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कौन हैं चीन के 'दानवीर कर्ण' अरबपति?
- Author, जूलियाना लियू
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, हांगकांग
चीन के तीन सबसे बड़े परोपकारी व्यक्ति
- 1. टेंसेंट के संस्थापक पोनी मा जिन्होंने द टेंसेंट चैरिटी फ़ाउंडेशन को 2.15 अरब डॉलर का दान दिया.
- 2. टेंसेंट के सह-संस्थापक जिन्होंने वुहान कॉलेज को 615 मिलियन डॉलर दिए.
- 3. बीजिंग ओरिएंट लैंडस्केप के हे कियाओनू जिन्होंने कई चैरिटी संस्थानों को 45 करोड़ डॉलर
कुछ साल पहले जब अमरीकी अरबपति वॉरेन बफ़ेट और बिल गेट्स ने चीन के रईसों को भोज पर बुलाया और उनसे दान देने का आग्रह किया तो बहुत से मेहमान समारोह में पहुंचे ही नहीं.
और फिर सोशल मीडिया पर जमकर बहस हुई: क्या चीन के अरबपति वाक़ई में इतने कंजूस हैं?
कुछ मानकों पर ऐसा ही है. संयु्क्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के मुताबिक अमरीका या यूरोप के मुक़ाबले में चीन के लोग सिर्फ़ चार फ़ीसदी ही दान करते हैं.
चीन के राहत संगठन स्कैंडलों में फंस चुके हैं और निजी दौलत, जिस पर अधिकतर दान निर्भर करता है, को लेकर चीन में व्यापक अविश्वास है.
लेकिन हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और स्विट्ज़रलैंड के बैंक यूबीएस की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक स्थिति कहीं ज़्यादा जटिल है.
रिपोर्ट कहती है, "आजकल चीन में परोपकारिता का विस्तार हो रहा है, इसमें नए प्रयोग किए जा रहे हैं और इसके नए रूप विकसित हो रहे हैं."
शोध के मुताबिक चीन के 100 सबसे बड़े परोपकारी लोगों की ओर से 2016 में किया गया दान क़रीब 4.6 अरब डॉलर है जो 2010 के मुक़ाबले तिगुना हो गया है.
चीन के 200 सबसे अमीर लोगों में से 46 फ़ाउंडेशन चलाते हैं. शोधकर्ताओं ने जिन लोगों से बात की उनमें से एक-तिहाई ने या तो फ़ाउंडेशन शुरू कर दी है या स्थापित करने की प्रक्रिया में हैं.
चीन के सबसे परोपकारी व्यक्ति माने जाने वाले वांग बिंग कहते हैं कि चीन के अरबपति कंजूस नहीं, बस सतर्क हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "मेरे जानने वाले सभी लोग दान करना चाहते हैं. बहुत सा पैसा है जिसे अभी दान नहीं किया गया है."
बिंग ने कहा, "ये लोग स्मार्ट हैं इसलिए ही अमीर हैं. वो अपना पैसा किसी को भी नहीं देना चाहते बल्कि ऐसे संगठनों को देना चाहते हैं जो वास्तव में कुछ करते हैं."
जब उनसे पूछा गया कि चीन में ऐसी कितनी संस्थाएं हैं तो उन्होंने कहा कि बहुत ही कम. 47 वर्षीय वांग ने 90 के दशक में स्टॉक मार्केट में दौलत कमाई थी.
सरकार से जुड़ी संस्थाओं को दान करने के निराशाजनक अनुभवों के बाद वो अपनी ख़ुद की संस्था शुरू करना चाहते हैं.
2004 में उन्होंने ए यू फ़ाउंडेशन शुरू की थी जो बीमार और लावारिस बच्चों की मदद करती है. ये चीन की पहली पंजीकृत निजी संस्था थी.
चीन के शीर्ष अरबपतियों में शामिल अलीबाबा के जैक मा और बायडू के रोबिन ली इस संस्था के निदेशक मंडल में शामिल हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन में परोपरकारी संस्थानों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां हैं आम लोगों का शक़, पारदर्शिता की कमी और अनुभवी लोग.
लेकिन चीन के अमीरों पर नज़र रखने वाले रूपर्ट हूगवर्फ़ का मानना है कि चीन में चैरिटेबल दान को लेकर तेज़ी से बदलाव हो रहे हैं.
उन्होंने कहा, "अब लोग सरकारी संस्थानों को दान करने से दूर हो रहे हैं. ख़ासकर 2011 के स्कैंडल के बाद से."
उस साल एक युवती अपने शानो-शौक़त की जीवनशैली को लेकर चर्चाओं में आ गई थी. उसने चीनी रेडक्रॉस के लिए काम करने का दावा किया था.
हालांकि रेडक्रॉस ने युवती से संबंध होने से इनकार किया लेकिन उसे दान मिलना लगभग बंद हो गया.
पिछले साल अपनी ख़ुद की फ़ाउंडेशन स्थापित करने वाले फ़ैशन डिज़ाइनर माओ जिहांग कहते हैं कि दानकर्ता अब इस स्कैंडल से आगे बढ़ चुके हैं. "वो परोपकारिता के लिए बड़ा झटका था."
वो कहते हैं पिछले साल चैरिटी को लेकर आए नए क़ानून के बाद से दानकर्ताओं का विश्वास बढ़ा है. हार्वर्ड की रिपोर्ट से पता चलता है कि चीन के जीवंत तकनीकी क्षेत्र में नवाचार हो रहा है.
टेंसेंट, अलीबाबा और सीना जैसी तकनीकी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों ने आम लोगों को दान देने के लिए प्रोत्साहित करने और अमीरों से बड़े स्तर पर दान लेने के लिए डेस्कटॉप और मोबाइल प्लेटफॉर्म विकसित किए हैं.
एक शोध के मुताबिक 2015 में चीन में क़रीब 2.3 करोड़ लोगों ने ऑनलाइन चैरिटेबल गिफ़्ट भेजे. और अब टेंसेंट भी अपने प्लेटफ़ार्म पर सालाना दान दिवस मनाता है.
पिछले साल सितंबर में तीन दिन के भीतर ऑनलाइन डोनेशन के ज़रिए 4.4 करोड़ डॉलर इकट्ठा कर लिए गए थे.
इसके बाद टेंसेंट और उसके सहयोगियों ने भी इतना ही दान किया था और बाद में ये रकम 7.7 करोड़ डॉलर तक पहुंच गई थी जिसे हजारों संस्थानों में बांट दिया गया था.
ऐ यू फ़ाउंडेशन के वांग कहते हैं कि उनका उद्देश्य अपनी फ़ाउंडेशन को परोपकारिता का फ़ेसबुक बनाना है- एक सरल प्लेटफ़ार्म जहां लोग दान कर सकें.
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