क़तर पर हुकूमत करने वाला खानदान

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कुछ लोग क़तर को फ़ारस की खाड़ी की 'बिगड़ी औलाद' क़रार देते हैं. यहां तक कि पिछले 150 सालों से क़तर पर हुकूमत कर रहे अल-थानी खानदान को 'पड़ोस का सबसे मुश्किल परिवार' क़रार देने वाले लोग भी मिल जाते हैं.
क़तर अपने पड़ोसी मुल्कों से कूटनीतिक विवाद में उलझा हुआ है. सऊदी अरब, बहरीन और मिस्र को क़तर से कुछ शिकायते हैं और उन्होंने कूटनीतिक रिश्ते तोड़ लिए हैं. ये मुल्क क़तर पर चरमपंथी गतिविधियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं जिससे दोहा इनकार करता है.
लेकिन विशेषज्ञ प्रति व्यक्ति सबसे ज्यादा आमदनी वाले इस छोटे से देश के अतीत में समस्याओं की वजह देखते हैं. उनका कहना है कि बीते कल में कृतर मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले में बदनाम रहा है.
क़तर एक मुल्क के तौर पर 1850 में वजूद में आया और तभी से अल-थानी खानदान यहां हुकूमत में है. पीढ़ियों से यहां खानदान के वारिसों को सत्ता मिलती रही लेकिन ऐसा भी नहीं है कि क़तर इन बदलावों को खामोशी से देखा.

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अल-थानी ख़ानदान
लंदन में रॉयल इंस्टीट्यूट्स ऑफ इंटरनेशनल अफ़ेयर्स में मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ पीटर सैलिसबरी कहते हैं, "एक परिवार ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े पर हुकूमत कर रहा था. इसकी अपनी कोई ख़ास अहमियत नहीं थी. लंबे समय से इसे सऊदी अरब के एक सूबे के तौर पर भी देखा गया. लेकिन वक्त के साथ-साथ वे बड़े मुल्कों के इस इलाके में अपना वजूद खड़ा करने में कामयाब रहे."
1980 और 1990 के दशक के दौरान क़तर के आमिर खलीफा बिन हमाद अल-थानी और सरकार में बैठे अल-थानी खानदान के दूसरे सदस्यों ने तय किया कि क़तर दूसरों के मामलों में दखल नहीं देगा.
शुरू में ये माना गया कि वे जानबूझकर अलग-थलग रहना चाहते हैं लेकिन अल-थानी खानदान की चिंता क़तर के भीतर अमन कायम रखने को लेकर ज्यादा थी.
लेकिन 1995 में सबकुछ बदल गया. आमिर के शहज़ादे हमाद बिन ख़लीफ़ा अल-थानी ने अपने अब्बा की गैरमौजूदगी में बिना किसी ख़ून ख़राबे के उनकी सल्तनत का तख्तापलट कर दिया.

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सऊदी अरब से रिश्ते
जब शहज़ादे हमाद बिन खलीफा अल-थानी हुकूमत पर कब्जा कर रहे थे तो उनके वालिद आमिर खलीफा बिन हमाद अल-थानी स्विट्ज़रलैंड के दौरे पर थे.
पीटर सैलिसबरी के मुताबिक इस वाकये ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को लेकर अल-थानी खानदान के रवैये को ही पूरी तरह से बदल दिया. वे कहते हैं, "अलग-थानी खानदान पिछले 20 सालों में जिस तेजी से बदला है, उसकी वजह से कुछ लोग उन्हें मुसीबत करार देने लगे हैं."
पीटर सैलिसबरी के मुताबिक, "कबायलियों का एक खानदान जिसके रिश्ते सऊदी अरब से हुआ करते थे और जिन्हें नाकाबिलेगौर समझा जाता था, देखते ही देखते अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शिरकत करने वाले नामचीन कद्दावर लोगों का कुनबा बन गया." वे आगे कहते हैं, "और जैसा कि हमने देखा इससे संदेह बढ़े."
हमाद बिन खलीफा अल-थानी के अब्बा आमिर खलीफा बिन हमाद अल-थानी के सऊदी अरब के साथ करीबी रिश्ते थे लेकिन शहजादे के हुकूमत में आने के बाद तस्वीर बदली. उनकी नीतियों की वजह से पड़ोसी मुल्कों से क़तर के मतभेद बढ़ने लगे. क़तर के मामले में जो कुछ हुआ, उसे पड़ोसी मुल्क़ एक खराब उदाहरण के तौर पर देखते हैं.

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एलएनजी का निर्यात
हालांकि क़तर के पड़ोसी मुल्कों में भी राजशाही निज़ाम ही है. शेख हमाद ने सत्ता में आते ही प्राकृति गैस के भंडारों के विकास को नई रफ्तार दी. 1996 में क़तर इतिहास में पहली बार एलएनजी का निर्यात करने लगा.
इसी साल शेख हमाद की हुकूमत का तख्ता पलटने का इलजाम सऊदी अरब पर लगा. कहा गया कि सऊदी अरब शेख खलीफा को सत्ता में फिर से लाना चाहता है. निर्यात से होने वाली आमदनी के बूते क़तर जल्दी ही एक क्षेत्रीय शक्ति बन गया.
आज वो लिक्विफाइड नैचुरल गैस या एलएनजी का सबसे बड़ा निर्यातक देश है. इतना ही नहीं वो सऊदी अरब के सबसे बड़े दुश्मन मुल्क ईरान के साथ मिलकर एलएनजी फील्ड के विकास के लिए काम कर रहा है.
पीटर सैलिसबरी कहते हैं, "पड़ोसी मुल्कों को लगा कि क़तर में बड़े बदलाव हो रहे हैं. शेख खलीफा की हुकूमत बहुत अलग थी. वे खामोशी से शासन कर रहे थे लेकिन शेख हमाद ताजा हवा के झोंके की तरह थे. जवान, ऊर्जा से लबरेज और खुदमुख्तार शेख हमाद बदलाव चाहते थे."

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तमीम बिन हमाद अल-थानी
शेख हमाद और उनके विदेश मंत्री शेख हमान बिन जासिम अल-थानी ने क़तर को एक क्षेत्रीय महाशक्ति और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खड़ा करने में अग्रणी भूमिका निभाई.
आमिर हमाद की हुकूमत में क़तर ने न केवल अपनी अंतरराष्ट्रीय नीति का विस्तार किया बल्कि उन्होंने अल-जज़ीरा नाम का एक न्यूज़ चैनल भी शुरू किया. देखते ही देखते अल-जज़ीरा अरब जगत में एक बड़ी आवाज बनकर उभरा. क़तर दुनिया भर में एक बड़ा ग्लोबल इन्वेस्टर भी है.
साल 2013 में आमिर ने सत्ता छोड़ने और अपने चौथे बेटे तमीम बिन हमाद अल-थानी को राजगद्दी सौंपने का फैसला किया. तमीम बिन हमाद उस समय 33 साल के थे. पड़ोसी मुल्कों को लगा कि नए आमिर का रवैया संतुलन बनाने वाला होगा लेकिन इस उम्मीद की उम्र बहुत कम रही.
मिस्र में मोहम्मद मुर्सी के सत्ता से बेदखल होने के कुछ महीनों बाद शुरुआती ख़बरे सामने आईं कि नए आमिर मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्यों को दोहा में फिर से संगठित होने की इजाज़त दे रहे हैं.

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मुस्लिम ब्रदरहुड
इस सु्न्नी चरमपंथी गुट के अरब जगत में चाहने वाले बढ़ रहे थे. मुस्लिम ब्रदरहुड पर जल्द ही बहरीन, मिस्र, रूस, सीरिया और सऊदी अरब की हुकूमत ने चरमपंथी गुट करार दे दिया. मार्च, 2014 में सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने दोहा से अपने राजदूत वपास बुला लिए.
आज ऐसा ही कुछ फिर से दोहराया जा रहा है. आखिरकार क़तर मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्यों को मुल्कबदर कर तुर्की भेजने के लिए तैयार हो गया और उसी साल नवंबर होते होते विवाद थम गया. इस बीच क़तर दुनिया भर में अपनी दौलत का निवेश करता रहा.
अकेले ब्रिटेन में अल-थानी खानदान ने 50 अरब डॉलर का निवेश कर रखा है. लग्ज़री स्टोरी, यूरोप की सबसे ऊंची गगनचुंबी इमारत, बिजनेस कॉम्प्लेक्स से लेकर ओलम्पिक विलेज तक क़तर ने अपने अकूत दौलत से क्या कुछ नहीं खरीदा.
ब्रेक्सिट से पहले
अब क़तर की दिलचस्पी वेल्स के नैचुरल गैस फील्ड्स में भी है. लंदन की सबसे महंगी इमारतों में आधी, लंदन स्टॉक एक्सचेंज में 8 फीसदी हिस्सा, बार्कलेज़ बैंक में इतनी ही हिस्सेदारी और सुपरमार्केट चेन सेंसबरी में 25 फीसदी शेयर क़तर का है.
पुराने सुल्तान आमिर हमाद की तीन बीवियों में से एक मोज़ाह बिंत नासिर अल-मिसनेद की रिहाइशगाह को लंदन का सबसे महंगा घर करार दिया गया है. कहा जाता है कि अल-थानी ने 2013 में इस घर के लिए 150 मिलियन पाउंड चुकाए थे.
कुल मिलाकर कहा जाए तो लंदन में अल-थानी खानदान के पास महारानी एलिजाबेथ द्वितीय से ज्यादा दौलत है. और इतना सब कुछ काफी नहीं था तो क़तर ने ब्रेक्सिट से पहले ब्रिटेन में और छह अरब डॉलर के निवेश की घोषणा कर दी.
पश्चिमी मुल्कों की दिक्कत
पीटर सैलिसबरी कहते हैं, "शायद यही वजह है कि क़तर और उसके पड़ोसी मुल्कों की उठा-पटक को लेकर ब्रिटेन संदिग्ध रूप से खामोश है. क़तर को लेकर पश्चिमी मुल्क की स्थिति जटिल हो गई है. ब्रिटेन को लगता है कि वो दो पाटों के बीच कहीं फंस गया है."
वे आगे कहते हैं, "ब्रेक्सिट की तैयारियों के वक्त ब्रिटेन ने खाड़ी देशों की हैसियत के मुताबिक अपनी प्राथमिकता सूची बनाई. ये वो देश थे जो ब्रिटेन में निवेश कर सकते थे. अब उसके सामने क़तर और सऊदी अरब के बीच किसी को एक चुनने की दिक्कत है. क़तर ने अपना पैसा ब्रिटेन में लगा रखा है और ब्रितानी सरकार सऊदी अरब के साथ अच्छे रिश्ते बरकरार रखना चाहती है."
पीटर सैलिसबरी के मुताबिक, "फिलहाल किसी को नहीं पता कि संकट कैसे सुलझेगा लेकिन ब्रिटेन समेत दूसरे पश्चिमी मुल्क शायद ये उम्मीद कर रहे हैं कि समस्या जल्दी ही गायब हो जाएगी."
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