सऊदी अरब में महिला एक्टिविस्ट के लिए मांगी मौत की सज़ा

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सऊदी अरब में एक महिला अधिकार कार्यकर्ता इसरा अल-घोमघम को मौत की सज़ा दी जा सकती है. सरकारी वकील ने कोर्ट से इसरा और चार अन्य कार्यकर्ताओं के लिए सज़ा-ए-मौत की मांग की है.

ह्यूमन राइट्स वॉच (एचआरडब्ल्यू) के मुताबिक इसरा पर अशांत कातिफ़ प्रांत में सरकार विरोधी प्रदर्शनों में शामिल होने के आरोप लगाए गए हैं.

ये प्रदर्शन शिया समुदाय के ख़िलाफ़ होने वाले भेदभाव के विरोध में किए गए थे.

अगर कोर्ट सरकार के पक्ष में फ़ैसला सुनाती है तो इसरा अल-घोमघोम ऐसे पहली सऊदी महिला होंगी जिन्हें मानवाधिकारों से जुड़े मामलों से जुड़े होने के कारण मौत की सज़ा दी जाएगी.

एचआरडब्ल्यू का कहना है कि अगर ऐसा होता है तो ये जेल में बंद अन्य महिला कार्यकर्ताओं के लिए ख़तरनाक नज़ीर बन जाएगा.

इस साल मई में करीब 13 मनावाधिकार और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया था. इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया गया था.

इनमें से कुछ को छोड़ दिया गया है और कुछ को बिना किसी आरोप के हिरासत में रखा गया है.

दिसंबर से जेल में बंद

सऊदी अरब, महिला अधिकार कार्यकर्ता

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इमेज कैप्शन, इसरा अल-घोमघम के समर्थकों ने उनके बचपन की तस्वीर जारी की है.

एचआरडब्ल्यू ने कहा है कि इसरा को साल 2011 में कातिफ़ में हुए विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने के लिए जाना जाता है.

इन विरोध प्रदर्शनों में सुन्नी नेतृत्व वाली सरकार में शियाओं के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर शिया समुदाय के लोग सड़कों पर उतरे थे.

इसरा और उनके पति को कथित तौर पर दिसंबर 2015 में गिरफ़्तार किया गया था और तब से वो जेल में ही बंद हैं.

एचआरडब्ल्यू के मुताबिक, ''सरकारी वकील ने इसरा और चार अन्य एक्टिविस्ट पर कातिफ़ में हुए ​विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने, विरोध के लिए उकसाने, शासन के विरुद्ध नारेबाज़ी करने, जनता को भड़काने, विरोध प्रदर्शन की वीडियो बनाने व उसे सोशल मीडिया पर चलाने और दंगाइयों को नैतिक समर्थन देने का आरोप लगाया है.''

इन आरापों के आधार पर सरकारी अधिवक्ता ने इसरा के लिए मौत की सज़ा की मांग की है.

सऊदी अरब

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'फांसी की सजा क्रूरता'

इस मामले पर एचआरडब्ल्यू की मध्य एशिया निदेशक सारा लेया विटसन ने फांसी की सज़ा को भयावह बताया है.

उन्होंने कहा, ''हिंसा में शामिल न रहने वाली इसरा अल-घोमघम जैसी कार्यकर्ताओं के लिए फांसी की सज़ा क्रूरता दिखाना है. सऊदी राजशाही की निरंकुश तानाशाही अपनी पब्लिक रिलेशन टीम के लिए अपने सहयोगियों और अंतरराष्ट्रीय कारोबारियों के सामने 'सुधार' की काल्पनिक कहानियों का प्रचार मुश्किल बनाती जा रही है.''

मानवाधिकारों के लिए यूरोपीय सऊदी संस्थान और एक लंदन आधारित सऊदी मानवाधिकारी समूह एलक्यूएसटी ने सऊदी सरकार से इसरा के ख़िलाफ़ आरोप वापस लेने की मांग की है.

हालांकि, सरकार ने इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं की है.

इससे पहले भी सऊदी अरब में कई शिया कार्यकर्ताओं को फांसी की सज़ा सुनाई जा चुकी है. मानवाधिकार समूह इसका विरोध करते हुए कार्यकर्ताओं पर लगे आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते आए हैं.

अधिकारियों का कहना है कि जिन लोगों को फांसी की सज़ा दी गई है वो आतंकवादी संबंधी अपराधों में दोषी पाए गए थे. जिसमें सरकार के ख़िलाफ़ हथियार उठाना और सुरक्षा बलों पर हमला करना शामिल है.

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