नज़रिया: हाफ़िज़ सईद की रिहाई का रास्ता पाकिस्तान ने ख़ुद बनाया

    • Author, अजय साहनी
    • पदनाम, रक्षा विशेषज्ञ

पाकिस्तान में ज्यूडिशियल बोर्ड ने जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफ़िज़ सईद की रिहाई का फ़ैसला सुनाया है.

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में जमात-उद-दावा के चीफ़ हाफ़िज़ सईद जनवरी से ही नज़रबंद हैं.

बोर्ड का कहना है कि पाकिस्तानी सरकार हाफ़िज़ सईद के ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं दे पाई है और अब उन्हें और नज़रबंद रखने का कोई मतलब नहीं रह गया है.

भारत ने इस मामले में जितने डोजियर और सबूत दिए थे, पाकिस्तान उन्हें बतौर साक्ष्य स्वीकार नहीं करता है.

इसके अलावा मुक़दमे और तफ़्तीश से जुड़ी पाकिस्तान की अपनी सरकारी एजेंसियों ने खुद अदालत के सामने कोई ठोस सबूत नहीं रखे हैं.

इसे समझने की ज़रूरत है. दूसरे मुक़दमों में ये पहले भी हो चुका है.

पाकिस्तान में न्यायिक प्रक्रिया?

पाकिस्तान एक तरफ़ तो न्यायिक प्रक्रिया का पालन करने का दिखावा भी करता है. वहीं, दूसरी तरफ़ मुक़दमे और तफ़्तीश को आगे बढ़ाने के लिए भी कुछ करता भी नहीं है.

मानो इस न्यायिक प्रक्रिया का नतीज़े पहले से तय कर लिया गया है कि आख़िर में अभियुक्तों को छोड़ दिया जाएगा. इस न्यायिक प्रक्रिया से कोई उम्मीद रखना बेमानी है.

ये समझना जरूरी है कि जो लोग इस केस में शामिल हैं, वो सभी पाकिस्तान की सरकारी एजेंसियों के हथियार हैं. ये सरकारी एजेंसियां इनके ख़िलाफ़ कुछ नहीं करने वाली हैं.

ये भी याद रखने की ज़रूरत है कि मुंबई हमलों के केस में ही दो अभियुक्तों को अमरीका में दोषी करार दिया जा चुका है.

इस मुक़दमे में हाफ़िज़ सईद और पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के शामिल होने से जुड़े सारे सबूत रखे गए थे.

उसी आईएसआई के दबाव में काम करने वाली क़ानूनी एजेंसियां जैसे अभियोजन से लेकर कोर्ट तक से कैसे ये उम्मीद रखी जा सकती है कि वे इंसाफ़ करेंगे.

भारत के पास मौजूद विकल्प

मौजूदा हालात में भारत के पास कोई विकल्प नहीं है, कानूनी प्रक्रिया सिर्फ तब पूरी होगी जब तक पाकिस्तान भारत के ख़िलाफ़ दहशतगर्दी की मुहिम से किनारा कर ले.

जब तक वो ये तय नहीं करते कि इससे उन्हें कोई फायदा नहीं मिल रहा है तब तक पाकिस्तानी एजेंसियों से ये उम्मीद रखना कि वो वहां इंसाफ होने देंगे ये बिलकुल गलत उम्मीद होगी.

हमारे लिए जरूरी है कि हम अपनी क्षमताएं बढ़ाएं और पाक पर दबाव बना सकें कि वो भारतीय जमीन पर किसी तरह की दहशतगर्द हरकत को अंजाम ना दे सके.

इसके अलावा दबाव बनाने के लिए ख़ुफ़िया तरीकों को प्रयोग में लाया जाता है.

इनसे दबाव बनाया जा सकता ताकि पाकिस्तान में इन तत्वों के लिए इतनी आसानी से ऑपरेशन चलाने और नए लड़ाकों को भर्ती करने, योजना बनाने और वहां से दहशतगर्द योजनाओं को अंजाम देना मुनासिब न हो सके.

क्या अमरीका से बेख़ौफ़ है पाकिस्तान

अमरीका की प्राथमिकता ये नहीं है कि भारत में आतंकवाद से जुड़ी घटनाएं ना हों लेकिन ये जरूर है कि अफगानिस्तान में तैनात अमरीकी फ़ौजियों की जान को कोई नुकसान ना हो.

साल 2001 से लेकर आज तक 2000 से ज़्यादा अमरीकी फ़ौजी तालिबानी और हक्कानी नेटवर्क के साथ लड़ाई में मारे गए हैं.

अमरीका खुद खुलेआम ये कहता है कि ये तत्व पाकिस्तान से अपने मंसूबों को अंजाम देते हैं.

पाक में सुरक्षित ठिकाने हैं जहां से ये दहशतगर्द आते हैं और हमला करके वापस भाग जाते हैं.

अमरीका इन मामलों में हक्कानी नेटवर्क के ख़िलाफ़ पाक पर दबाव नहीं बना पाया है.

ऐसे में ये विश्व संस्थाएं और अमरीका जब खुद अपना नुकसान नहीं रोक पा रहे हैं तो भारत को हो रहे नुकसान को कैसे रोकेंगे.

(बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी के साथ बातचीत पर आधारित)

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