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ब्लॉग: ..सोचता हूँ क्या दादरी पर मोदी जी को लताड़ना ठीक था?
- Author, वुसतुल्लाह खान
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
सितंबर, 2015 में दादरी के अखलाक अहमद को गाय का गोश्त खाने के शक में एक हुजूम ने घर से निकालकर मार डाला.
लोगों ने सवाल पूछे कि हर मुद्दे पर ट्वीटियाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उंगलियों ने अखलाक अहमद के कत्ल की निंदा करने के लिए ट्वीट करने से इनकार क्यों कर दिया था.
और उन्हें इस घटना पर एक गोलमोल सा बयान देने में दो हफ्ते क्यों लग गए. पर आज मैं इस दुख में हूं कि मैंने अखलाक अहमद पर क्यों लिखा. मैं चुप क्यों न रह सका.
इस मुद्दे को लेकर मोदी जी को लताड़ना क्या ठीक था?
खैबर पख्तूनख्वाह
और अब मैं किस मुंह से भारत में गोरक्षकों की दनदनाहट और 'लाइसेंस टु किलट की खुली छूट पर लिखूं जब मेरे ही वतन के एक शहर मरदान की खान अब्दुल वली खान यूनिवर्सिटी के 23 वर्षीय छात्र मशाल खान को उसी के साथ पढ़ने वाले छात्रों ने इस शक में मार डाला कि उसने इस्लाम की तौहीन की है.
गोली मारे जाने के बाद मशाल के शव को घसीटा गया, उस पर डंडे बरसाए गए. इस कारनामे में सिर्फ हज़ार-पांच सौ गुस्साए छात्र ही नहीं थे बल्कि यूनिवर्सिटी के कई लोग भी आगे-आगे थे.
खैबर पख्तूनख्वाह के मुख्यमंत्री परवेज़ खटक ने भरी एसेंबली में कहा कि मशाल खान और उसके दो घायल दोस्त अब्दुल्ला और जुबैर निर्दोष हैं.
फिर भी मशाल के जनाज़े में यूनिवर्सिटी का कोई कर्मचारी, कोई सरकारी अफसर या नेता शरीक नहीं हुआ. खैबर पख्तूनख्वाह पर इस वक्त तहरीक-ए-इंसाफ की हुकूमत है.
'फ्रंटियर गांधी'
इसके लीडर इमरान खान का पहला अफसोस वाला ट्वीट घटना के 20 घंटे बाद सामने आया.
प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ और उनकी सुपुत्री मरियम नवाज़ ने तीसरे दिन ये ट्वीट किया कि जो हुआ, बुरा हुआ.
उधर, इस्लामाबाद की पार्लियामेंट में भी किसी ने मज़हब की तौहीन का झूठा इलजाम लगाने वाले को कड़ी सजा दिलाने के लिए कानून बनाने की मांग नहीं की.
बस मरने वाले के लिए दुआ हुई और बैठक उठ गई.
मशाल खान भी बाचा खान का भक्त था. उसे मारने वाले पख्तून स्टूडेंट्स फेडरेशन के जोशीले भी बाचा खान को अपना बाप मानते हैं.
हिंसा से हिंसा
वो बाचा खान जिन्हें हिंदुस्तानी आवाम 'फ्रंटियर गांधी' या 'सीमांत गांधी' और 'खान अब्दुल गफ्फार खान' के नाम से जानती है.
जिन्हें महात्मा गांधी अपना दोस्त मानते थे और जिन्होंने पूरा जीवन ये समझाने में कुर्बान कर दिया कि मसला बंदूक से नहीं दलील से सुलटाना चाहिए. हिंसा से हिंसा ही जन्म लेती है.
सब लोग कहते हैं कि बाचा खान का देहांत 29 साल पहले 20 जनवरी 1988 को हुआ. जरूर हुआ होगा.
पर मुझे लगता है कि फ्रंटियर गांधी अपने नज़रिये समेत पांच दिन पहले खान अब्दुल वली खान यूनिवर्सिटी में अपने ही भक्तों के खून में रंगे हाथों दफ्न हो गए.
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