You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ग्राउंड रिपोर्ट: बांग्लादेश में रोहिंग्या मुसलमानों का "दर्द न जाने कोय"
- Author, प्रतीक्षा घिल्डियाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार के कुटापलौंग से
म्यांमार के रखाइन प्रांत में हिंसा से प्रभावित सैंकड़ों अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश की तरफ पलायन कर रहे हैं.
ये अपने परिवार और जो कुछ भी सामान साथ आ सका उसे लेकर सीमा पार कर बांग्लादेश पहुंच रहे और वहां बेहद दयनीय स्थिति में जी रहे हैं.
कॉक्स बाज़ार से क़रीब एक घंटे की दूरी पर है कुटापलौंग जहां पर एक बड़ा शरणार्थी शिविर है.
पिछले कई सालों से आए रोहिंग्या शरणार्थी यहां रह रहे हैं. यहां हमने सुना है कि बीस तीस हज़ार शरणार्थी रहते थे. लेकिन पिछले कुछ हफ़्तों से यहां काफ़ी लोग आए हैं, और बताया जा रहा है कि अब यहां 70 हज़ार से भी अधिक लोग हैं.
मैंने पहले भी इस शिविर का दौरा किया है और पाया कि पीने का स्वच्छ पानी यहां की बड़ी ज़रूरत है.
कुछ सहायता एजेंसियां मदद पहुंचाने के लिए यहां कैंप लगाए हुए हैं लेकिन यहां दिन पर दिन लोगों की समस्या बढ़ती ही जा रही है और म्यांमार की तरफ से पलायन भी रुक नहीं रहा.
म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों का आगमन जारी है, हालांकि आने वालों की संख्या में फिलहाल थोड़ी कमी आई है.
जिस दिन हम पहुंचे तो सड़क कुटापलौंग की सड़क के दोनों तरफ़ रोहिंग्या शरणार्थियों की भीड़ लगी हुई थी. लोग रहने की जगह तलाशने के लिए चले जा रहे थे.
पलायन कर आने वालों में हर उम्र के लोग दिख जाएंगे. छोटे छोटे बच्चों के साथ किसी तरह जान बचाकर बांग्लादेश पहुंचीं महिलाएं रहने की जगह की तलाश में भटक रही हैं.
सहायता एजेंसियां मदद की कोशिश कर तो रही हैं लेकिन ऐसा लगता है कि सहायता सामग्री पहुंचाने में कोई तालमेल नहीं है.
सहायता की दरकार
सहायता सामग्री लेकर जैसे ही कोई ट्रक आता है, आस पास अफ़रा तफ़री मच जाती है. सामानों को कर्मचारी ट्रक के ऊपर से लोगों तक देने की कोशिश करते हैं.
संयुक्त राष्ट्र की सहायता एजेंसी ने भी और तालमेल की ज़रूरत को माना है.
एजेंसी का ये भी कहना है कि बांग्लादेश की सरकार की ओर से कुछ खास इलाकों में ही काम करने की पाबंदी ने इस समस्या को बढ़ाया है. इसलिए कुछ ही कैंप हैं, जहां उन्हें काम करने की इजाज़त है.
जो शरणार्थी दूर दराज़ या कैंप से अलग रह रहे हैं, उनतक कोई सहायता सामग्री नहीं पहुंच पा रही है.
नवजातों की भारी संख्या
शरणार्थियों में बच्चों और महिलाओं की संख्या अधिक है. इनमें से नवजात बच्चों की भी भारी संख्या है.
शरणार्थियों को सबसे अधिक समस्या रहने की आ रही है. आने वाले लोग यहां के व्यापारियों से बांस खरीदते हैं. वे बांस के सहारे तारपोलीन लगाकर झुग्गीनुमा घर बनाते हैं.
रहने को घर नहीं
उनके रहने के लिए झोपड़ी तक नहीं है.
हालात ये है कि तारपोलीन से बने ऐसी जगहों में 20-20 लोग रह रहे हैं.
अभी हाल ही में म्यांमार से बांग्लादेश पहुंचे कुछ शरणार्थियों ने बताया कि उनकी तरह ही हज़ारों लोग अभी सीमा के उस पार हैं, जो यहां आना चाहते हैं.
जिनके पास पैसा है, वो नाव के सहारे इस तरफ़ आ जा रहे हैं, लेकिन जिनके पास पैसा नहीं है, वो एक तरह से म्यांमार में ही फंसे हुए हैं और उनके दिल में म्यांमार सेना का बहुत डर समाया हुआ है.
उन्हें लगता है कि अगर वो यहां रहे और पकड़ गए तो मार दिए जाएंगे.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)