जब अमरीकी सैनिकों ने 40 टन के टैंक हाथ से उठाए

अमरीका

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, बीबीसी हिस्ट्री
    • पदनाम, ...

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीका ने अपनी सेना में एक ख़ास दस्ता तैयार किया. ये एक ऐसी सेना थी जिसने अपने ख़ास तरीकों से युद्ध के मैदान पर हिटलर की सेना को नाकों चने चबाने पर मजबूर कर दिया.

'फ़ैंटम आर्मी' और 'हेडक्वार्टर 21' के रूप में चर्चित इस सेना के नाम दूसरे विश्व युद्ध में हज़ारों जानें बचाने का रिकॉर्ड है.

रिक बेयर और एलिज़ाबेथ सेयल्स ने अपनी किताब 'फ़ैंटम आर्मी ऑफ़ वर्ल्ड वॉर 2' में उन तरीकों का ज़िक्र किया है, जिससे ये सेना नाज़ी सेना को चकमा दिया करती थी.

अमरीका

इमेज स्रोत, Getty Images

1) टैंकों, ट्रकों और सैन्य साज़ो-सामान जैसे गुब्बारे

अमरीका की फ़ैंटम सेना ने युद्ध के दौरान सैकड़ों की संख्या में ऐसे गुब्बारों का प्रयोग किया जो सैन्य टैंकों, ट्रकों और अन्य सैन्य साज़ो-सामान जैसे दिखते थे.

इन गुब्बारों को रातों-रात खड़ा किया जा सकता था जिससे आसमान से देखने पर ऐसा लगता था कि मित्र राष्ट्रों की सेनाएं युद्ध क्षेत्र में आगे बढ़ चुकी हैं.

इस पूरी प्रक्रिया में हर चीज़ का बारीकी से ध्यान रखा गया. नकली टैंकों के रास्ते में ज़मीन पर टैंकों के निशान बनाने के लिए एक मशीन का इस्तेमाल किया गया, जिससे ऐसा लगे कि नकली टैंक किसी रास्ते से होकर गुज़रे हैं.

इसके साथ ही इस बात का ध्यान भी रखा गया कि इस आर्मी के आसपास से आम नागरिक ना गुज़रें. इस दौरान एक बार इस आर्मी के करीब से दो फ्रांसीसी साइकिल सवार गुज़रे तो उन्होंने चार सैनिकों को 40 टन के शरमन टैंक हाथों में उठाए देखा.

अमरीका

इमेज स्रोत, Getty Images

2) रात में जंगलों से आती गोलियां चलने की रोशनी

फ़ैंटम आर्मी रात में जंगलों में गोलियां चलने के बाद उससे निकलने वाली रोशनी का भ्रम पैदा करने के लिए फ्लैश का इस्तेमाल करती थी. इसका मक़सद था कि जर्मन सैनिक इस रोशनी को देखकर उसे असली गोलीबारी समझें और अमरीकी आयुधखाने से दूर रहें.

अमरीका की इस भूतिया सेना ने आर्टिलरी की शक्ल वाले गुब्बारों को फुलाकर रखा था.

इसके बाद फोन पर बातचीत के ज़रिए इस सेना ने जंगलों के बीच फ्लैश को ठीक उसी समय चमकाया जब असली गोलीबारी होती थी.

अमरीका

इमेज स्रोत, Getty Images

3) आवाज़ के जादूगरों का करतब

इस आर्मी में साउंड इंजीनियरों की अपनी टीम थी जो सेना की असली टुकड़ी के साथ रहते हुए टैंक, ट्रक, जमीन खोदने की मशीनों और टैंक द्वारा पुलों को पार करने की आवाज़ को रिकॉर्ड करती थी.

इन आवाज़ों को 16 लंबी ग्लास ट्रांसक्रिप्शन डिस्कों पर रिकॉर्ड किया जाता था, जिनपर उस दौर में म्यूज़िक अलबम रिकॉर्ड किए जाते थे.

इन इंजीनियरों ने अलग स्थितियों के लिए कई तरह की आवाज़ों को रिकॉर्ड किया. इसके बाद सैन्य वाहनों पर लगे हुए शक्तिशाली लाउडस्पीकर की मदद से उन्हें बजाया जाता था.

इन लाउड स्पीकरों की रेंज 16 किलोमीटर तक होती है जिससे कभी-कभी जर्मन सैनिकों समेत आसपास मौजूद अमरीकी टुकड़ियां भी भ्रम में पड़ जाती थीं.

अमरीका

इमेज स्रोत, Getty Images

4) रेडियो पर जर्मनी को मैसेज़ मिलते थे लेकिन नकली

दूसरे विश्व युद्ध के समय ज़्यादातर अहम संदेशों को मोर्स कोड में भेजा जाता था. जर्मन इंटेलीजेंस के अधिकारी इतने क़ाबिल होते थे कि वे अमरीकी टुकड़ियों के रेडियो ऑपरेटरों की शैली को पहचानने लगे थे.

ऐसे में सेना के इस दस्ते ने असली संदेश भेजने वाले रेडियो ऑपरेटरों की तरह मोर्स कोड में मैसेज़ भेजने की ट्रेनिंग ली. और जब असली भेजे जा रहे होते थे तब ही नकली रेडियो ऑपरेटर मैसेज़ भेजा करते थे. ऐसे में जर्मनी की सेना के लिए असली और नकली संदेशों में अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता था.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)