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नज़रिया: क्या मोदी ने सहयोगी दलों को बेदख़ल कर दिया है?
केंद्र सरकार के कैबिनेट फेरबदल की दो वजह से ज़्यादा चर्चा है. एक, भारत को निर्मला सीतारमण के रूप में दूसरी महिला रक्षा मंत्री मिली हैं.
और दो, इस बार नौ नए मंत्री बनाए गए, लेकिन उनमें एक भी भाजपा के सहयोगी दलों से नहीं था. हाल ही में राजद और कांग्रेस से हाथ छुड़ाकर एनडीए के साथ आने वाली जदयू से भी किसी को मंत्री नहीं बनाया गया. शिवसेना की ओर से इस पर तीखी प्रतिक्रिया आई है. उनके प्रवक्ता संजय राउत ने कहा है कि एनडीए अब लगभग मर चुका है.
उधर जेडीयू को मंत्री पद न मिलने पर आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव ने चुटकी ली है. उन्होंने ट्विटर पर लिखा, 'दो नाव पर चलना और टांग फट कर मरना. नीतीश दो नाव की सवारी कर रहे हैं. ये अपनी ही चालाकी में फंस गए.'
बीबीसी संवाददाता कुलदीप मिश्र ने वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव से बात की और पूछा कि क्यों कहा जा रहा है कि कैबिनेट फेरबदल में सहयोगी दलों को बेदख़ल कर दिया गया?
आगे पढ़िए राहुल देव की राय:
मैं नहीं समझता कि सहयोगी दलों से कोई मंत्री न बनाकर उन्हें बेदख़ल कर दिए जाने जैसी कोई बात है. यह तो विरोधियों की कही हुई बात है. बहुत ज़ाहिर है कि यह बीजेपी तक सीमित कैबिनेट विस्तार था.
जैसा मैंने लिखा भी है कि एक विस्तार और होना भी है और वो मैं समझता हूं कि सहयोगी दलों के लिए ही मुख्यत: होगा. दो तीन बातें मुख्य तौर पर याद रखनी चाहिए. शिवसेना की ओर से संजय राउत का बयान आया है कि एनडीए मर चुका है, वगैरह. लेकिन एक बात तो तय है कि जेडीयू से बातचीत हो गई है और उनसे समझ बन गई है.
'होगा एक और कैबिनेट विस्तार'
जेडीयू के पास दो सांसद हैं. बीजेपी के 18 सांसद हैं. अभी टीडीपी है, और पार्टियां हैं. दक्षिण से इन्हें एक पार्टी को लेना ही है. एआईएडीएमके का आना लगभग तय है, लेकिन वहीं चूंकि स्थिति अभी बहुत उलझी हुई है और तय नहीं है कि कौन-सा गुट सत्ता में रहेगा. जब तक तमिलनाडु में एआईएडीएमके की आंतरिक समस्याएं नहीं सुलझ जातीं, तब तक वहां से किसी को लिया नहीं जा सकता.
तब तक इनको शिवसेना और दूसरे सहयोगियों से बात करके फ़ैसला लेना होगा. मैं समझता हूं कि उन बातों को अभी भविष्य के लिए छोड़ दिया गया है. इसलिए मुझे विश्वास है कि मोदी सरकार का चौथा कैबिनेट विस्तार होगा और वह मुख्यत: सहयोगी दलों पर ही केंद्रित होगा. एनडीए ने अब तक जो दिखाया है कि उन्हें भले ही बहुत ज़रूरत नहीं है, लेकिन उनकी आगे के विस्तार की जो योजनाएं और रणनीतियां हैं, उसके मद्देनज़र उन्हें सहयोगी दलों की ज़रूरत है और वह रहने वाली है.
'एआईडीएमके की अनिश्चितता'
इस बार सहयोगी दलों से एक मंत्री भी नहीं बनाया जा सका, इसका एक बड़ा कारण तो तमिलनाडु की अनिश्चित स्थिति ही है. किसी एक सहयोगी दल से मंत्री बना लेते और बाद में फिर एआईएडीएमके के लिए कोई दूसरा मंत्रिमंडल विस्तार किया जाता, उससे उलझनें और बढ़तीं. लेकिन मुझे लगता है कि इन्होंने शिवसेना से संवाद ठीक नहीं रखा है, इसलिए उनको ज़्यादा परेशानी हो रही है और उधर से इस तरह की अभिव्यक्तियां देखने में आ रही हैं.
जहां तक लालू यादव की ओर से इस मसले पर नीतीश पर प्रहार की बात है, उनसे प्रशंसा की अपेक्षा तो किसी को नहीं रही होगी. वो विपक्ष में हैं और नीतीश कुमार को चिढ़ाना उनका रोज़ का काम है. मैं उसे बहुत महत्व नहीं देता.
एकमात्र जो भाजपा के लिए चिंता वाली बात है, वो शिवसेना का बयान है. टीडीपी का एक बयान आया है चंद्रबाबू नायडू का, लेकिन उसमें आलोचना नहीं है. उसमें यह उम्मीद जताई गई है कि अगले विस्तार में उनके राज्य की ज़रूरतों का ख़्याल रखा जाएगा.
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