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रोहिंग्या संकट: रख़ाइन दौरे पर क्या बोलीं आंग सान सू ची
म्यांमार की सर्वोच्च नेता आंग सान सू ची ने बीते अगस्त में हिंसा भड़कने के बाद पहली बार रख़ाइन प्रांत का दौरा किया है.
सू ची अपने इस दौरे में रोहिंग्या चरमपंथियों के ख़िलाफ़ सेना के ऑपरेशन की वजह से प्रभावित इलाकों में रुकीं.
जातीय हिंसा के आरोपों के बीच आंग सान सू ची की दुनियाभर में सैन्य अभियान को रोकने में असफल रहने पर निंदा की जा रही है.
बीते 25 अगस्त से अब तक लगभग छह लाख रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार से भागकर बांग्लादेश पहुंच चुके हैं.
सू ची अपनी अघोषित एक दिवसीय यात्रा में प्रांतीय राजधानी सित्वे और दूसरे कस्बों में पहुंचीं.
ज़्यादातर रोहिंग्या समुदाय अब बांग्लादेश पहुंच चुके हैं. लेकिन सू ची ने अब तक म्यांमार छोड़कर नहीं जाने वाले एक मुस्लिम समुदाय से मुलाक़ात की.
रोहिंग्या पर रणनीति
बीबीसी संवाददाता जोनाथन हेड कहते हैं कि इस यात्रा पर सू ची का म्यांमार के सबसे अमीर व्यवसायी के साथ जाना बताता है कि नागरिक सरकार अब रख़ाइन को अपने नेतृत्व में लेती हुई दिखना चाहती है.
सू ची तर्क देती हैं कि रखाइन से जुड़ी समस्याएं विकास और निवेश से हल की जा सकती हैं.
लेकिन उन्होंने सीमा पर रह रहे दस लाख रोहिंग्या मुसलमानों के मुद्दे पर कोई बात नहीं की.
हालांकि, इससे पहले वह कह चुकी हैं कि रोहिंग्या मुसलमानों को वापस आने दिया जाएगा.
लेकिन सैन्य दबाव के साथ व्यापक रूप से मुसलमानों के घरों को नष्ट किए जाने के बाद अंतर्राष्ट्रीय मदद और जांच के बिना ये उचित पहल नहीं कही जाएगी.
रोहिंग्या मुसलमानों पर हमले में शामिल हुए रख़ाइन के बौद्धों ने कहा है कि सरकार मान भी जाए, तब भी वह इसके लिए तैयार नहीं होंगे.
रख़ाइन में हिंसा म्यांमार पुलिस थानों पर घातक हमलों का आरोप अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी पर लगने के साथ शुरू हुई.
इसके बाद सैन्य अभियान में कई लोगों की मौत हुई है. इसके साथ ही रोहिंग्या गांवों को जलाए जाने और उन्हें भगाने के भी आरोप हैं.
म्यांमार की सेना कहती है कि सैन्य अभियान में सिर्फ़ चरमपंथियों को निशाना बनाया गया है. म्यांमार सेना कई बार नागरिकों पर हमला करने से इनकार कर चुकी है.
लेकिन चश्मदीदों, शरणार्थियों और कई पत्रकारों ने रोहिंग्या के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई की बात कही है.
रोहिंग्या मुसलमानों पर क्या बोलीं सू ची
गुरुवार को सरकार के प्रवक्ता जॉ ह्ते ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया कि सू ची सित्वे में थी और वह मंगडाव और बुथीदुआंग जाएंगी.
सितंबर में सू ची ने अधिकारों के हनन की निंदा की, लेकिन उन्होंने इसके लिए सेना पर आरोप नहीं लगाया. इसके साथ ही नस्लीय सफाई के मुद्दे पर भी बात नहीं की.
सू ची ने हाल ही में एक योजना बनाई है जिसके तहत वह रख़ाइन में समस्याओं को दूर करना चाहती हैं.
उन्होंने कहा है कि नागरिक सरकार स्थानीय व्यवसाइयों और अंतरराष्ट्रीय दानकर्ताओं के साथ मिलकर योजना तैयार करेगी.
हालांकि, अब तक अंतर्राष्ट्रीय सहायता संस्थाओं को हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में जाने की अनुमति नहीं मिली है. इसके साथ ही बांग्लादेश सरकार के साथ रोहिंग्या शरणार्थियों की स्वदेश वापसी को लेकर किसी तरह की सहमति नहीं बनी है.
कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान
म्यांमार सरकार की 2014 की जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक रख़ाइन की कुल आबादी करीब 21 लाख है, जिसमें से 20 लाख बौद्ध हैं. यहां करीब 29 हजार मुसलमान रहते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक राज्य की करीब 10 लाख की आबादी को जनगणना में शामिल नहीं किया गया था.
रिपोर्ट में इस 10 लाख की आबादी को मूल रूप से इस्लाम धर्म को मानने वाला बताया गया है.
जनगणना में शामिल नहीं की गई आबादी को रोहिंग्या मुसलमान माना जाता है. इनके बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं.
सरकार ने उन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है. हालांकि वे पीढ़ियों से म्यांमार में रह रहे हैं.
रख़ाइन प्रांत में 2012 से सांप्रदायिक हिंसा जारी है. इस हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जानें गई हैं और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं.
बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान आज भी जर्जर कैंपों में रह रहे हैं. रोहिंग्या मुसलमानों को व्यापक पैमाने पर भेदभाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है.
लाखों की संख्या में बिना दस्तावेज़ वाले रोहिंग्या बांग्लादेश में रह रहे हैं. इन्होंने दशकों पहले म्यांमार छोड़ दिया था.
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