शिवसेना-बीजेपी मामला: 'अभी तो बस मंत्र पढ़े हैं, पूर्णाहूति तो बाक़ी है'

शिवसेना ने तय किया है कि पार्टी आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ मिलकर नहीं लड़ेगी. पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास कर दिया गया.

प्रस्ताव लाने वाले सांसद संजय राउत का मानना है कि बीजेपी पिछले तीन साल से शिवसेना का मनोबल गिराती आ रही है.

संजय राउत ने दावा किया कि अकेले उतरने के बाद भी उनकी पार्टी महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में से कम से कम 25 और विधानसभा की 288 सीटों में से 125 सीटें जीतेगी.

यह पहली बार नहीं है कि शिवसेना ने बीजेपी से अलग होने की बात कही हो. पार्टी इससे पहले भी इस तरह की चेतावनी जारी करती रही है. ऐसे में शिवसेना के इस फ़ैसले को कितनी गंभीरता से लिया जाना चाहिए?

बीबीसी ने यही सवाल वरिष्ठ पत्रकार और महाराष्ट्र की राजनीति पर अच्छी पकड़ रखने वाले अनुराग चतुर्वेदी से पूछा जिसके जवाब में उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कोई उन्हें गंभीरता से ले रहा है क्योंकि अभी भी शिवसेना मंत्रिमंडल में शामिल है. उनके पांच कैबिनेट मंत्री है और 12 राज्य मंत्री है. यानी वो सत्ता में भी है और सत्ता से बाहर भी रहना चाहते हैं."

अनुराग चतुर्वेदी आगे कहते हैं , "यह तनातनी कई दिनों से चल रही है. वो कई दिनों से विरोध प्रदर्शन कर रहे है कि उन्हें सत्ता में जैसी भागीदारी मिलनी चाहिए, वैसी नहीं मिली है. उनका कहना है कि वो हिन्दुत्व के सवाल पर भाजपा को छोड़कर चुनाव लड़ेंगे लेकिन हिन्दुत्व का मुद्दा भाजपा का भी है. उनकी क्रेडिबिलिटी तब बनेगी, जब वो इस सत्ता के मोह को छोड़कर अलग होंगे. तभी उनकी नई पारी शुरू होगी. मुझे लगता है कि उन्होंने अभी एक संभावना बताई है कि हम अलग होकर लड़ सकते हैं. "

बीजेपी पर असर

तो क्या ये फ़ैसला 2019 से पहले बदल भी सकता है?

"मुझे लगता है जिस दिन शिवसेना ये तय करेगी कि वो सत्ता में नहीं है, सरकार के ख़िलाफ़ है, उनके ख़िलाफ़ आंदोलन करेगी. अभी आप देख रहे हैं कि महाराष्ट्र में 26 जनवरी से नई राजनीति की शुरूआत हो रही है जिसमें कांग्रेस है, एनसीपी है, राजीव शेट्टी भी है जो अभी तक मंत्री थे और एनडीए में भी थे. अगर शिवसेना राजीव शेट्टी वाला मॉडल नहीं अपनाती है तब तक मुझे नहीं लगता कि उनकी बातों में कोई मतदाता विश्वास करेगा. यह अभी उनकी क्रेडिबिलिटी का, उनके विश्वास का संकट है. शिवसेना ऐसी बातें कहती रही है. सामना में भी विरोध करती रही है. यह भी हो सकता है कि उनकी पार्टी के लोग उद्व ठाकरे के नेतृत्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दें."

इस से बीजेपी को कितना नुकसान हो सकता है?

"मुंबई और मराठवाड़ा क्षेत्र में शिवसेना की काफ़ी पकड़ है. विशेषकर पिछड़े और बैकवर्ड राजनीति में शिवसेना की बहुत पहुंच है. वहीं मुस्लिम और किसान भाजपा से नाराज है इसलिए अगर शिवसेना वहां से अलग हो जाती है तो भाजपा को धक्का तो लगेगा. ये तीन-चार इलाक़ों में शिवसेना उन्हें परेशान कर सकती है. इसलिए बीजेपी नारायण राणे को भी अपने साथ ले रही है, जो पहले शिवसेना के विरोध के कारण मंत्री नहीं बन पाए थे."

रूठों को मनाएगी बीजेपी?

शिवसेना का आरोप है कि बीजेपी गठबंधन धर्म नहीं निभाती है?

"यह सही बात है. जो लोग पहले उनसे जुड़ रहे थे वे 2019 में बिदक रहे हैं जैसे नोटबंदी और जीएसटी के बाद व्यापारियों में निराशा देखने को मिल रही है. लेकिन इसे टूट या समाप्ति नहीं मान सकते. कह सकते हैं कि अभी दरार पड़ी है. जिस दिन शिवसेना सत्ता से बाहर निकल जायेगी उस दिन युद्ध का आरंभ होगा. ये तो अभी बिगुल बजाया है, संकेत दिया है. आज उद्धव ठाकरे का जन्मदिन भी है. उन्हीं की भाषा में कहें तो ये अभी सिर्फ़ मंत्रोच्चार है. इसे पूर्णाहूति नहीं माना जा सकता."

तो क्या बीजेपी अपने सहयोगी को मनाने की कोशिश करेगी?

"मुझे लगता है कि ये स्थानीय मसला नहीं है. बार-बार जो उनका अपमान हो रहा है बाल ठाकरे के ज़माने में बीजेपी के नेता हाज़िरी लगाते थे, यह परम्परा बंद कर दी गई है. उससे भी उनके अहम को ठेस पहुंची है. इसमें गडकरी की कोई भूमिका नहीं है. उनकी सीधी-सीधी टक्कर अमित शाह या नरेन्द्र मोदी से है."

(वरिष्ठ पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी से बीबीसी संवाददाता पंकज प्रियदर्शी की बातचीत पर आधारित)

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