‘पाकिस्तान में दोस्त मुझे चीन का एजेंट कहते हैं’

- Author, मोहम्मद हनीफ़
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक, इस्लामाबाद से
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) की घोषणा के बाद पाकिस्तान में काफ़ी संख्या में चीनी नागरिकों के आने की वजह से चीनी जनता और संस्कृति के बारे में एक जिज्ञासा देखी जाती है. हालांकि पाकिस्तान में एक ऐसा चीनी समुदाय भी मौजूद है जो कई पीढ़ियों से यहां रह रहा है.
विकी स्वानिग यी येन लाहौर में रहती हैं और थियेटर, संगीत और फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में काम करती हैं. बीबीसी उर्दू ने उनकी ज़िंदगी और समुदाय के बारे में उनसे बात की.
आप कबसे पाकिस्तान में हैं?
येन: मैं पैदा ही यहां हुई थी.
अपने परिजनों के बारे में कुछ बताएं?
येन: मेरे पिता कोई 40-50 साल पहले यहां आए थे. उनके दोस्त फ़ैसलाबाद में रहते थे. वे उन्ही के पास आए थे और फिर उन्होंने फ़ैसलाबाद में पहला चीनी रेस्टॉरेंट खोला था. फिर इसी दोस्त के ज़रिए उनका मेरी मां से पत्र व्यवहार शुरू हुआ जो उस समय चीन में रहती थीं. मेरी मां मेरी दादी से मिलने गईं फिर फ़ोन पर उनकी मंगनी हुई और वो शादी के लिए फ़ैसलाबाद आ गईं.
आपका बचपन कैसा गुज़रा? प्रारंभिक शिक्षा के बारे में कुछ बताएं?
येन: प्राइमरी स्कूल मेरे लिए बहुत मुश्किल था. मैं एकमात्र चीनी थी और बच्चे मुझे बहुत तंग करते थे. मेरे गाल नोचते थे, मुंह पकड़कर घुमाते थे और कहते थे, देखो कितनी क्यूट है. मैं ब्रेक में अकेली बैठी रो रही होती थी.
फिर एक अध्यापक ने मुझे पूरा स्कूल घुमाया और पूछा बताओ तुम्हें कौन-कौन तंग करता है. कई महीने तक में ब्रेक के दौरान उनके पास स्टाफ़ रूम में ही बैठती रही और ये सब उस वक़्त हो रहा था जब मैं पहली कक्षा में थी. फिर मेरे माता-पिता मुझे दूसरे स्कूलों में लेकर गए कि शायद वहां बच्चे कम तंग करें लेकिन मुझे याद है कि हर जगह कोई मुझे फीनी, चीनी या चांग-चांग कहा करते थे.
मुझे हर वक़्त ये एहसास रहता कि मैं दूसरों से अलग हूं. स्कूल और कॉलेज में अच्छी पॉज़िशन आती थी तो कहते थे कि यह इसलिए कि मैं चीनी हूं. मैंने लाहौर स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से गोल्ड मेडल लिया.

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अब आप एक पेशेवर महिला हैं, अब ज़िंदगी कैसी है?
येन: सुबह-सुबह स्कूल में पढ़ाने जाती हूं फिर दोस्तों के साथ मिलकर एक मल्टीमीडिया कंपनी बनाई है वहां जाती हूं. फिर एक और स्कूल में पढ़ाने जाती हूं. इसके बाद वापस कंपनी और फिर रात में घर जाती हूं. कोशिश होती है कि कुछ न कुछ रचनात्मक काम होता रहे.
आप उर्दू और पंजाबी बोलती हैं? इस पर लोगों की प्रतिक्रिया क्या होती है?
येन: लोग काफ़ी हैरान हो जाते हैं. हालांकि, मैं इसे एक आम-सी बात समझती हूं. लोग समझते हैं कि मेरे माता-पिता में से एक पाकिस्तान होगा इसलिए मैं उर्दू और पंजाबी बोलती हूं. सीधी सी बात है कि जब मैं यहां पली हूं तो ज़बान क्यों नहीं बोलूंगी.
चूंकि आमतौर पर लोग समझते हैं कि मुझे उर्दू नहीं आती तो काफ़ी मज़ेदार चीज़ें होती हैं. मैं एक कंपनी में गई जहां का बॉस भी चीनी है और स्टाफ़ के लोग चीनी लोगों के बारे में बातें कर रहे थे फिर किसी ने उन्हें चुप करवाया कि इसे तो उर्दू आती है.
क्या चीनियों के बारे में पाकिस्तानी नस्लभेदी हैं?
येन: कुछ पाकिस्तानी यक़ीनन नस्लभेदी हैं. कुछ लोग बहुत हमदर्द हैं लेकिन मैं कभी गाड़ी चला रही हूं और ट्रैफ़िक पर रुकूं तो साथ वाली गाड़ियों से आवाज़ें आने लगती हैं, चांग चांग.
कई दफ़ा मोटरसाइकिल पर लड़के पीछा करते हैं फिर मैं कहती हूं कि बहनों के साथ भी यही करते हो, क्या मां-बहन नहीं है तुम्हारी, तो वो हंसने लगते हैं और भाग जाते हैं.
एक बार मैं हाइपर स्टार में थी तो किसी ने कहा चांग चांग. मैं बोली कि कुछ लोग कभी बड़े नहीं होंगे तो वो माफ़ी मांगने लगा कि मुझे नहीं पता था कि आपको उर्दू आती है. मतलब ये कि अगर मुझे उर्दू न आती हो तो चांग चांग कहना ठीक है?
सीपीईसी के बारे में क्या जानती हैं?
येन: ज़्यादा नहीं बस इतना कि ये एक व्यापारिक रास्ता है. पाकिस्तान में इंफ़्रास्ट्रक्चर बनेगा. दोनों देशों को यक़ीनन फ़ायदा होगा. ये दोनों देशों के लिए सुनहरा मौक़ा है. मेरे काफ़ी दोस्त मज़ाक करते हैं कि मैं असल में सीपीईसी की एजेंट हूं. कुछ दोस्त ये भी मज़ाक करते हैं कि हो सकता है कि सीपीईसी की वजह से तुम्हारे रिश्ते आने लगे.

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थियेटर, फ़िल्म या अध्यापन क्या करना पसंद है?
येन: मुझे शुरू से ही लिखने का काफ़ी शौक़ था. मुझे हमेशा से मालूम है कि मैं कहानियां सुनाना चाहती हूं. फिर थियेटर की शुरुआत हुई हालांकि मैं फ़ाइनैंस पढ़ रही थी लेकिन दोस्तों के साथ मिलकर थियेटर शुरू किया. शुरू मैं काफ़ी मुश्किल था लेकिन फिर कुछ दोस्त बन गए तो काम शुरू हुआ. कुछ फ़िल्म परियोजनाओं पर काम किया. टीच फॉर पाकिस्तान एक कार्यक्रम था. इसमें पढ़ाया फिर स्कूलों के लिए ड्रामा निर्देशित किए. छात्र चाहते हैं कि कोई ऐसा शिक्षक हो जिससे वो बात कर सकें.
आप अपने आप को चीनी समझती हैं या पाकिस्तानी?
येन: पाकिस्तान में चीनी समुदाय एक दूसरे से बहुत जुड़ा हुआ है. मैं अपने आप को चीनी और पाकिस्तानी दोनो समझती हूं. मैं ये नहीं भूल सकती कि मेरी जड़ें कहा हैं लेकिन मेरी परवरिश पाकिस्तान में हुई है. हालांकि, यहां रहते हुए कई बार बहुत तन्हाई महसूस हुई. स्कूल में एकमात्र चीनी छात्र, दफ़्तर में एकमात्र चीनी लड़की, किसी की एकमात्र चीनी दोस्त.
कभी-कभी ज़िम्मेदारी भी महसूस होती है कि मैं चीनियों और पाकिस्तानियों दोनों की प्रतिनिधि हूं लेकिन यह स्पष्ट है कि मेरी निजी यात्रा सिर्फ़ मेरी है.
कुछ समय पहले एक विज्ञापन आया था जिसमें एक चीनी महिला बिरयानी बनाकर पाकिस्तानी पड़ोसियों से दोस्ती करती है. आप को यह कैसा लगा?
येन: मैं उस विज्ञापन के बारे में क्या-क्या बताऊं. चीनी महिला है तो पड़ोसियों को चीनी खाना बनाकर देगी और क्या यहां पड़ोसी ऐसे होते हैं. हमने पांच घर बदले हैं. पहले दिन पड़ोसी ख़ुद आ जाते हैं मिलने के लिए और पहले दिन ख़ुद खाना बनाकर लाते हैं क्योंकि पहले दिन तो घर में किचन नहीं चलता. और बिरयानी की भी बेज़्ज़ती हुई उस विज्ञापन में. इतने ज़्यादा चावल और दो छोटी-छोटी बोटियां और इन्हें स्टीमर में कौन पेश करता है. और वैसे भी चीनी महिलाएं पाकिस्तान आने से पहले चैट पर दूसरी चीनी महिलाएं से दोस्ती करेंगी.
आप पाक-चीन दोस्ती को कैसे देखती हैं?
येन: दोनों देश आसपास ही आज़ाद हुए थे और दोनो में एक भाईचारा है. दोनों रणनीतिक मामलों में एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं. जहां तक दोनों देशों के लोगों की बात है तो उन्होंने एक दूसरे के प्रति पूर्वाग्रह बना रखे हैं और इनको बदलते हैं.












