बांग्लादेश: क्यों चर्चा में हैं हिंदू चीफ़ जस्टिस

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बांग्लादेश की मीडिया में देश के पहले हिंदू मुख्य न्यायाधीश सुर्खियों में हैं और इसकी वजह है उनका एक महीने की छुट्टी पर जाना.
कहा जा रहा है कि सरकार के ख़िलाफ एक ऐतिहासिक फ़ैसला देने के बाद उन्हें फोर्स लीव या छुट्टी पर जाने के लिए मजबूर किया गया है.
समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक़ बांग्लादेश के क़ानून मंत्री अनिसुल हक़ ने इन मीडिया रिपोर्टो को खारिज़ किया है.
उन्होंने कहा कि जस्टिस सिन्हा की गैरमौजूदगी का 16वें संविधान संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कोई संबंध नहीं हैं और वे बीमारी की वजह से छुट्टी पर गए हैं.
लेकिन बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट के बार एसोसिएशन के प्रमुख जोयनुल आबेदिन ने दावा किया कि जस्टिस सिन्हा को छुट्टी पर जाने के लिए मजबूर किया गया है.

कौन हैं जस्टिस सिन्हा
जस्टिस सुरेंद्र कुमार सिन्हा बांग्लादेश के पहले हिंदू मुख्य न्यायाधीश हैं. उन्होंने 17 जनवरी, 2015 को बांग्लादेश के चीफ़ जस्टिस का कार्यकाल संभाला था.
एक फरवरी 1951 को जन्मे एसके सिन्हा ने क़ानून की डिग्री हासिल करने के बाद 1974 में अधिवक्ता के तौर पर ज़िला न्यायालय में वकालत शुरू की.
1977 के अंत तक वे सत्र न्यायालयों में स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस करते रहे. 1978 में उन्होंने हाई कोर्ट में और 1990 में बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट के अपीलीय डिविज़न में वकालत शुरू की.
इस दौरान उन्होंने जाने माने वकील एसआर पाल के जूनियर के रूप में 1999 तक अपनी सेवा दी.
24 अक्तूबर 1999 में उन्हें हाई कोर्ट के जज और 16 जुलाई 2009 को सुप्रीम कोर्ट के अपीलीय डिविज़न के जज के रूप में नियुक्त किया गया.

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क्या है 16वां संविधान संशोधन
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 16वें संविधान संशोधन के जरिए सुप्रीम कोर्ट के जजों को पद से हटाने का अधिकार संसद को दिया था.
शेख हसीना की आवामी लीग को बांग्लादेश के संसद में बहुमत हासिल है और वकीलों का कहना था कि इससे सुप्रीम कोर्ट के जज सरकार के सामने 'कमज़ोर' पड़ जाएंगे.
इसी साल अगस्त महीने में जस्टिस सिन्हा के नेतृत्व वाले बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट ने 16वें संविधान संशोधन को असंवैधानिक करार दे दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने उस प्रावधान को फिर से बहाल कर दिया जिसके तहत चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली सुप्रीम ज्यूडिशियल काउंसिल ही न्यायिक आचार संहिता भंग करने पर किसी जज को पद से हटा सकती है.
न्यायपालिका की आज़ादी को मजबूत बनाने वाले इस फ़ैसले के लिए जस्टिस सिन्हा को काफी सराहना मिली.
इस फैसले को मुस्लिम बहुमत वाले एक देश में धर्मनिरपेक्ष न्यायपालिका की सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम बताया गया.
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