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नौजवान क्या सोचते हैं अपने देश उत्तर कोरिया के बारे में
ये उत्तर कोरिया के बारे में कोई आम सी कहानी नहीं है.
इसमें बदलाव की बात है, उन नौजवानों का जिक्र है जो हिंसा और दमन झेलने के बावजूद पुरानी लकीर छोड़ नई इबारत लिख रहे हैं. ये वो पीढ़ी है जिसे पता है कि बाहरी दुनिया में क्या हो रहा है. ये उत्तर कोरियाई समाज का वो हिस्सा है जो आज़ादी से जीना चाहता है.
बाहरी दुनिया के लिए इस बंद मुल्क में क्या चल रहा है, इसके बारे में जानना बहुत मुश्किल है लेकिन उत्तर कोरिया के बारे में हाल ही में आई एक नई डॉक्यूमेंट्री ने जानकारी के नए दरवाजे खोले हैं. ये डॉक्यूमेंट्री 'फ़्रीडम ऑफ़ नॉर्थ कोरिया' नाम के एक संगठन ने बनाया है. ये अमरीकी संगठन उत्तर कोरिया शरणार्थियों की मदद करता है.
इस 'लिंक' प्रोजेक्ट में उत्तर कोरिया छोड़ने में कामयाब हुए लोगों से बात कर उस देश को समझने की कोशिश की गई है. ये वो पीढ़ी थी जो नब्बे के दशक में जवान हुई. उन्होंने खुद को बचाने और अपनी पहचान गढ़ने के लिए नए प्रयोग किए, कारोबार का सहारा लिया और एक कम्यूनिस्ट देश में नए बाज़ारों में दस्तक दी.
चीन का रास्ता
डॉक्यूमेंट्री 'लिंक' बनाने वाले कहते हैं, "ये उत्तर कोरियाई पीढ़ी 'जंगमादंग जेनरेशन' के नाम से जानी जाती है. उत्तर कोरिया के ख़राब वक्त में इस पीढ़ी ने अपनी शुरुआत की थी. और अब वे ऐसी ताक़त के तौर पर उभर रहे हैं जो शायद ही उत्तर कोरिया ने पहले कभी देखी हो.
'लिंक' के डायरेक्टर सोकील पार्क बीबीसी से कहते हैं, "उत्तर कोरिया के बदलाव की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है." साल 2008 से 2013 के दरमियां उत्तर कोरिया से पलायन करने वाले लोगों से इस डॉक्यूमेंट्री के लिए बातचीत की गई है. ये लोग अलग-अलग रास्तों से मुल्क छोड़ने में कामयाब हुए थे.
सोकील पार्क कहते हैं, "उत्तर कोरियाई अमूमन चीन के रास्ते मुल्क छोड़ते हैं. चीन में इस बात का ख़तरा रहता है कि पकड़े जाने की सूरत में वापस उत्तर कोरिया भेजे जाने का ख़तरा रहता है. लेकिन अगर वे चीन के उत्तरी इलाक़े से दक्षिणी इलाक़े की तरफ़ बढ़ने में कामयाब हो जाते हैं तो दक्षिणपूर्वी एशिया चले जाते हैं. यहां से उन्हें दक्षिण कोरिया या फिर अमरीका जाने का रास्ता मिल जाता है.
आंकड़ों के आईने में...
- साल 2017 तक उत्तर कोरिया के 31,339 लोगों ने देश छोड़कर दक्षिण कोरिया में शरण ली.
- अकेले साल 2017 में 1,127 लोगों ने उत्तर कोरिया से दक्षिण कोरिया में शरण ली. पिछले साल से ये संख्या 21 फीसदी कम थी.
- पिछले साल शरण लेने वालों में 83 फीसदी महिलाएं थीं.
किम जोंग उन के शासन में आने के बाद से उत्तर कोरिया छोड़ने वाले लोगों की संख्या कम हुई है. इसकी वजह है, सीमा पर सख्त इंतजामों का होना.
ग़रीब सरकार
उत्तर कोरिया छोड़ने वाले लोगों की कहानियां वहां के हालात के बारे में काफी कुछ बयान करती हैं. डॉक्यूमेंट्री में जू यांग कहती हैं, "हमें एहसास हुआ कि अगर हम कुछ नहीं करेंगे तो हम भूख से मर जाएंगे. इसलिए हमने बिज़नेस करना शुरू किया."
केवल छह सालों में इस नौजवान लड़की को ये दिखने लगा कि बहुत से लोग भूख और ठंड से किस तरह से मर रहे हैं और सरकार जो राशन मुहैया करा रही है, वो कैसे ख़त्म हो जाती है. जू यांग कहती हैं, "मैंने महज 14 साल की उम्र में बिज़नेस करने के बारे में सोचना शुरू कर दिया था."
जू यांग ने सोयाबीन के बीज के एक कारखाने से बचा हुआ माल इकट्ठा करना शुरू किया और उससे बिज़नेस की नींव डाली.
गेउमजु ने साल 2008 में उत्तर कोरिया छोड़ा था. वो बताते हैं, "हमारी सरकार ग़रीब हो गई थी. वो हमारी देखभाल नहीं कर सकती थी. हमने अपनी उम्मीदें छोड़ दीं. सरकार को ये पता था कि जो करना है, हमें अपने भविष्य के लिए खुद ही करना होगा. हम इसी तरह से बड़े हुए."
उत्तर कोरिया में विदेशी फ़िल्में
गेउमजु की मां कहती हैं कि उनकी पीढ़ी सामाजिक नियंत्रणों का ज्यादा परवाह नहीं करती है. ज़िंदा रहना पहली ज़रूरत है और वे बहादुरी और साहस के साथ बड़े हुए हैं. जगमादंग जेनरेशन के लिए हर कारोबार खाने-पीने की चीज़ों से जुड़ा हुआ नहीं था.
30 साल के शिमोन हुह बताते हैं, साल 2007 तक उत्तर कोरिया में विदेशी फ़िल्में डीवीडी पर रिलीज़ हुआ करती थीं. लेकिन इसके बाद यूएसबी ड्राइव की शुरुआत हुई. सीडी लाना-ले जाना मुश्किल था. लोगों ने यूएसबी ड्राइव अपना लिया जिस पर हॉलीवुड और दक्षिण कोरियाई फ़िल्में लोड की जा सकती हैं.
डानबी किम ने 15 साल की उम्र में चीनी सामान की तस्करी शुरू कर दी थी. डानबी याद करती हैं कि किस तरह से लोग उन्हें दक्षिण कोरियाई प्रोग्राम लाने की फरमाइश किया करते थे. विदेशी फ़िल्मों के जरिए ही उन्होंने जाना कि बाक़ी दुनिया ख़तरे में नहीं थी.
समाजवादी नियम कायदे
डानबी किम कहती हैं, "उत्तर कोरिया के बाहर मैं एक चीज़ और महसूस करती हूं. वो ये है कि बाहरी दुनिया में औरतों की ज़्यादा इज़्ज़त की जाती है. उत्तर कोरिया में तो महिलाएं मोटर साइकिल की पिछली सीट पर भी नहीं बैठ सकती थीं."
जू यांग चेतावनी देती हैं, "अगर कोई उत्तर कोरिया में समाजवादी नियम कायदों का पालन नहीं करता है तो उसे गंदा और भ्रष्ट समझा जाता है. तानाशाह सरकार लोगों को सबक देने के लिए सरेआम मौत की सज़ा भी देती है. वे ये सुनिश्चित करते हैं कि हर कोई ऐसी सज़ाओं की तामील देखे. मुझे आज भी गोलीबारी की आवाज़ें याद हैं."
डॉक्यूमेंट्री में दिखने वाले लोगों को किसी न किसी मौके पर उत्तर कोरिया में हिरासत में लिया गया था. डानबी किम भी उनमें से एक थीं. उन्होंने अपने बड़े भाई की उनके परिवार से चीन में मुलाकात का इंतजाम कराया था. डानबी किम के भाई ने सारा इलजाम अपने सिर पर ले लिया ताकि उन्हें रिहाई मिल सके. किम रोते हुए ये बताती हैं.
डानबी किम के भाई आज भी उत्तर कोरिया की हिरासत में हैं. डॉक्यूमेंट्री के निर्देशक ये बताते हैं कि पूंजीवाद के जरिए बचने की ये कहानियां एक पीढ़ी की हैं. उन्होंने जो महसूस किया, वो किसी ने कहीं और नहीं किया होगा. पुरानी पीढ़ी को तो ये पता ही नहीं था कि आज़ादी क्या होती है.
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