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नज़रिया: ‘पाकिस्तान पर हाफ़िज़ सईद का बोझ’
- Author, मोहम्मद हनीफ़
- पदनाम, पत्रकार और विश्लेषक, पाकिस्तान
ज़बान पहले बेअदब हुई थी अब गुस्ताख़ होने लगी है. जिस दिन डॉन अख़बार ने रिपोर्ट किया कि राजनेताओं ने जनरलों से दबे लफ़्ज़ों में पूछा कि हाफ़िज़ सईद का क्या करना है. उसी दिन सत्तारुढ़ पार्टी के एक नेता ने कहा कि हाफ़िज़ सईद हमारे लिए कौन से अंडे देते हैं कि हम पूरी दुनिया को जवाब देते फिरें.
अब हमारे विदेश मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने पूरी दुनिया के सामने कैमरे पर आकर कहा कि हाफ़िज़ सईद पाकिस्तान पर बोझ है. उन्होंने कुछ दूसरे गिरोहों के नाम भी लिए लेकिन कल तक हम उन गिरोहों के वजूद से इनकार करते थे.
लेकिन हाफ़िज़ सईद तो इस धरती के सपूत हैं और पूरी दुनिया में जाने पहचाने जाते हैं. जब पड़ोसी देश उन्हें दहशतगर्द कहता है तो हमारे दिलों से नारा-ए-तकबीर की आवाज़ बुलंद होती है. जब हमारा पूर्व सहयोगी उनके सिर पर 10 मिलियन का ईनाम रखता है तो हम उसे सीने का तमग़ा समझता हैं और पूरी क़ौम उनके आसपास दीवार बनकर खड़ी हो जाती है.
हाफ़िज़ कैसे बने बोझ?
हम एक पारंपरिक और क्रूर समाज हैं जहां विधवाओं, मज़दूरों और घर के बुज़ुर्गों को बोझ समझा जाता है. आख़िरी बार हमने हाफ़िज़ सईद की तस्वीर देखी तो वह घोड़े पर सवार थे और यक़ीनन कश्मीर या फ़लस्तीन या चेचन्या को आज़ाद करवाने के सफ़र पर थे.
पाकिस्तान का पहला मुजाहिदीन इस देश के लिए बोझ कैसे हो गया?
यह तो हाफ़िज़ सईद की शराफ़त है कि उन्होंने यह नहीं कहा कि वह देश पर बोझ नहीं हैं बल्कि ये देश उन पर बोझ है. आख़िर उन्होंने कब से इस देश की रक्षा नीति का आधा बोझ अपने कंधों पर उठाया हुआ है.
साथ ही हाफ़िज़ सईद की शराफ़त है कि उन्होंने ये सब कहने की जगह ख़्वाजा साहब पर दस करोड़ की मानहानि का दावा किया है. इस पर भी देश पूछता है कि सिर्फ़ दस करोड़, उससे दस गुना रक़म तो अमरीका आप के सिर के लिए देने को तैयार है.
कोर्ट में पेश होने के लिए बनाया गया रक्षा मंत्री
ख़्वाजा आसिफ़ जो हाफ़िज़ सईद को बोझ साबित करने पर तुले हैं विदेश मंत्री बनने से पहले रक्षा मंत्री हुआ करते थे. हम अकसर भूल जाते हैं कि असल में रक्षा मंत्री उस वक़्त तक तकरीबन पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ होते थे.
सुप्रीम कोर्ट ने लापता लोगों के केस में आदेश जारी किया था कि रक्षा मंत्री ख़ुद पेश हों. नवाज़ शरीफ़ ख़ुद न पेश हों इसलिए ख़्वाजा आसिफ़ को रक्षा मंत्री बनाया जो फौरन कोर्ट में पेश हुए. कोर्ट से डांट खाने के बाद वह गुमशुदा लोगों को ढूंढने के बजाय सीधे कराची प्रेस क्लब पहुंचे जहां बलोच गुमशुदा लोगों का कैंप लगा हुआ था. वहां जाकर उन्होंने लोगों से वापस अपने घर चले जाने की पेशकश की और वह ट्रेन का किराया ख़ुद देने को तैयार हैं.
लगता है कि अब विदेश मंत्री बनकर भी ख़्वाजा आसिफ़ की जेब में सिर्फ़ ट्रेन का किराया है लेकिन उन्हें ये नहीं पता कि ट्रेन स्टेशन से कब की निकल चुकी.
हाफ़िज़ सईद की घोड़े की लगाम पकड़कर चलने वाले और उनको बोझ क़रार देने वाले सब इस बात पर सहमत हैं कि हाफ़िज़ सईद और उनके मुजाहिदीनों ने हमारा कुछ नहीं बिगाड़ा, न कभी हमारी मस्जिद पर हमला किया, न हमारे स्कूलों में घुसकर हमारे बच्चों को शहीद किया, न कभी सेना मुख्यालय पर वार किया बल्कि अगर कभी वह उस तरफ़ गए भी होंगे तो एक ख़ास मेहमान बनकर.
दुश्मन मुल्क कहता है कि उन्होंने मुंबई में कुछ किया तो हम एक सुर में कहते हैं कि पहली बात तो कुछ किया ही नहीं और अगर किया तो तुम्हारे पास सबूत क्या हैं?
10 करोड़ अरब का मुकदमा हो
विरोधी ज़रूर कहेंगे लेकिन उन्हें कहने से पहले दाएं-बाएं ये देखना चाहिए कि जनाब आपने अगर न मुल्क के अंदर जिहाद किया और न ही मुल्क के बाहर तो फिर आप करते क्या हैं.
लेकिन अपनों के हाथों मानहानि और उस पर भी सिर्फ़ 10 करोड़ का मुकदमा? इतने में तो डिफेंस में दो छोटे प्लाट भी नहीं आते.
इस ग़रीब देश को हिसाब-किताब की कम समझ है. इसने बड़ी गिनती भी सिर्फ़ दुश्मन देश की फ़िल्में देखकर सीखी हैं जिसमें हर सौदा, हर रिश्वत हज़ारों करोड़ों में होती है.
हाफ़िज़ सईद को चाहिए था कि वह कम से कम दस करोड़ अरब का मुकदमा करते तो दुश्मन देश पर भी धाक बैठती और ख़्वाजा आसिफ़ को भी पता चलता कि उनके विदेश मंत्रालय की ट्रेन असल में कौन चला रहा है.
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