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किम-ट्रंप मुलाकात के बाद क्या कुछ बदला है उत्तर कोरिया में
- Author, आंद्रियाज़ इल्मर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर कोरिया की सड़कों पर बदलाव के संकेत दिखने लगे हैं.
हाल के महीनों में दुनिया के सबसे अलग-थलग देश उत्तर कोरिया ने अपने प्रोपेगैंडा अभियान को थोड़ा नरम किया है.
राजधानी प्योंगयांग और अन्य शहरों में लगाए जाने वाले पोस्टरों और बैनरों में अमरीका को एक साम्राज्यवादी आक्रमणकारी और दक्षिण कोरिया और जापान को उसके सहयोगियों के तौर पर दिखाया जाता था.
लेकिन हाल के दिनों में उत्तर कोरिया गए लोग दावा कर रहे हैं कि अब दीवारों पर की गई चित्रकारी (भित्तिचित्र), विज्ञापनों, संकेतों और पोस्टरों में ये जगह आर्थिक विकास और कोरियाई मेल-मिलाप ने ले ली है.
बदलाव यहीं ख़त्म नहीं होते.
कई विश्लेषक मानते हैं कि सरकार के नियंत्रण में रहने वाली उत्तर कोरियाई मीडिया ने भी अपने सुर बदल लिए हैं.
कैसे बदले हैं उत्तर कोरिया के सुर
तो क्या अब अमरीका को उत्तर कोरिया में दुश्मन के तौर पर नहीं दिखाया जा रहा है?
उत्तर कोरिया की अधिकतर आबादी की सूचनाओं तक पहुंच बेहद सीमित है. इसलिए यहां सरकारी मीडिया और प्रोपेगैंडा का लोगों पर असर दुनिया के किसी भी हिस्से के मुक़ाबले ज़्यादा होता है.
यहां पारंपरिक रूप से अमरीका को दुश्मन नंबर एक दर्शाया जाता रहा है. प्रोपेगैंडा में बताया जाता रहा है कि अमरीका के हमले का उत्तर कोरिया कैसे जवाब देगा. उत्तर कोरियाई मिसाइलें और अभेद्य सैन्य दल आक्रमणकारियों को नेस्तनाबूद करते दिखते रहे हैं.
दशकों से ये पोस्टर लोगों में देश प्रेम और अपने नेता में लोगों का भरोसा पैदा करते रहे थे. आम लोगों को ये बताया जाता रहा था कि युद्धभूमि में जान देना देश के लिए सबसे बड़ा योगदान है.
ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफ़िथ यूनिवर्सिटी के आंद्रे अब्राहम कहते हैं, "उत्तर कोरिया में सख़्त संदेश देने वाले पोस्टर तब ही लगाए जाते हैं जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीज़ें ठीक नहीं चल रही होती हैं."
ऐसे में जब समय सकारात्मक हो तो प्रोपेगैंडा में भी नरमी आएगी और अब ऐसा लग रहा है कि उत्तर कोरिया के लिए समय ठीक चल रहा है.
महीनों तक चली युद्ध की ललकारों के बाद, उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया और अमरीका के साथ ऐतिहासिक सम्मेलन करने में कामयाब रहा और भले ही कच्ची भाषा में ही सही, अपने बेशक़ीमती परमाणु हथियारों को छोड़ने और शांति के लिए काम करने का उसने वादा भी किया.
प्रोपेगैंडे में आया बदलाव सिर्फ़ राजधानी प्योंगयांग तक ही सीमित नहीं है.
विदेशी पर्यटकों को घुमाने वाले गाइड बताते हैं कि प्रोपेगैंडे की भाषा में अलग बदलाव दिख रहा है.
आक्रमक भाषा के बजाए अब ज़ोर सकारात्मक संदेशों पर है. अप्रैल में किम जोंग उन और दक्षिण कोरिया के नेता मून जे इन के बीच हस्ताक्षरित पनमुनजोम घोषणापत्र अब अब कार्यरूप में नज़र आ रहा है.
यंग पायनियर टुअर्स के मैनेजर रोवन बियर्ड ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, "आमतौर पर किम इल सुंग चौक और स्टोरों में दिखने वाले अमरीका विरोधी पोस्टर अब ग़ायब हैं. उत्तर कोरिया में मुझे काम करते हुए पांच साल हो गए हैं. मैंने पहली बार इन पोस्टरों को नदारद देखा है."
नया प्रचार
पुराने पोस्टरों की जगह नए पोस्टरों ने ले ली है. लेकिन छद्म प्रचार में वो पहले वाले पोस्टरों से कम नहीं हैं.
हालांकि इन पोस्टरों में अलग समय को दर्शाया गया है. कोरियाई प्रायद्वीप के मिलन, आर्थिक विकास और वैज्ञानिक उपलब्धियों को इनमें दिखाया गया है.
एनके न्यूज़ से जुड़े पत्रकार फ़्योदोर तेरतित्सकी कहते हैं, "उत्तर कोरिया को शांति और आराम के माहौल की ज़रूरत है और ऐसे पोस्टर इसे पैदा करने में मदद करते हैं."
यही नहीं पर्यटकों को बेची जाने वाली अमरीका विरोधी सामग्री में भी अब बदलाव हो रहा है.
अब यहां आप वॉशिंगटन पर हमला करती उत्तर कोरियाई मिसाइलों के पोस्टकार्ड या लेबल नहीं ख़रीद सकते हैं.
देश के मुख्य राष्ट्रीय अख़बार रोडोंग सिनमुन में भी राष्ट्रीय नीति में हुआ बदलाव नज़र आता है.
बदले मीडिया के भी सुर
उत्तर कोरिया में स्वतंत्र प्रेस नहीं है. सभी तरह की मीडिया पर सरकार का कड़ा नियंत्रण है और प्रकाशित या प्रसारित होने वाली हर सामग्री पर सरकार कड़ी नज़र रखती है.
आमतौर पर इस अख़बार में अमरीका विरोधी ख़बरें प्रकाशित होती रहती हैं. अमरीका को दुश्मन बताकर और सीरिया युद्ध जैसे संघर्षों में उसकी भूमिका पर लेख लिखे जाते हैं.
लेकिन 12 जून को अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और किम जोंग उन के बीच मुलाक़ात से पहले अख़बार ने अपने सुर बदल लिए और अमरीका की आलोचना बंद कर दी.
सम्मेलन के दौरान अख़बार में किम जोंग उन को विश्व नेता के तौर पर दिखाया गया और अमरीका और उत्तर कोरिया के बीच रहे तनाव का कोई ज़िक्र नहीं किया गया. ट्रंप और किम की मुलाक़ात की तस्वीरों को प्रकाशित किया गया.
एनके न्यूज़ के विश्लेषक और उत्तर कोरिया मामलों के विशेषज्ञ पीटर वार्ड कहते हैं, "अब उत्तर कोरिया में अमरीका को एक सामान्य देश के तौर पर दिखाया जाने लगा है. उत्तर कोरिया के लिए शत्रुतापूर्ण माने जाने वाले अमरीका के सभी कृत्यों के संदर्भ अब अख़बारों से ग़ायब हैं."
इसी सप्ताह अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद से इस्तीफ़ा दे दिया. पीटर वार्ड के मुताबिक उत्तर कोरिया के अख़बारों में इस ख़बर को तटस्थता से छापा गया.
वो कहते हैं, "ये नई बात है. सामान्य तौर पर उत्तर कोरिया में सकारात्मक या तटस्थ कवरेज उन देशों की ही की जाती है जिन्हें उत्तर कोरिया अपना दोस्त मानता है."
लेकिन अभी कोई भी इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं है कि उत्तर कोरिया के सुरों में जो ये बदलाव आया है ये बस कुछ समय के लिए ही है या स्थाई है.
सवाल ये भी उठ रहा है कि पोस्टरों और बैनरों से परे क्या आम उत्तर कोरियाई लोगों के जीवन में कोई बदलाव आ सकेगा?
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