ब्लॉगः जीतीं कुलसुम, पर चर्चा में हाफ़िज़ सईद

लाहौर चुनाव

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, वुसतुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, पाकिस्तान से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

इस वक्त पाकिस्तान में मीडिया को कौमी असेंबली के हलका (निर्वाचन क्षेत्र) 120 लाहौर उपचुनाव का बुखार चढ़ा हुआ है. इसी चुनाव क्षेत्र ने नवाज़ शरीफ़ को तीन बार प्रधानमंत्री के सिंहासन तक पहुंचाया.

इस बार उनकी पत्नी बेग़म कुलसुम नवाज़ ने पाला मारा और तहरीक-ए-इंसाफ़ की उम्मीदवार यास्मिन राशिद को लगभग 15 हज़ार वोटों से हरा दिया.

मगर इस चुनाव के नतीजों से भी ज़्यादा अहम बात जिसकी तरफ़ मीडिया का ध्यान कम गया वो ये है कि मुस्लिम लीग नवाज़ और तहरीक-ए-इंसाफ़ के बाद तीसरे नंबर पर एक ऐसे निर्दलीय उम्मीदवार ने पांच हज़ार वोट लिए जिसे लश्कर-ए-तैयबा उर्फ़ जमात-उद-दावा के लीडर हाफ़िज़ मोहम्मद सईद का समर्थन हासिल है.

हाफ़िज सईद

इमेज स्रोत, Getty Images

मिल्ली मुस्लिम लीग

जबकि आसिफ़ अली ज़रदारी की पार्टी को सिर्फ़ ढाई हज़ार वोट मिले. शेख़ मोहम्मद याकूब का चुनाव प्रचार जमात-उद-दावा के पेट से डेढ़ महीने पहले निकली मिल्ली मुस्लिम लीग के वर्कर्स ने किया.

यूं समझिए कि जो ताल्लुक़ बीजेपी का आरएसएस से है वही ताल्लुक मिल्ली मुस्लिम लीग का हाफ़िज़ सईद की जमात उद दावा से है.

मगर चूंकि मिल्ली मुस्लिम लीग अभी चुनाव आयोग में नामांकित नहीं, इसलिए उसके उम्मीदवार ने निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा. मिल्ली मुस्लिम लीग ने चुनाव प्रचार में अच्छा-ख़ासा पैसा ख़र्च किया.

ऑडियो कैप्शन, सत्तर साल में लोकतंत्र की गाड़ी कुछ तो खिसकी

नागरिक सरकार

उसकी रैलियों में हाफ़िज़ सईद के पोस्टर भी नज़र आए, हालांकि चुनाव आयोग ने सख़्ती से मना किया है कि जिन लोगों पर चरमपंथ का आरोप है उनका नाम चुनाव प्रचार में इस्तेमाल नहीं हो सकता.

ख़ुद हाफ़िज़ सईद जनवरी से अपने घर में क़ैद हैं. मिल्ली मुस्लिम लीग का अपनी पैदाइश के चंद हफ़्ते बाद ही चुनाव में हिस्सा लेना और तीसरे नंबर पर आना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जबसे राष्ट्रपति ट्रंप और बीजिंग में ब्रिक्स नेताओं की बैठक की तरफ़ से पाकिस्तान को कहा गया है कि वो अपने यहां ऐसे गिरोहों को रोके जिनपर इलाके में चरमपंथ फैलाने का आरोप है.

तब से पाकिस्तानी सरकार में दो तरह की बहस चल रही है. सिविलियन हुक़ूमत चाहती है कि विदेश नीति में कड़ा बदलाव लाया जाए क्योंकि अब सिर्फ़ ये कहने से दुनिया मुतमइन नहीं होगी कि पाकिस्तान का अतिवादी संगठनों से कोई लेना-देना नहीं.

हाफ़िज सईद

इमेज स्रोत, Getty Images

हाफ़िज़ सईद और शेर की सवारी

दूसरी तरफ़ से ये दलील दी जाती है कि अगर अतिवादियों को राष्ट्र की राजनीतिक धारा में शामिल कर लिया जाए तो हम दुनिया से कह सकते हैं कि हमने इनलोगों को एक नया रास्ता सुझाया है जिसमें चरमपंथ की कोई गुंजाइश नहीं.

पर मुश्किल ये है कि अगर कल के चरमपंथी आज के लोकतांत्रिक सियासत का हिस्सा अपने उसी नज़रिए के साथ बनते हैं जिससे बाकी दुनिया चिंतित है तो ऐसी स्थिति में उन्हें मुख्यधारा में लाने का खुद देश को क्या लाभ होगा.

एक जानेमाने टीकाकार ख़ालिद अहमद का मानना है कि अगर हाफ़िज़ सईद क़ौमी सियासत का हिस्सा बनते हैं तो ऐसा नहीं होगा कि हाफ़िज़ साहब अपना अतिवादी नज़रिया छोड़ देंगे.

वीडियो कैप्शन, पनामा पर फ़ैसला

अंतरराष्ट्रीय पाबंदी

बल्कि इन जैसों के आने से देश की सियासत भी चरमपंथ के रास्ते पर चल सकती है. और तब तो हाफ़िज़ सईद के पीछे लाखों वोट भी होंगे.

तब उन्हें कौन और कैसे कंट्रोल करेगा. ये तज़ुर्बा शेर की पीठ पे सवारी का जानलेवा शौक़ भी साबित हो सकता है.

और ये नौबत भी आ सकती है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों से बचने के चक्कर में किसी खाई में न जा गिरे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)