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क्या खाने का ज़ायका मिटाएगा दोनों कोरिया का मतभेद
सालों से कूटनीति और राजनेताओं की अहम बैठकों में खाना महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है. कहीं कैवियर (मछली के अंडों से बना व्यंजन) नहीं पसंद किया गया तो कभी राष्ट्रपति ने उल्टी कर दी.
विश्व के बड़े नेता और राजनेता लगातार घंटों तक काम करते रहते हैं, मुश्किल मुद्दों पर बहस करते हैं, उनका काफी वक्त लोगों से बात करते गुज़रता है और कई बार रात-रात भर वो सो तक नहीं पाते. लेकिन आम इंसान की तरह उनके लिए भी खाना ज़रूरी होता है.
इस साल दुनिया की दो बेहद अहम बैठकें होने वाली हैं और बैठक के बाद खाने में क्या-क्या परोसा जाएगा- ये तय करने में काफ़ी मशक्कत भी की गई है.
इस सप्ताह उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन की मुलाक़ात दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे इन से होने वाली है जो दोनों देशों के बीच साल 2007 के बाद होने वाली पहली औपचारिक बैठक है.
इस दौरान मून जे इन को सादी समुद्री मछली परोसी जाएगी जो उन्हें अपने बंदरगाह वाले शहर बुसान की याद दिलाएगी. साथ ही आलू और बटर से बनी कुरकुरी स्विस रोस्टी भी परोसी जाएगी जो किम जोंग उन के लिए उनके स्कूली दिनों की यादें ताज़ा करेगी. बताया जाता है कि किम जोंग-उन ने अपनी पढ़ाई स्वि़ट्ज़रलैंड की बर्फ़ीली वादियों में स्थित एक जर्मन स्कूल से की थी.
भोजन का कूटनीति में महत्व
इस सप्ताह फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अपने पहले अमरीकी दौरे पर डोनल्ड ट्रंप से मुलाक़ात की है. ट्रंप के कार्यकाल में किसी फ़्रांसीसी नेता की ये पहली अमरीकी यात्रा है. इस मौक़े पर फ़्रांसीसी टच के साथ अमरीका का बेहतरीन खाना उन्हें परोसा गया.
किम जोंग-उन को फ्रेंच चीज़ और वाइन पसंद है. उन्हें खाने में ये परोसना दक्षिण कोरिया की उनके साथ रिश्ते बेहतर करने की कोशिश हो सकती है?
कूटनीतिक रिश्तों में भोजन के महत्व में विशेषज्ञता रखनेवाली और अमरीकी विश्वविद्यालय में ऐडजंक्ट प्रोफ़ेसर जोआना मेंडलसन-फ़ॉर्मेन कहती हैं, "ये कूटनीति का अहम हिस्सा है."
रिसर्च सलाहकार सैम चैपल सोलोक कहते हैं कि सम्मेलनों में मेहमानों को जो खाना परोसा जाता है, सही मायनों में वो सकारात्मक चर्चा को आगे बढ़ाने की दिशा में होता है और, "पूरा मेन्यू आकर्षक होता है."
"चूंकि ये उत्तर और दक्षिण कोरिया के एकजुट होने और दोस्ती करने की बारे में है, इसीलिए ये आपस में जोड़ने वाला मेन्यू होगा. इसका उद्देश्य ये होगा कि दोनों देश मेज़ पर एक साथ आने के लिए प्रेरित हों."
सैम चैपल सोलोक कहते हैं कि उत्तर कोरियाई सरकार ने कभी भी आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की कि किम जोंग-उन कभी स्विट्ज़रलैंड में रहे थे और इसीलिए, "ये एक जुए की तरह है और खाने का मेन्यू बनाने वालों ने स्विस डिश परोसने का इरादा अपनी जानकारी के आधार पर लिया है."
वो कहते हैं, "किसे पता उन्होंने शायद ये पहले कभी ना खाया हो या फिर शायद उन्हें फ़ोंडे (स्विस चीज़ से बना पकवान) या फिर रैकलेट (आलू और रैकलेट चीज़ से बना पकवान) अधिक पसंद हो."
मेज़ पर भी बिगड़ सकती है बात
पूर्व अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने एक बार खाने के बारे में कहा था कि ये "कूटनीति का सबसे पुराना हथियार है." सोकोल बताते हैं कि आपसी संबंध बेहतर करने के उद्देश्य से इसका इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन हमेशा चीज़ें योजना के अनुरूप नहीं होतीं.
साल 1992 में अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश अपने एशिया दौरे के दौरान जापान गए थे. यहां राजकीय भोज में उन्हें सेकंड कोर्स में कच्ची सालमन मछली, कैवियर ((मछली के अंडों से बना व्यंजन) परोसा गया और थर्ड कोर्स में चटपटी चटनी के साथ ग्रिल्ड बीफ़ परोसा गया. वो पहले राष्ट्रपति थे जिन्होंने जापानी प्रधानमंत्री के साथ भोज के दौरान उल्टी कर दी थी.
अमरीकी मीडिया में उनकी तबीयत को लेकर बातें हुईं, लेकिन खाने की आलोचना नहीं की गई बल्कि इसे 'फ़्लू का असर' बताया गया.
सोकोल कहते हैं, "इसके पीछे किसी की बुरी मंशा नहीं थी, लेकिन इससे मामला कई साल पीछे हो गया और आज भी जापान में लोग उनके बारे में मज़ाक करते हैं."
खाने से जुड़े कई और दिलचस्प वाकये हैं.
फ़्रांस के राष्ट्रपति फ़्रांस्वा ओलांद के सम्मान में एक बार पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भोज का आयोजन किया था. व्हाइट हाउस ने जो मेन्यू बनाया उसमें इलिनॉय से मंगाया कैवियर पेश किया गया. एक राजकीय भोज में इसकी उम्मीद नहीं की जाती. लेकिन ओलांद सोशलिस्ट सरकार से जुड़े थे और उन्होंने किसी तरह का विवाद ना करते हुए "महंगे कैवियर" के बारे में कुछ नहीं कहा. सोकोल कहते हैं कि उनके देश में इस बात को सकारात्मक नज़रिए से नहीं देखा गया होगा.
खाने की मेज़ पर हुए समझौते
विश्लेषक मारिया वेलेज़ डे बर्लिनर मानती हैं कि "खाना बेहद ताक़तवर हथियार का काम कर सकता है. जिसके हाथ खाना परोसने की कुंजी होती है मेज़ का कंट्रोल भी उसके पास होता है."
ब्रितानी प्रधानमंत्री मार्ग्रेट थैचर से जुड़े 1979 के एक वाकये ने इस बात को साबित कर दिया. फ़्रांसीसी राष्ट्रपति जिसकार्ड डी'स्तां के साथ होने वाली यूरोपीय काउंसिल की एक बैठक में उन्होंने डिनर से पहले फ़ैसले के बारे में सोचने से इनकार कर दिया था.
जैसे-जैसे शाम बढ़ी, डिनर की मेज़ पर उन्होंने जिसकार्ड डी'स्तां को अपने प्रस्तावों के प्रति और सकारात्मक रुख़ अपनाने के लिए राज़ी कर लिया.
मेंडलसन-फ़ॉर्मेन कहती हैं कि कूटनीतिक मामलों में दूरी कम करने में भी खाना अहम भूमिका निभाता है. वो कहती है, "इससे लोगों के बीच बातचीत बढ़ती है जिससे मतभेद ख़त्म करने से जुड़ी बातचीत की संभावना बनती है."
न्यू यॉर्कर के अनुसार साल 2015 में ईरान से परमाणु समझौते के दौरान 20 महीनों तक बातचीत चलती रही, तनाव की स्थिति थी और दांव पर काफी कुछ था और कम से कम पांच बार बातचीत बेनतीजा रह चुकी थी.
मध्यस्थ हमेशा अलग-अलग खाना खाते थे, लेकिन अमरीकी स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर 4 जुलाई को उन्होंने एक साथ भोजन किया. ईरानियों ने दोनों पक्षों को तनाव कम करने के लिए खाने का न्योता दिया. मेंडलसन-फ़ॉर्मेन कहती हैं, "ये पहली बार था जब अमरीकियों और ईरानियों ने एक-दूसरे को अलग नज़र से देखा."
बर्लिनर उनकी बात से सहमत हैं. वो कहते हैं, "पहले वो एक-दूसरे को केवल मध्यस्थ मान रहे थे, लेकिन इसके बाद वो एक-दूसरे को आम लोगों की तरह देखने लगे."
दस दिनों के भीतर ही समझौते पर सहमति बन गई और दोनों विशेषज्ञ संतुष्ट हो गए कि इसमें फ़ारसी भोजन की अहम भूमिका रही जो दोनों ने साथ में किया था.
हो सकता है कि खाने से जुड़ी ये सकारात्मकता इस सप्ताह और आगे भविष्य में भी ऐसे ही बनी रहेगी.
अगली अहम मुलक़ात अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग-उन की होगी. इस दौरान उनकी मेज़ पर ऐसा क्या होगा कि तनाव ख़त्म हो जाए- इस पर सब की नज़र रहेगी?
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