चीन के दुनिया का दूसरा सबसे अमीर देश होने का सच

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इमेज कैप्शन, चीन का दावा है कि बीते साल उसकी अर्थव्यवस्था में पिछले सात साल में सबसे ज़्यादा उछाल आया

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़ बीते साल चीन की विकास दर 6.9 फ़ीसदी रही. लेकिन देश के अंदर और बाहर कई जानकार इस दावे पर सवाल उठा रहे हैं.

उत्तरी चीन के मंगोलिया इलाक़े और त्येनजेन शहर के अधिकारियों ने कुछ हफ़्ते पहले ये माना था कि उनके 2016 के आर्थिक आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए थे.

चीन जैसे देश में जहां सरकार का हर चीज़ पर कड़ा नियंत्रण रहता है, ऐसी जानकारी का सामने आना चौंकाता है.

इसके अलावा वो दूसरी चीज़ जिसने लोगों को सवाल उठाने का मौक़ा दिया है, वो है चीनी सरकार का कर्ज़ उतारने और आबोहवा सुधारने के लिए कड़े क़दम उठाने का दावा.

लोग जानना चाहते हैं कि अगर चीन की सरकार ने वाक़ई ख़ुद पर चढ़े भारी कर्ज़ को उतारने और प्रदूषण कम करने के लिए वो फ़ैसले लिए हैं जिनका वो दावा करती है, तो उसका असर उनकी विकास दर पर कैसे नहीं पड़ा?

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छप्परफाड़ तरक्की

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन की तरक्की वहां की सरकार की उम्मीदों से भी ज़्यादा तेज़ हो रही है.

सरकार ने कुछ महीने पहले 6.5 फ़ीसदी की विकास दर का अनुमान लगाया था.

निर्यात और इंफ़्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ाने को भी इसके लिए एक वजह माना जा सकता है.

लेकिन चीनी मामलों के बीबीसी संवाददाता रॉबिन ब्रैंट के मुताबिक़, "चीन की विकास दर आम तौर पर सरकार की उम्मीदों के मुताबिक़ और स्थिर रहती है इसलिए इस पर यक़ीन करना मुश्किल है. नतीजे आने से ठीक पहले अचानक कई प्रांतों की सरकारें सामने आ गई और दावा किया कि उन्होंने आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ की. ऐसा आमतौर पर नहीं होता है."

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भारी कर्ज़ में दबा है चीन

चीन पर चढ़ा कर्ज़ पिछले कुछ साल में लगातार बढ़ा है. वहां कर्ज़़ न चुकाने वाले 'डिफ़ॉल्टर' व्यापारियों और परिवारों की संख्या भी बढ़ी है.

आईएमएफ़ यानी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष हाल ही में कह चुका है कि चीन के कर्ज़ उसकी जीडीपी के 234 फ़ीसदी के स्तर तक पहुंच गए हैं.

इसी के चलते जानकार कहते आए हैं कि चीन को अपनी विकास दर से ज़्यादा ध्यान कर्ज़ चुकाने पर देना चाहिए.

लेकिन बीजिंग का कहना है कि उसने हालात पर क़ाबू पाने के लिए ज़रूरी क़दम उठा लिए हैं और सरकारी कंपनियों को अपनी देनदारी घटाने का निर्देश भी दिया है.

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कड़े कायदे क़ानून

ग़ौरतलब है कि चीन के 28 शहरों में प्रदूषण से निपटने के लिए कुछ कड़े नियम लागू किए गए हैं मसलन सीमेंट और स्टील के कुछ ऐसे कारखानों को बंद कर दिया गया है जो बहुत प्रदूषण फैला रहे थे.

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़ इन फ़ैसलों से फ़ौरी तौर पर आर्थिक विकास की रफ़्तार धीमी पड़ सकती है लेकिन भविष्य बेहतर बनाने के लिए ये कदम उठाए जाने ज़रूरी हैं.

इसके अलावा सरकार ने लोगों से कोयले के बजाय प्राकृतिक गैस और बिजली इस्तेमाल करने के लिए भी कहा था लेकिन इस निर्देश को पिछले महीने वापस ले लिया गया क्योंकि लोगों को ठंड में घर गर्म रखने के लिए संसाधनों की क़िल्लत होने लगी थी.

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चीन की आबोहवा

चीन की सरकार का कहना है कि वो ऐसा करके एक 'नई वास्तविकता' बना रही है. सरकार ने दावा किया कि 2017 की सर्दियों में चीन की आबोहवा में सुधार आया है.

इसी के बाद जानकार पूछ रहे हैं कि ऐसे कड़े क़दम उठाने वाले देश की विकास दर फ़ौरी तौर पर घटने के बजाय लगातार बढ़ कैसे रही है?

उनके मुताबिक़ ऐसा नहीं हो सकता कि कोई देश कर्ज़ उतारे, कारखाने बंद करे और फिर भी उम्मीद से ज़्यादा विकास दर हासिल कर सके.

इन विशेषज्ञों को चीन की तरक्की पर शंका नहीं है. वे सिर्फ़ आंकड़ों पर सवाल उठा रहे हैं.

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