हिंदू मुसलमान तक बन गए, पर नहीं मिली पाकिस्तान में ज़मीन

जीवन सिंह का घर
इमेज कैप्शन, जीवन सिंह के परिवार के पास कई एकड़ ज़मीन थी, उनके पास एक बड़ा मकान और कुछ दुकानें भी थीं, लेकिन अब वो इस दो क़मरे के मकान में रहते हैं
    • Author, मोहम्मद इलियास ख़ान
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुज़फ़्फ़राबाद से

पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में आज भी कई ऐसे परिवार हैं जो अपनी खोई संपत्ति को वापस पाने के लिए लड़ रहे हैं.

70 साल पहले जब भारत का विभाजन हुआ तो इन परिवारों की ज़मीनें, मकान और दुकान, सब पीछे छूट गए.

जीवन सिंह उन्हीं में से एक हैं. उनके पास मुज़फ़्फ़राबाद शहर में नदी के पास आठ एकड़ से ज़्यादा खेती की ज़मीन थी.

इसके अलावा शहर के दक्षिण-पूर्व में स्थित एक गाँव में उनकी इससे भी ज़्यादा ज़मीन थी, जहां वो नाशपाती, सेब, गेहूँ और मक्के की खेती करते थे.

जीवन सिंह के पास शहर में कई दुकानें भी थीं. लेकिन आज जीवन सिंह के पोते बटाई-चौथाई पर खेती करते हैं और मज़दूर बनकर रह गए हैं.

जिस ज़मीन पर जीवन सिंह का परिवार अपना दावा ठोकता है वो दशकों पुरानी क़ानूनी लड़ाई में फंसी हुई है और वो लड़ाई 1947 में बंटवारे के बाद शुरू हुई.

ब्रिटिश भारत (भारत-पाकिस्तान) के राजनीतिक बँटवारे के बाद भड़की धार्मिक हिंसा में कम से कम 10 लाख लोग मारे गए थे और क़रीब सवा करोड़ लोगों को घर-बार छोड़कर विस्थापित होना पड़ा.

पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू और सिख भारत चले आए और उनके पीछे जो ज़मीनें छूट गईं, उन्हें 'खाली संपत्ति' घोषित कर दिया गया.

भारत ने पाकिस्तान चले गए मुसलमानों की ज़मीन के साथ भी यही किया.

पाकिस्तान

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ग़ैर-मुस्लिम आबादी

लेकिन बँटवारे के दौरान कश्मीर के जिन बाशिंदों ने अपने घर छोड़े, उनमें से ज़्यादातर ने किसी देश को नहीं चुना, बल्कि वो भारत और पाकिस्तान के नियंत्रण वाले कश्मीरी इलाक़ों में बने शरणार्थी कैंपों में चले गए थे.

कुछ हिंदू जो पाकिस्तान के निंयत्रण वाले कश्मीर में थे, वो वहीं रहे और उन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया.

लेकिन सत्तर साल बाद भी पाकिस्तान में रह रहे इन कश्मीरी हिंदुओं को उनकी ज़मीनें नहीं मिल पाई हैं.

जीवन सिंह के परिवार के पास अब ले देकर जो है, वो है अदालत का एक फ़ैसला जिसमें कहा गया है कि जीवन सिंह का एक एकड़ से ज़्यादा ज़मीन पर हक़ बनता है.

साल 1947 में ही उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान के पश्तो क़बायलियों ने कश्मीर से भारत का कब्ज़ा हटाने के लिए हमला किया था.

उस वक़्त उनका सबसे बड़ा लक्ष्य भारत की ग़ैर-मुस्लिम आबादी ही थी. हमले में कई हिंदू और सिख परिवार मारे गए थे.

जो बचे थे उन्हें बाद में पाकिस्तान सरकार ने भारत सरकार के साथ 'सिटिज़न एक्सचेंज' प्रोग्राम के तहत भारत भेज दिया था.

उसके बाद इन लोगों की तक़रीबन दो लाख एकड़ इलाक़े में फैली ज़मीन को पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर घोषित कर दिया गया.

साथ ही आदेश किए गए कि इस ज़मीन को ज़रूरतमंद लोगों के बीच बाँट दिया जाए.

फ़ाइल फ़ोटो

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कबायली हमलावर

21 अक्टूबर, 1947 की सुबह जब पश्तो क़बायलियों के हमले की ख़बर आई तो जीवन सिंह के पास अपनी पत्नी और तीन बच्चों की जान बचाने के लिए उन्हें पास के गुरुद्वारे में छिपाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.

जीवन सिंह के पोते मुनीर शेख, जो अब ख़ुद 40 वर्ष के हैं, उन्होंने उस दिन की घटना के बारे में कई बार अपने पिता से सुना है.

वो बताते हैं कि उनके दादा पूरे परिवार को गुरुद्वारे में छिपाकर, बाकी सिख पुरुषों के साथ शहर को बचाने के लिए निकले थे.

लेकिन उस दिन के बाद जीवन सिंह कभी नहीं लौटे. जब कबायली हमलावर श्रीनगर की ओर बढ़े गए तो जीवन सिंह की पत्नी बसंत कौर अपने पति को ढूंढने निकलीं.

बसंत कौर ने देखा कि उनके तहस-नहस हो चुके घर में लाशें भरी पड़ी हैं.

इसके बाद ये मानते हुए कि उनके पति की हत्या हो चुकी है, बसंत कौर मुज़फ़्फ़राबाद से क़रीब 18 किलोमीटर उत्तर में स्थित परसोनचा गाँव में जा बसीं.

उनके लिए बच्चों की सुरक्षा सबसे ज़रूरी थी, इसलिए उन्होंने इस्लाम क़बूल किया और गाँव के एक बूढ़े किसान से ब्याह करने को भी राज़ी हो गईं.

बसंत कौर (बीच में) अपने परिवार के साथ
इमेज कैप्शन, बसंत कौर (बीच में) अपने परिवार के साथ

पाकिस्तान सरकार

बसंत कौर का नाम भी बदलकर मरियम हो गया. कुछ साल बाद ही उनके दूसरे शौहर की भी मौत हो गई.

लेकिन लंबे समय तक बसंत कौर ने अपने बच्चों को उनके घर, पैतृक ज़मीनों के बारे में कुछ भी नहीं बताया.

उन्हें डर था कि कहीं ज़मीन की मांग करने पर पाकिस्तान सरकार उनके बच्चों को गिरफ़्तार कर भारत को न सौंप दे.

साल 1971 में जब उनका पहला पोता हुआ तो उन्होंने अपने बड़े बेटे को सारा किस्सा सुनाया. साल 1997 में बसंत कौर का देहांत हो गया.

साल 1973 में उनके जिस बड़े बेटे ने ज़मीन का मुक़दमा दायर किया था, वो भी साल 2009 में चल बसे.

उनके बाद से बसंत कौर का पोता मुनीर शेख ही कोर्ट में ये केस लड़ रहा है.

बसंत कौर का पोता मुनीर शेख
इमेज कैप्शन, बसंत कौर का पोता मुनीर शेख

भूमि विवाद पर फ़ैसला

कश्मीर में दोनों तरफ, भले ही मामला भारत का हो या पाकिस्तान का, खाली पड़ी ज़मीन को सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया था.

पाकिस्तान के मशहूर वकील मंज़ूर गिलानी बताते हैं कि पाकिस्तान में ऐसे मामलों के निपटारे के लिए एक अलग कोर्ट बनाया गया है.

ये कोर्ट ही ऐसी संपत्तियों की रखवाली का ज़िम्मेदार है. साथ ही कश्मीरी शरणार्थी परिवारों के भूमि विवाद पर फ़ैसला देने की ताक़त रखता है.

ये कोर्ट भूमि विवाद के मामलों से भरा पड़ा है क्योंकि भ्रष्ट अफ़सरों की मदद से जाली काग़ज़ात लगाकर मुक़दमे दायर करने वालों की भी संख्या काफ़ी है.

मुज़फ़्फ़राबाद में है खाली संपत्तियों पर फ़ैसले करने वाला कोर्ट
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इस्लाम क़बूल किया...

मंज़ूर गिलानी कहते हैं, "आदर्श स्थिति तो ये है कि जब ज़मीन का सही मालिक उस पर दावा करने के लिए सामने आए, भले ही वो शरणार्थी है, उसे ज़मीन दे दी जाए. लेकिन यहाँ मामला जटिल है क्योंकि यहाँ मिल्कियत का ढांचा बदल चुका है."

"फिर कोर्ट रूम में उन लोगों की सुनवाई भी हल्की होती है जिन्होंने धर्म बदलकर इस्लाम क़बूल किया है. कई वजहों में से शायद एक वजह ये भी रही होगी कि 45 साल से चल रहा बसंत कौर और उनके पोते मुनीर शेख की ज़मीन का मामला अभी कहीं नहीं पहुंचा है."

मुनीर के मामले में कोर्ट ने एक आदेश जारी किया था जिसमें एक एकड़ से ज़्यादा ज़मीन उन्हें दिए जाने की बात थी.

लेकिन इसे हासिल करना इसलिए आसान नहीं है क्योंकि इसके एक बड़े हिस्से पर वन विभाग का कब्ज़ा है. कुछ पर शरणार्थियों के घर बने हुए हैं. बाकी पर स्थानीय प्रभावशाली लोगों का कब्ज़ा है.

मुज़फ़्फराबाद

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इमेज कैप्शन, नदी के दो तरफ़ बसा है मुज़फ़्फराबाद शहर

ज़ाहिद शेख का मामला

वकील मंज़ूर गिलानी के अनुसार, "कोर्ट का वो आदेश जो मुनीर शेख़ के पास है, एक मज़बूत टूल है. लेकिन तभी, जब आप एक प्रभावशाली शख़्स हों. वरना ये कागज़ पर छपी एक आम चिट्ठी जैसा है."

पचास बरस के ज़ाहिद शेख का मामला भी मुनीर शेख के जैसा ही है.

मुज़फ़्फ़राबाद में ज़ाहिद ने बीबीसी को अपनी पैतृक संपत्ति दिखाई, जहां अब दो मकान बनाए जा चुके हैं और उनके बीच एक कब्र भी है.

ज़ाहिद शेख कहते हैं कि उनकी संपत्ति इलाक़े के प्रभावशाली वकील की पत्नी के नाम कर दी गई है, जिन्होंने दावा किया था कि वो शरणार्थी हैं.

1947 में पश्तो कबायलियों के हमले के वक़्त उनकी दादी ने नीलम नदी के पुल के नीचे छिपकर अपने परिवार को बचाया था.

मुज़फ़्फ़राबाद शहर का नज़ारा, शहर को दो हिस्सों में बाँटती नीलम नदी
इमेज कैप्शन, मुज़फ़्फ़राबाद शहर का नज़ारा, शहर को दो हिस्सों में बाँटती नीलम नदी

परिवार की उम्मीदें

ज़ाहिद शेख कहते हैं, "हमलावरों ने हमारा घर जला दिया था. हमारे परिवार ने मज़दूरी करके पैसे जमा किए और घर को दोबारा तैयार किया."

साल 1959 में पूरा परिवार अपने घर वापस लौट पाया. ज़ाहिद के पिता साल 1973 में चल बसे और उनकी दादी ठाकुरी का देहांत साल 2000 में हुआ.

ज़ाहिद को नहीं पता कैसे, लेकिन साल 1990 में उनके घर को खाली संपत्ति घोषित कर, किसी और के नाम कर दिया गया.

इसे लेकर ज़ाहिद ने अपील की तो कोर्ट ने उसे ख़ारिज कर दिया. इसके बाद कोर्ट ने आदेश दिया कि ज़ाहिद के दोनों घरों को गिरा दिया जाए.

फ़िलहाल ज़ाहिद और उनके परिवार की उम्मीदें कोर्ट में दाखिल की गई आख़िरी अपील पर टिकी हैं.

Zahid Shaikh in his house
इमेज कैप्शन, ज़ाहिद शेख (दाएं) और उनके परिवार के पास पाकिस्तान में बसने के लिए कोई और ठिकाना नहीं है.

पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के प्रधानमंत्री को भेजी दया याचिका में भी ज़ाहिद के परिवार ने ये निवेदन किया है कि अगर उन्हें उनके घर से बेदख़ल किया गया, तो उनके पास रहने के लिए कोई जगह नहीं बचेगी.

और अगर ऐसा किया जाता है तो बेहतर होगा कि उनके परिवार को भारत भेज दिया जाए क्योंकि उनका परिवार पाकिस्तान में रहा, उन्होंने इस्लाम कबूल किया और इसी बात की उन्हें आज तक सज़ा मिल रही है.

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