वह कहते हैं कि यह नशेड़ी आदमी है. बात बस इतनी है कि याद रखो, जैसा मुंह वैसी चपेड़. अपने इर्द-गिर्द देखो, आधे नशेड़ी हैं और आधे नमाज़ी हैं बल्कि ज़्यादातर तो दोनों काम कर लेते हैं. नशा भी कर लेते हैं और उसके बाद सजदा करके मुआफ़ी भी मांग लेते हैं.
ठगों से याराना
इमरान ख़ान भ्रष्टाचार ख़त्म करने और चोरों का धंधा चौपट करने चला था पर रास्ते में अक्ल आ गई कि चोरों को पकड़ने के लिए दूसरे चोरों को साथ मिलाना पड़ता है. ठगी को ख़त्म करने के लिए ठगों से याराना लगाना पड़ता है.
एक पुरानी हिंदी फ़िल्म का डायलॉग है कि 'नमाज़ मेरा फ़र्ज़ है और चोरी मेरा पेशा.'
पाकिस्तान की नई और पुरानी फ़िल्म का केंद्रीय नुक्ता यही है. सज्जन रिश्वत लेते हैं और दे भी देते हैं और साथ ही जुगत भी लड़ाते हैं कि सूअर उन्होंने नहीं खाया जिनको मिला नहीं.
चोरी के पैसों से एयर कंडीशन वाला एक-आधा उमरा भी कर लेते हैं. बंगला भी बना लेते हैं और उसके आगे 'हाज़ा मीन फ़ज़्ले रब्बी' भी लिख देते हैं. बाद में एक चोरी की कमाई से बनाए बंगले के बाहर बंदूक़ों वाले गार्ड भी बिठा देते हैं कि कहीं चोर ना आ जाए. चोर को कहां से आना है वह तो घर बैठा है.
इमरान ख़ान ने चोरों से पीछा छुड़ाने के लिए शुद्ध पाकिस्तानी नुस्ख़ा ढूंढा है कि चोरों को घर बिठा लो.
ज़ुलमी लोगों के दिलों में रहम
जिन भाइयों और बहनों को इमरान ख़ान रास नहीं आता वह कहते हैं कि वह तो असली ख़ान नहीं हैं. वह साथ ही कह देते हैं कि वह तो नियाज़ी हैं जैसे नियाज़ी होना ही कोई गाली हो.
मुनीर नियाज़ी का नाम किसने नहीं सुना? जिन लोगों को पंजाबी नहीं आती उनको भी इसकी यह लाइनें ज़रूर याद होंगी, "कुछ उंझ भी राहां औखियाँ सन, कुझ गल्ल विच ग़म का टोंक भी सी. कुझ शहर दे लोक भी ज़ालम सन, कुझ साणु मरण दा शौक भी सी."
इस नज़्म का नाम भी बहुत सुंदर है. इसका नाम है, होणी दे हीले. इससे पहले की कुछ लाइनें भी सुन लें, "जो होया ऐ होणा ही सी, होणी रोक्याँ रुकदी नहीं, एक वारी जदों शुरू हो जावे, गल्ल फिर ऐंवें मुकदी नहीं."
अल्लाह शहर के ज़ुलमी लोगों के दिलों में रहम पैदा करे और हमारे सिरों में पड़ें ग़म के पेच ढीले करे. रब्ब राखा.
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