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लश्कर-ए-तैयबा का समर्थन क्यों कर रहे हैं मुशर्रफ़?
- Author, एहतेशामुल हक़
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने लश्कर-ए-तैयबा का समर्थन किया है. उनका ये बयान चौंकाने वाला नहीं है क्योंकि अब वो सत्ता में नहीं हैं.
नेता चाहें भारत के हों या पाकिस्तान के जब वो सत्ता में होते हैं तब उनके बयान अलग होते हैं और जब वो सत्ता से बाहर होते हैं तब अलग.
परवेज़ मुशर्रफ़ जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे तब उन्होंने अमरीका के वॉर ऑन टेरर (आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध) का समर्थन किया था.
2001 के बाद जब वो इस अभियान से जुड़े तब वो जेहादी संगठनों के ख़िलाफ़ बोलते थे और इनके ख़िलाफ़ बेहद सख़्त रवैया रखते थे. उन्होंने कई वांछित लोगों और शीर्ष चरमपंथियों को पकड़वाकर पैसों के बदले अमरीका के हवाले भी किया था.
लेकिन अब वो सत्ता से बाहर हैं और ख़ासतौर से नवाज़ शरीफ़ के ख़िलाफ़ हैं. उन पर लाल मस्जिद कार्रवाई और नवाब बुग़ती की हत्या का मुक़दमा भी चल रहा है लेकिन वो देश के बाहर बैठे हैं. इसके अलावा उन पर 2007 में आपातकाल लगाने से संबंधित मुक़दमा भी चल रहा है.
अब वो सोच रहे होंगे कि सियासत में वापस कैसे लौटा जाए. वो एक बार पाकिस्तान आए थे और बमुश्किल फ़ौज की मदद लेकर वापस जा सके थे.
विदेश में बैठकर उनके बयान देने का मक़सद सिर्फ़ एक ही है- नवाज़ शरीफ़ के ख़िलाफ़ बोलना और किसी भी तरह पाकिस्तान की राजनीति में वापस लौटना. वो चुनावों से पहले पाकिस्तान लौटने की बात कह भी चुके हैं.
ऐसे में उनका ये बयान सिर्फ़ वोट हासिल करने या जनता से संवाद स्थापित करने का तरीका ही लग रहा है. वो 24 पार्टियों को मिलाकर उनके नेता बनने की नाकाम कोशिश भी कर चुके हैं. वो एमक्यूएम के साथ जाना चाहते थे, वो भी नहीं हो सका.
इन हालातों में उनके इस बयान का बहुत ज़्यादा महत्व तो नहीं है. लेकिन वो पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख हैं, दस साल तक पाकिस्तान पर शासन कर चुके हैं, ऐसे में जब वो इस तरह के बयान देते हैं तो उनको सुनने वाले कुछ और लोग भी होते हैं.
मुशर्रफ़ पाकिस्तान के लोगों को ये भी बताना चाहते हैं कि लश्कर-ए-तैयबा हों या हाफ़िज़ सईद हों वो जो काम कर रहे हैं वो पाकिस्तान के लिए ठीक काम है और वो कश्मीर की आज़ादी के लिए काम कर रहे हैं.
पाकिस्तान में कश्मीर को लेकर भावनात्मक माहौल है और जब कश्मीर की बात होती है तो लोग उसकी आज़ादी के समर्थन में होते हैं. ऐसे में ये बयान एक तरह से जनता को आकर्षित करने के लिए भी दिया गया है.
मुशर्रफ़ के इस बयान को भले ही पाकिस्तान की सत्ता और संस्थानों में शामिल लोग तवज्जों न दें लेकिन उन्होंने जनता के एक हिस्से का ध्यान खींचने की कोशिश तो की ही है.
ये भी लगता है कि पाकिस्तान में सरकारें कहीं न कहीं जमात-उद-दावा जैसे संगठनों का समर्थन करती हैं. अगर सरकार सीधे तौर पर समर्थन न भी करें तो सरकार में शामिल कुछ लोग होते हैं जो इनके हिमायती होते हैं.
भले ही सरकार की कोई नीति इन संगठनों के सहयोग की न हो लेकिन फिर भी वो लोग किसी न किसी तरह ऐसे संगठनों को मदद पहुंचा रहे होते हैं. यदि बहुत ज़्यादा भी नहीं तो राजनीतिक समर्थन तो रहता है जिसमें जलसों और रैलियों में मदद देना शामिल रहता है.
लेकिन आमतौर पर पाकिस्तान में लोग इन बातों पर प्रतिक्रिया नहीं देते हैं क्योंकि पाकिस्तान में आम धारणा ये है कि पाकिस्तान तीन ओर से असुरक्षित है. वो पाकिस्तान को भारत, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान सीमा पर असुरक्षित समझते हैं.
इन हालात में लोगों का मानना ये है कि पाकिस्तान को अपनी विदेश नीति के तहत पड़ोसी देशों से रिश्ते बेहतर करने चाहिए और जेहादी संगठनों को काबू में रखना चाहिए.
पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान ने इस दिशा में कुछ कामयाबी हासिल भी की है लेकिन हाल ही में जिस तरह इस्लामाबाद में धरना हुआ. एक मज़हबी जमात जो अब सियासी पार्टी भी है ने राजधानी में प्रदर्शन किए उससे लोगों को लग रहा है कि पार्टियां धर्म का इस्तेमाल राजनीति के लिए करती हैं.
मुशर्रफ़ भी धर्म के नाम पर लोगों से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन मुशर्रफ़ जब पाकिस्तान आए थे तो उनका बहुत अच्छा स्वागत नहीं हुआ था. दो ढाई हज़ार लोग भी नहीं जुट पाए थे.
ऐसे में ये कहा जा सकता है कि मुशर्रफ़ अब राजनीतिक रूप से सिर्फ़ बयान देने तक ही सीमित रह गए हैं. उनके बारे में ये मशहूर भी है कि वो ख़बर देने में महारथ रखते हैं.
पाकिस्तान में इस समय राजनीतिक रूप से अनिश्चितता का दौर है, आर्थिक हालात बेहद ख़राब हैं और पार्टियों के बीच कई मुद्दों पर एकराय नहीं है. चुनाव अगले साल मई में होने हैं लेकिन अभी ये निश्चित नहीं है कि चुनाव मई में हो ही जाएंगे.
डेढ़ साल से पनामा मामले में फंसी सरकार कुछ नहीं कर पा रही है. नवाज़ शरीफ़ पद से हट गए हैं और जो प्रधानमंत्री हैं वो अभी भी मानते हैं कि सरकार को शरीफ़ ही चला रहे हैं.
इमरान ख़ान की तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी को छोड़कर कोई भी पार्टी चुनावों की बात नहीं कर रही है. नवाज़ शरीफ़ की पार्टी को अपना वोट बैंक हिलता हुआ दिख रहा है. ऐसे में चुनाव कब होंगे और उनमें मुशर्रफ़ की भूमिका क्या होगी ये कहना अभी जल्दबाज़ी होगी, लेकिन एक बात पाकिस्तान के बारे में पक्की है कि यहां लोगों का झुकाव धर्म की ओर ज़्यादा है.
मुशर्रफ़ ने लश्कर-ए-तैयबा का समर्थन कर इस झुकाव का फ़ायदा उठाकर सियासी जगह बनाने की कोशिश की है लेकिन ये जगह बनती हुई दिख नहीं रही है.
( बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित)