सीरिया की ज़मीन पर हमला करने वाले कौन हैं ये तेरह देश

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सीरिया में जो चल रहा है वो कई लोगों के लिए 'मिनी वर्ल्ड वार' जैसा है, यानी एक छोटा-मोटा विश्व युद्ध.
सीरिया में सात सालों से जंग चल रही है और इसके गृह युद्ध में 20 देश किसी न किसी तरह से शामिल रहे हैं.
सीरिया में विद्रोहियों के नियंत्रण वाले डूमा शहर में संदिग्ध रासायनिक हमलों के बाद दुनिया अमरीका की जवाबी कार्रवाई का इंतज़ार कर रही थी.
अमरीका की इस कार्रवाई में फ्रांस और ब्रिटेन उसका साथ दे रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि सीरिया पर हाल के सालों में केवल इन्हीं तीन देशों ने हमला किया हो.
हम यहां सीरिया पर हमला करने वाले देशों की लंबी लिस्ट दे रहे हैं.

रूस
सोवियत संघ के ज़माने से रूस, सीरिया का साथ दे रहा है.
रूस का असर सीरिया पर आज भी है और व्लादिमीर पुतिन की सरकार ने हथियारों और अन्य साजोसामान से बशर अल-असद की हुकूमत को बचाने का भरोसा दिलाया है.
सीरिया के मोर्चे पर रूस ने सितंबर, 2015 में कदम रखा और इसके बाद से ही वहां के हालात राष्ट्रपति बशर अल-असद के पक्ष में बन गए थे.
रूस का कहना है कि उसने विद्रोहियों के साथ-साथ खुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले चरमपंथी संगठन के ठिकानों पर भी बमबारी की है.
लेकिन संयुक्त राष्ट्र के एक जांच आयोग ने रूस के दावों का खंडन करते हुए कहा कि उसके हमलों में बड़ी तादाद में आम लोग हताहत हुए.

अमरीका
सीरिया में गृह युद्ध शुरू होने के बाद से वहां के विद्रोही संगठनों को अमरीकी मदद मिलती रही है.
साल 2013 में भी सीरिया की सरकार पर रासायनिक हमलों को अंज़ाम देने का आरोप लगा था.
लेकिन तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सीरिया पर कोई जवाबी कार्रवाई नहीं की थी.
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साल 2014 में पश्चिमी देशों और खाड़ी क्षेत्र के उनके सहयोगियों ने इस्लामिक स्टेट के ठिकानों पर 11,000 से ज़्यादा बार हमले किए.
साल 2017 में राष्ट्रपति ट्रंप ने सीरियाई नागरिकों पर संदिग्ध रासायनिक हथियारों से हमले के बाद उसके हवाई ठिकानों पर मिसाइल हमले के आदेश जारी कर दिया.
अप्रैल 2018 में डूमा में संदिग्ध केमिकल अटैक का मामला सामने आया और इसके बाद ट्रंप ने जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी.

ब्रिटेन
साल 2015 से ही ब्रितानी एयरफोर्स के फाइटर प्लेन्स सीरिया में इस्लामिक स्टेट के ठिकानों पर हमला जारी रखे हुए हैं.
ब्रिटेन ने तेल के उन तेल कुओं को भी निशाना बनाया है जो इस्लामिक स्टेट के कब्ज़े में हैं.
साल 2013 में जब दमिश्क के पूर्वी इलाके में संदिग्ध केमिकल अटैक का मामला सामने आया तो ब्रिटेन राष्ट्रपति असद के फौजी ठिकानों पर हमले के बारे में सोच रहा था.
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लेकिन उस वक़्त ब्रितानी संसद में इस मसले पर वोटिंग हुई और इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया.
हाल में जब डूमा में एक बार फिर से केमिकल अटैक का मामला आया तो ब्रितानी प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे ने घोषणा की, "इसे बिना सज़ा दिए नहीं छोड़ा जाएगा."

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फ्रांस
फ्रांस साल 2013 से ही सीरिया के विद्रोही संगठनों को हथियार मुहैया कराता रहा है और 2015 से इस्लामिक स्टेट के ठिकानों पर हवाई हमलों में उसकी भागीदारी रही है.
सीरिया के साथ फ्रांस के ऐतिहासिक संबंध रहे हैं. सीरिया के गृहयुद्ध की शुरुआत के समय से ही इसके नतीज़ों में फ्रांस की गहरी दिलचस्पी रही है.
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फ्रांस राष्ट्रपति बशर अल-असद की सरकार को समर्थन नहीं देता है.
जब 2013 में सीरियाई सेना के ठिकानों पर हवाई हमलों की बात हुई थी तो फ्रांस की सरकार ने मुखर होकर इसका समर्थन किया था.
मौजूदा राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी सीरिया में सैनिक कार्रवाई के पक्षधऱ रहे हैं.

कनाडा
सीरिया में इस्लामिक स्टेट के ठिकानों पर बमबामी करने वाले अमरीकी गठबंधन में कनाडा भी शामिल था.
साल 2016 में जब कनाडा में जस्टिन ट्रूडो की सरकार बनी तो कनाडा अमरीकी गठबंधन के अभियान से बाहर निकल गया.
जस्टिन ट्रूडो ने घोषणा की थी कि उनका देश सीरिया पर अमरीकी हमलों में हिस्सा नहीं लेगा.

ऑस्ट्रेलिया
कनाडा की तरह ही ऑस्ट्रेलिया भी इराक़ और सीरिया में इस्लामिक स्टेट के ठिकानों पर अमरीकी हमलों में शामिल हुए थे.
ऑस्ट्रेलिया ने जिन हमलों में भाग लिया था, उन्हीं में से एक में ग़लती से 90 सीरियाई सैनिक मारे गए थे.
इन सीरियाई सैनिकों को इस्लामिक स्टेट का चरमपंथी समझ लिया गया था. प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल ने इस वाकये के लिए माफी भी मांगी थी.

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नीदरलैंड्स
सितंबर, 2014 में नीदरलैंड्स ने ये तय किया कि वो इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ चल रही सैनिक कार्रवाई में शामिल होगा.
साल 2015 तक इराक़ में इस्लामिक स्टेट के ठिकानों पर नीदरलैंड्स ने अपने एफ़-16 लड़ाकू विमानों के जरिए सैकड़ों हवाई हमलों को अंज़ाम दिया.
सीरिया में भी नीदरलैंड्स ने अपनी सैनिक मौजूदगी दर्ज कराई है.
साल 2016 में नीरदलैंड्स ने ये तय किया कि वो सीरिया और इराक़ के बीच मौजूद इस्लामिक स्टेट की सप्लाई लाइन पर हमले की कार्रवाई तेज़ करेगा.

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ईरान
ईरान एक शिया मुल्क है और इस वजह से सीरिया में उसकी ख़ास दिलचस्पी है. सीरिया सुन्नी शासन वाले सऊदी अरब के असर में नहीं रहा है.
बशर अल-असद की सरकार को सीरिया सैन्य मदद के अलावा साज़ोसामान और आर्थिक सहायता मुहैया कराता रहा है.
इतना ही नहीं ईरान ने अपनी ज़मीन पर से सीरिया के विद्रोही संगठनों के ठिकानों पर मिसाइल हमले किए हैं.

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तुर्की
तुर्की की सरकार ने सीरिया के उत्तरी इलाके में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है.
हालांकि तुर्की राष्ट्रपति असद की सरकार का विरोध करता है और वो खुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले चरमपंथी संगठन के भी ख़िलाफ़ है.
लेकिन वो ये भी नहीं चाहता कि उसकी सीमा से लगे सीरियाई इलाकों में कुर्द धड़े मजबूत हों.
सीरिया के आफरीन में तुर्की ने कुर्द संगठन वाईपीजी के ख़िलाफ़ सक्रिय लड़ाई है और उत्तरी सीरिया में बमबारी भी की है.

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सऊदी अरब
सीरिया में ईरान के असर का मुखर होकर विरोध करने वाले देशों में सऊदी अरब सबसे प्रमुख है.
बशर अल-असद की सरकार के ख़िलाफ़ लड़ रहे विद्रोही संगठनों को सऊदी अरब बड़ी तादाद में हथियार मुहैया कराता रहा है.
इतना ही सऊदी अरब विद्रोही संगठनों को रणनीतिक खुफिया जानकारी और अन्य किस्म की मदद भी देता है.
साल 2104 में सऊदी अरब ने अमरीका के साथ मिलकर सीरिया में इस्लामिक स्टेट के ठिकानों पर आठ हवाई हमले किए थे.
सीरिया में कथित रासायनिक हमलों के बदले की कार्रवाई में अमरीका और फ्रांस की बमबारी को सऊदी अरब का समर्थन हासिल रहा है.

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इसराइल
सीरिया के गृहयुद्ध के दौरान इसराइल के लड़ाकू विमान सीरिया के आसमान में दाखिल हुए थे.
हालांकि इसराइल लंबे समय सीरिया के मामले में तटस्थ रहा है लेकिन उसे भी ईरान के प्रभाव पर एतराज रहा है.
इसराइल का मानना है कि लेबनान में उसके सबसे बड़े दुश्मन हेज़बुल्ला को सीरिया में ईरान के दखल से ताकत मिलती है.
ईरान और हेज़बुल्ला से जुड़े काफिलों पर इसराइल ने 100 से ज़्यादा बार बमबारी कर चुका है.
इसी साल फरवरी में सीरिया की एंटी-मिसाइल सिस्टम ने एक इसराइली फाइटर प्लेन को गिरा दिया था.
इसराइल सीरिया के 12 ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले कर चुका है.

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बहरीन और जॉर्डन
मध्यपूर्व के ये दो देश सीरिया पर बमबारी से जुड़े रहे हैं.
जॉर्डन ने हवाई हमलों में शामिल होने का फ़ैसला उस वक्त किया जब इस्लामिक स्टेट ने खुलकर उसके किंग अब्दुल्ला को सत्ता से बेदखल कर देने की धमकी दी.
इस्लामिक स्टेट ने जॉर्डन की सीमावर्ती इलाकों में रॉकेट से हमले किए.
साल 2014 में उसने जॉर्डन के एक सैनिक विमान को मार गिराया, पायलट को गिरफ़्तार कर लिया गया और उसे ज़िंदा जला दिया गया.
साल 2015 में बहरीन भी सीरिया में इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ सैनिक कार्रवाई में शामिल हो गया था.

सीरिया में दखल देने वाले दूसरे देश
इन तेरह देशों के अलावा जर्मनी, नॉर्वे, लीबिया और इराक़ जैसे देशों ने भी सीरिया में सैनिक कार्रवाई में हिस्सा लिया है.
जर्मनी ने सीरिया में अपने 1200 सैनिक तैनात किए थे. दुनिया के किसी देश में जर्मन फौज की ये सबसे बड़ी तैनाती थी.
नॉर्वे सीरिया के मोर्चे पर अमरीका के साथ है, वो विद्रोही धड़ों को ट्रेनिंग और अन्य किस्म की मदद मुहैया कराता है.
कर्नल गद्दाफी के पतन के बाद लीबिया ने भी विद्रोही संगठनों के पक्ष में साल 2011 में अपने सैनिक सीरिया भेजे थे.
इराक़ को भी इस्लामिक स्टेट से समस्या रही है और उसने अमरीका की मर्जी के ख़िलाफ़ बशर अल-असद के समर्थन में ईरान के प्लेन को अपनी वायुसीमा से गुजरने की इजाजत दी थी.
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