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जलवायु समझौता तोड़ने पर विश्व भर में निराशा का माहौल, ट्रंप की निंदा
- Author, बीबीसी
- पदनाम, मॉनिटरिंग
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकलने के बाद विश्व मीडिया में निराशा का माहौल है.
पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने साल 2015 में 194 देशों के साथ इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.
चीन में सोशल मीडिया यूजर्स के मुताबिक ट्रंप के इस फैसले के बाद चीन को इस समझौते का नेतृत्व करना चाहिए.
इस फैसले की खबर सामने आने के बाद ट्विटर में #ParisAgreement अंग्रेजी समेत तमाम अन्य भाषाओं में ट्रेंड करता रहा.
अफ्रीकी मीडिया में इस मुद्दे पर सन्नाटा देखा गया है. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और जलवायु आपदाओं के संकट में जीने वाले इस महाद्वीप में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर सजग कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है. लेकिन इस घोषणा के देर से सामने आने की वजह से सुबह के अखबारों में इसे जगह नहीं मिल सकी.
ट्रंप को मिलते हुए समर्थन की बात करें तो अब तक ऐसा करने वालों की संख्या काफी कम है. लेकिन सीरिया और निकारागुआ जैसे देशों में मीडिया ने इसे बड़ी खबर जैसा महत्व नहीं दिया है.
वैसे सीरिया और निकारागुआ इस समझौते पर दस्तखत नहीं करने वाले देशों में शामिल हैं.
जर्मन अखबार डी वेल्ट ने इसे एक बेहतर छुटकारा बताया है.
यूरोप के अखबार
फ्रांस का लिब्रेशन अखबार कहता है, "व्हाइट हाउस पहुंचने के बाद से अमरीकी राष्ट्रपति ये समझ रहे हैं कि ये एक रियलिटी शो है. जबकि ऐसा नहीं है और इस पर इस ग्रह का भविष्य टिका है."
फ्रांस का लेज़ एको अखबार कहता है, "ट्रंप के फैसले से इस करार को किसी तरह का खतरा नहीं क्योंकि सीरिया और निकारागुआ के अलावा सभी देश इसका पालन करते हैं. और जिन्हें राजी करना मुश्किल था, वे देश इस तिकड़ी के साथ खड़े नहीं होना चाहेंगे."
फ्रांस का अखबार ल मोंग्ड कहता है कि ट्रंप के भाषण से किसी भी बहुपक्षीय कदम पर उनका संदेह सामने आता है जिससे सिर्फ अविश्वास की खाई बड़ी होती है.
जर्मन अखबार फ्रैंकफुटर अल्गमाइन साइटुंग के मुताबिक अमरीका वैश्विक जलवायु बचाव में अपनी आर्थिक कम कर रहा है जबकि वह सेना और होमलैंड सिक्योरिटी पर खर्च को बढ़ा रहा है.
जर्मनी के ही एक अन्य अखबार डी वेल्ट ने कहा है कि जो पूरे दिल और ईमानदारी से इसमें हिस्सा नहीं लेते हैं वह देश इस करार के उद्देश्य को भीतर से हिलाते हैं.
रूस के अखबारों का रुख
रूस के सरकारी चैनल ने कहा है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने एक बार फिर वैश्विक समुदाय को हिलाकर रख दिया है. इस बार उन्होंने कहा है कि वह पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकलेंगे जिसकी पूर्व अमरीकी सरकार ने हिमायत की थी. बीती सरकार से अलग राय रखते हुए ट्रंप सोचते हैं कि इससे अमरीकी हित प्रभावित होते हैं.
अमरीकी अखबार
वॉशिंगटन पोस्ट ने कहा है कि ट्रंप ने इस करार का सिर्फ एक पहलू देखा जिसके मुताबिक वह दावा करते हैं कि इससे अमरीकी उद्योग को नुकसान पहुंचता है, लेकिन वह इस करार की मदद से आने वाली नौकरियों की संभावना को अनदेखा करते हैं.
दक्षिणपंथी जलवायु परिवर्तन के खिलाफ राय रखने वाली वेबसाइट ब्रीटबार्ट ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन की बात करने वालों के जाल में फंसने की जगह ट्रंप ने सही मुद्दों पर बात की है जिनमें इस मुद्दे की वजह से नौकरियों पर खतरा मंडराने की बात शामिल है.
कनाडा के न्यूज ग्रुप टोरोंटो ग्लोब और मेल हेडलाइन ने लिखा है कि ट्रंप ने इस कदम से कनाडा के लिए चुनौती पैदा कर दी है.
चीनी और भारतीय अखबार?
चीन के सरकारी मीडिया के संवाददाता ने कहा है कि अन्य देशों का व्यवहार चीन के कदमों को प्रभावित नहीं करेगा, पूरी दुनिया ने इस मुद्दे पर एक राय बनाने के लिए संघर्ष किया, बेहद असंमजस था लेकिन चीन ने हमेशा जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी है और एक सक्रिय भूमिका निभाई है.
भारतीय अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि अमरीका ने इस भाषण से दुनिया को हिलाकर रख दिया है.
वहीं, हिंदुस्तान टाइम्स ने कहा है कि अमरीका के पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकलने के बाद अब क्या?
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