रोहिंग्या संकट: अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने कितना झुकेगा म्यांमार?

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म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ जारी हिंसा को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता जा रहा है.
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा है कि वो रोहिंग्या मुसलमानों को वापस लेने के लिए म्यांमार पर दबाव डालेंगी.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो ग्वेटरेस ने भी म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों को आज़ादी, रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग की है.
अंतरराष्ट्रीय दबाव
दूसरी तरफ तुर्की के विदेशी मंत्री बुधवार को बांग्लादेश पहुंच रहे हैं. माना जा रहा है कि उनके इस दौरे में रोहिंग्या संकट पर भी बात हो सकेगी.
मंगलवार को इंडोनेशिया के विदेश मंत्री ने इसी मुद्दे पर बात करने के लिए मंगलवार को ढाका का दौरा किया था.
लेकिन सवाल उठता है कि जब सारी दुनिया रोहिंग्या संकट को लेकर म्यांमार की तरफ देख रही है तो क्या उस पर इसे सुलझाने के लिए कोई अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ेगा.
सैनिक कार्रवाई का विकल्प
ढाका यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मोहम्मद शाहिदुज़्ज़मन ने बीबीसी को बताया कि म्यांमार को अलग-थलग रहने की लंबे समय से आदत रही है. वे अंतरराष्ट्रीय दबाव को बहुत अधिक तवज्जो नहीं देने वाले हैं.
उन्होंने कहा, "उनके पास अपने पर्याप्त संसाधन हैं. चीन संयुक्त राष्ट्र में उनके साथ खड़ा होता आया है. और देश को एक रखने के लिए वे सत्तर सालों से ताकत का इस्तेमाल करते आए हैं."
हालांकि मोहम्मद शाहिदुज़्ज़मन का मानना है कि म्यांमार को सैन्य कार्रवाई का डर दिखाया जा सकता है.
रोहिंग्या मुसलमान
उनका कहना है कि इसे हासिल करने के लिए बांग्लादेश, तुर्की और इंडोनेशिया के बीच एक सैनिक गठबंधन बनाया जा सकता है.
उन्होंने कहा, "अगर कोई सैनिक गठबंधन म्यांमार को रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ कार्रवाई बंद नहीं करने पर अंजाम भुगतने की चेतावनी देता है तो शायद दबाव पड़े. ऐसी सूरत में सैनिक कार्रवाई नामुमकिन नहीं है और बर्मा के सैनिक शासक इस भाषा को समझते हैं."
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