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...अब पाकिस्तान दे रहा है 'कुर्बानी' की दुहाई
पाकिस्तान ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के हालिया बयान पर 'निराशा' जाहिर करते हुए कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में 'सामूहिक नाकामी' के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है.
पाकिस्तान ने मंगलवार को ये भी कहा कि तमाम 'गैरज़रूरी आरोपों' के बाद भी पाकिस्तान अफ़गानिस्तान में जारी शांति प्रक्रिया में 'रचनात्मक भूमिका' निभाता रहेगा.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने नए साल के पहले ट्वीट में पाकिस्तान पर कई गंभीर आरोप लगाए थे. ट्रंप ने बीते डेढ़ दशक के दौरान पाकिस्तान को दी गई मदद को 'मूर्खतापूर्ण फ़ैसला' बताया था.
ट्रंप ने अपने ट्वीट में लिखा था, ''अमरीका ने पिछले 15 सालों में पाकिस्तान को 33 अरब डॉलर से ज़्यादा की मदद दी और उसने बदले में झूठ और छल के सिवाय कुछ नहीं दिया. वह सोचता है कि अमरीकी नेता मूर्ख हैं. हम अफ़ग़ानिस्तान में जिन आतंकवादियों को तलाश रहे हैं, उन्होंने उन्हें पनाह दी. अब और नहीं."
ट्रंप के बयान के एक दिन के बाद मंगलवार को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद ख़क़ान अब्बासी की अगुवाई में हुई नेशनल सिक्योरिटी कमेटी की बैठक में कहा गया कि अमरीकी नेतृत्व के हालिया बयान 'निराश' करने वाले हैं.
इस बैठक में पाकिस्तान सरकार के वरिष्ठ मंत्री और सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा मौजूद थे.
बैठक में कहा गया कि पाकिस्तान ने चरमपंथ के ख़िलाफ जंग की 'बड़ी कीमत चुकाई' है और पाकिस्तान की कुर्बानियों को इस 'बेदिली से अनदेखा नहीं किया जा सकता' है.
पढ़िए इस बैठक की ख़ास बातें...
- राष्ट्रपति ट्रंप की दक्षिण एशिया के लिए नीति के ऐलान के बाद अफ़गानिस्तान में स्थायी शांति और स्थिरता कायम करने के लिए एक दूसरे के नज़रिए को समझने के लिहाज से अमरीकी नेतृत्व के साथ बातचीत उपयोगी साबित हुई.
- इस कड़ी में अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन और रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस के पाकिस्तान दौरे अहम थे.
- सकारात्मक प्रगति के बीच अमरीकी नेतृत्व के हालिया बयान समझ से परे हैं. ये तथ्यों के परे हैं. ये दोनों देशों के बीच बरसों के दौरान बने भरोसे के प्रति असंवेदनशीलता दिखाते हैं. इन बयानों से पाकिस्तान की ओर से बीते कई दशकों में दी गई कुर्बानियों की अनदेखी होती है. पाकिस्तान एक ऐसा देश है जिसने क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा और शांति के लिए अहम योगदान दिया है.
- बीते कई सालों से पाकिस्तान के चरमपंथ के ख़िलाफ अभियान से अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद तमाम चरमपंथी संगठनों के संभावित विस्तार पर रोक लगी है. ये एक ऐसा तथ्य है जिसे अमरीकी प्रशासन ने भी स्वीकार किया है. इनमें से ज्यादातर चरमपंथियों ने पाकिस्तान में मौजूद लाखों अफ़ग़ानी शरणार्थियों का फायदा उठाकर सीमापार से निर्दोष पाकिस्तानियों पर हमला किया है.
- पाकिस्तान ने अपने संसाधनों के दम पर चरमपंथ के ख़िलाफ संघर्ष किया है और इसके लिए अर्थव्यवस्था को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है.
- पाकिस्तान ने इसके लिए बड़ी कुर्बानियां दी हैं. हज़ारों पाकिस्तानी नागरिकों और सुरक्षा जवानों की जान गई हैं. उनके परिवारों के दर्द को एक काल्पनिक वित्तीय मूल्यांकन के नाम पर इस बेदिली से अनदेखा नहीं किया जा सकता है.
- पाकिस्तान आज भी अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका की अगुवाई वाले अंतरराष्ट्रीय प्रयासों की मदद कर रहा है. पाकिस्तान के चरमपंथ के ख़िलाफ अभियान में सहयोग की वजह से ही क्षेत्र में अल कायदा का असर ख़त्म हुआ है.
- इस समर्थन की वजह से पाकिस्तान को क्रूर पलटवार का सामना करना पड़ रहा है. इसमें अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद चरमपंथियों की ओर से सैंकड़ों पाकिस्तानी स्कूली छात्रों की हत्याएं शामिल हैं.
- अफ़गानिस्तान में सामूहिक नाकामी के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. सहयोगियों को जिम्मेदार ठहराने से अफ़ग़ानिस्तान और क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने का सामूहिक मकसद हासिल नहीं हो सकता है.
- तमाम गैरजरूरी आरोपों के बाद भी पाकिस्तान जल्दीबाज़ी में कार्रवाई नहीं करेगा और अफ़ग़ानिस्तान में शांति प्रक्रिया स्थापित करने में रचनात्मक भूमिका निभाता रहेगा. ऐसा सिर्फ अपने लोगों के हित में ही नहीं बल्कि क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की शांति और सुरक्षा के लिए किया जाएगा.
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