क्या चीन दांत है और उत्तर कोरिया होंठ?

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- Author, अंकिता पांडा
- पदनाम, फेडरेशन ऑफ़ अमरीकन साइंटिस्ट के वरिष्ठ सदस्य
चीन के सरकारी मीडिया ने इस बात की पुष्टि की है कि बुधवार सुबह येलो रिवर के पार से एक बख्तरबंद ट्रेन पर सवार होकर बीजिंग में पहुंचा वो रहस्यमयी आगंतुक कोई और नहीं बल्कि किम जोंग उन थे.
2011 में सत्ता में आने के बाद किम जोंग की यह पहली ज्ञात विदेश यात्रा है.
6 साल से अधिक की राजनीतिक सफ़ाई, आंतरिक शक्ति के एकीकरण के साथ परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल प्रौद्योगिकी की सफलताओं के बाद किम चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बुलावे पर अपने देश से बाहर निकले.
सामान्य परिस्थितियों में इस तरह की यात्रा को किम के आत्मविश्वास के रूप में देखा जाएगा- जब उत्तर कोरियाई सत्ता पर उनकी मजबूत पकड़ हो गई तो उन्हें लगा कि वो देश से बाहर जाने के लिए अब तैयार हैं.

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उत्तर कोरिया के लिए चीन कितना अहम
एक अपेक्षाकृत कम सुदृढ़ नेता के रूप में किम के मन में विदेश जाने की स्थिति में अपनी सत्ता के ख़िलाफ़ चुनौती मिलने और यहां तक कि तख्तापलट का डर रहा होगा.
लेकिन क्या अब किम देश से बाहर जाने को लेकर इतने आश्वस्त हैं? शी के बगल में खड़े किम को राजनेता की भूमिका निभाते देखा गया. शी ख़ुद एक परमाणु संपन्न देश के नेता और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं.
चीन के संविधान में आए हालिया बदलाव के बाद किम की ही तरह शी भी जीवन भर अपने देश का नेतृत्व करेंगे, इसलिए इन दोनों के आपसी संबंध मायने रखते हैं.
चीन ने किम की इस यात्रा के बाद अमरीका को इसकी सूचना दी, यह उत्तर पूर्वी एशिया में किम की सबसे आकर्षक व्यक्ति की स्थिति को बताता है.
उत्तर कोरियाई नेता परमाणु हथियारों को अपने देश की प्रतिष्ठा और सम्मान के रूप में देखते हैं, उनकी यह चीन यात्रा उसी को रेखांकित करती है.

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लेकिन किम की इस यात्रा की समीक्षा में हम अंतरराष्ट्रीय हालात को अलग नहीं कर सकते, जो बहुत स्वाभाविक है.
नए साल के संबोधन में किम ने अपने परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों के संपन्न होने की घोषणा की थी. किम ने दक्षिण कोरिया के साथ आने की पहल को भी स्वीकार किया. यह प्रक्रिया अब भी चल रही है.
गुरुवार को दोनों कोरियाई देशों के दूत एक एजेंडे पर सहमति को लेकर फिर मिलेंगे ताकि अप्रैल के अंत में दोनों देशों के बीच बातचीत हो सके. किम जोंग-उन दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जे-इन से अप्रैल में मिलने वाले हैं.
अमरीका-उत्तर कोरिया के बीच होने वाली बैठक सही रास्ते पर है. दक्षिण कोरियाई दूतावास ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को किम जोंग उन का निमंत्रण सौंपा है. इसमें कोरियाई प्रायद्वीप में परमाणु निरशस्त्रीकरण के लिए मिल कर वार्ता करने का प्रस्ताव है.
इन सब के बीच चीन स्पष्ट तौर पर अनुपस्थित रहा है.

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चीन, उत्तर कोरिया की परस्पर निर्भरता
एक क्षेत्रीय शक्ति और उत्तर कोरिया के एकमात्र सहयोगी और प्रमुख व्यापार ताक़त के रूप में चीन उत्तर कोरिया में एक अहम राजनीतिक प्रभाव रखता है. यह रिश्ता इस तरह का है कि एक बार माओत्से तुंग ने इसे 'दांत और होठ' जितने क़रीब बताया था. यह दोनों की निकटता और परस्पर निर्भरता को दर्शाता है.
2013 से अधिकतर विश्लेषकों ने दोनों देशों के बीच परस्पर अलगाव के संकेत देखे हैं. किम जोंग उन ने कभी द्विपक्षीय संबंधों के प्रबंधन के विशेषज्ञ के रूप में देखे जाने वाले अपने मामा जांग सांग थाक को मरवा दिया था.
चीन के कुछ ख़ास आयोजनों के दौरान 2016 और 2017 में भी उत्तर कोरिया ने बैलिस्टिक मिसाइलों के परीक्षण किए. यह परीक्षण तब किया गया जब चीन में 2016 के जी20 शिखर सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा था और 2017 में ब्रिक्स सम्मेलन का उद्घाटन हुआ था.
इस बीच 2017 में, चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उत्तर कोरिया पर कठोर प्रतिबंधों के नए दौरों के लिए मतदान किया.

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आगे है मून जे इन और ट्रंप से मुलाक़ात
उत्तर कोरिया ने इन प्रतिबंधों को अनुचित मानते हुए तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की.
हालांकि इन दोनों पुराने साझेदारों के बीच कटुता वो पर्याप्त वजह नहीं बन सकी कि किम जोंग उन डोनल्ड ट्रंप और मून जे इन से पहले मिलते.
इसके बजाय, किम अपने पिता और दादा की तरह विदेश में अपना पहला गंतव्य बीजिंग को बनाया.
अब उत्तर पूर्वी एशिया में अगले महीने पिटारा खुलेगा. किम को दक्षिण कोरिया और चीन के अधिकारियों दोनों ने परमाणु निरशस्त्रीकरण के लिए बातचीत को तैयार बताया है. लेकिन हमेशा की तरह इसके मायने अमरीका की तुलना में उत्तर कोरिया के लिए अलग है.
उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया शिखर वार्ता की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. हालांकि दक्षिण कोरिया के मून फ़रवरी और मार्च तक संचालक की भूमिका में थे, वो समय अब क़रीब आ गया है.
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