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ट्रंप की टा टा के बाद पेरिस समझौते का क्या ?
- Author, ब्रजेश उपाध्याय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकलने का एलान करके "अमेरिका फ़र्स्ट" के अपने चुनावी वादे को पूरा करने का दावा किया है और अमरीकी कामगारों के हितों की रक्षा करने की बात की है.
उनके समर्थकों ने इस एलान का स्वागत किया है. ख़ासतौर से वो इलाक़े जहां कोयले की कई खदाने हैं और जहां इनके बंद होने से लोग बेरोज़गार हो रहे थे वहां ट्रंप के इस "आर्थिक राष्ट्रवाद" कहे जानेवाले क़दम को भरपूर सराहना मिली है.
लेकिन कूटनीति, सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के जाने-माने जानकारों ने कहा है कि इस क़दम से अमरीका न सिर्फ़ भविष्य की अर्थव्यवस्था की कमान किसी और के हाथों में सौंप देगा बल्कि अमरीकी हितों का भी ख़ासा नुक़सान करेगा.
जर्मनी, फ़्रांस और इटली जैसी यूरोपीय शक्तियों ने हर हाल में इस समझौते को बरकरार रखने का न केवल एलान किया है बल्कि विकासशील देशों को इस समझौते से जोड़े रखने के लिए जो आर्थिक मदद का वादा था उसे भी जारी रखने की घोषणा की है.
भारत और चीन ने अमरीका के बगैर भी इस समझौते से जुड़े रहने का एलान किया है.
ट्रंप ने अपने बयान में भारत पर ये कहते हुए निशाना साधा कि वो इसी वजह से इस समझौते से जुड़ा क्योंकि उसे उसके बदले अरबों डॉलर की मदद का आश्वासन दिया गया था.
उन्होंने ये भी कहा कि जहां इस समझौते के तहत अमरीका से उम्मीद की जा रही है कि वो अपने कोयले के खदानों को बंद करेगा वहीं भारत और चीन पर कोई ऐसी पाबंदी नहीं है.
लेकिन पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत और चीन दोनों ने ही साल 2015 के समझौते में कार्बन उत्सर्जन कम करने का जो लक्ष्य तय किया था, वो उससे आगे चल रहे हैं.
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि उम्मीद है कि भारत साल 2022 तक अपनी 40 प्रतिशत बिजली गैर-पारंपरिक श्रोतों से पैदा करने लगेगा जो पहले से तय लक्ष्य से आठ साल आगे है.
न्यूयॉर्क टाइम्स के संपादकीय बोर्ड ने भारत और चीन की तरफ़ से उठाए जा रहे कदमों की सराहना की है और कहा है दोनों को अभी काफ़ी लंबा फ़ासला तय करना है लेकिन वो सही रास्ते पर चल रहे हैं और अमरीका का उसमें नहीं शामिल होना अफ़सोसजनक होगा.
लेकिन इन सबके बावजूद दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और दुनिया का दूसरा सबसे ज़्यादा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करनेवाला देश जब इस समझौते से हट जाए तो जलवायु परिवर्तन पर क़ाबू पाने की मुहिम पर इसका असर पड़ेगा इसमें शायद ही किसी को ही शक हो.
राष्ट्रपति ओबामा ने पेरिस समझौते की वकालत में कहा था कि इसमें सबकी जीत है क्योंकि ये अमरीका के लिए मौका है नई टेक्नोलॉजी और नए शोध में पैसा लगाकर लाखों नौकरियां पैदा करने का और विकासशील देशों के लिए मौका है इन नए आविष्कारों का फ़ायदा उठाने का.
लेकिन ट्रंप के इस एलान से अब सवाल ये उठ रहा है कि क्या अमरीकी उद्योग जगत गैर-पारंपरिक उर्जा को वैसी अहमियत देगा जो वो अब तक दे रहा था? क्या वो विकासशील देश जो विकसित देशों की मदद के भरोसे इस समझौते से जुड़े थे इसमें बने रहेंगे? क्या बगैर अमरीकी नेतृत्व के काबर्न उत्सर्जन की सीमाओं पर नज़र रखने की जो प्रक्रिया है उसकी विश्वसनीयता बनी रहेगी?
आनेवाले दिनों में इन सवालों के जवाब से ही तय होगा कि आज के समय की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यानि जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ चल रही मुहिम कामयाबी की तरफ़ बढ़ेगी या फिर उसपर ब्रेक लग जाएगा.
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