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पाक मीडिया: 'अमरीकी दख़ल से होगी भारत पाकिस्तान वार्ता'
- Author, साजिद इक़बाल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
आलमी सियासत में सारा खेल छवि का होता है, जहां ये तो अहम होता है कि क्या हो रहा है मगर इससे अहम ये होता है कि क्या दिख रहा है.
भारत के लिए चंद महीने पहले तक सबकुछ ठीक चल रहा था. कूटनीतिक मैदान में तो ये हाल था कि इसके पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के आलमी सतह पर तन्हाई की बातें हो रही थीं.
और ये बातें पाकिस्तान की विपक्षी हल्कों में ही नहीं, मीडिया में भी कही जा रहीं थीं. लेकिन यूपी के चुनाव ने सबकुछ बदल के रख दिया है, कम से कम पाकिस्तानी मीडिया को तो ऐसा ही दिख रहा है और उसे उम्मीद हो चुकी है कि अब पाकिस्तान की बात भी सुनी जा रही है.
चाहे भारत-पाक बातचीत हो या कश्मीर का मुद्दा हो, पाकिस्तानी मीडिया को भारत कूटनीतिक तौर पर पिछड़ा हुआ नज़र आ रहा है. पाकिस्तानी अख़बार रोज़नामा औसाफ़ इस सिलसिले में सबसे आगे है. अख़बार ने गुजरे हफ़्ते कमोबेश हर रोज़ भारत को अपने संपादकीय लेखों का विषय बनाया है.
अख़बार ने छह अप्रैल को अपने संपादकीय में संयुक्त राष्ट्र में अमरीका की ओर से पाकिस्तान और भारत के बीच मध्यस्थता करने की ख्वाहिश का स्वागत किया है.
अख़बार ने लिखा है, "हम समझते हैं कि अमरीकी प्रशासन की तरफ़ से पाकिस्तान और भारत के बीच बातचीत और दूसरे विवादास्पद मुद्दों पर मध्यस्थता की पेशकश एक सकारात्मक क़दम है."
अमरीकी क़दम का स्वागत
अख़बार के मुताबिक ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि अगर अप्रैल महीने के अंत में या मई की शुरुआत में पाकिस्तान और भारत के बीच बातचीत होती है तो इसमें अमरीकी प्रशासन के सीधे दख़ल से इनकार नहीं किया जा सकता है.
इससे पहले तीन अप्रैल को अपने संपादकीय में अख़बार औसाफ़ ने ईरान की तरफ़ से कश्मीर पर बातचीत की पेशकश का स्वागत किया है. ईरानी नेतृत्व को इस बातचीत को मुकम्मल कराने के लिए भारत सरकार से बातचीत करनी चाहिए.
अख़बार नवाए वक़्त के मुताबिक, "भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत के दौरान अमरीकी मध्यस्थता की पेशकश से पाकिस्तान का हौसला बढ़ा है. हालांकि अमरीकी पहल की असली वजह इस क्षेत्र में दोनों देशों के बीच परमाणु हथियारों को लेकर जारी दौड़ है."
अख़बार ने आगे लिखा है, "अंतरराष्ट्रीय जगत को इस बात की आशंका है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा तो इन दोनों मुल्कों के बीच एक नई जंग शुरू हो जाएगी, जो परमाणु युद्ध मे तब्दील हो सकती है."
इससे पहले, अख़बार नवाए वक्त के एक वरिष्ठ स्तंभकार नुसरत जावेद अपने एक स्तंभ में इस यक़ीन का इज़हार कर चुके हैं कि ट्रंप प्रशासन ये फ़ैसला कर चुका है कि पाकिस्तान और भारत के बीच स्थिति को सुधारने के लिए कोई ठोस क़िरदार अदा करना होगा. उनका कहना था कि ट्रंप प्रशासन का ये फ़ैसला पाकिस्तान के लिए इत्मीनान वाला है.
अरब देशों की आलोचना
जहां अख़बार ने अमरीका और ईरान की राजनयिक सक्रियता को सराहा है वहीं दूसरी ओर अख़बार ने मुल्कों को भारत से दोस्ती के मामले पर ख़ूब लताड़ा है.
पांच अप्रैल को प्रकाशित एक लेख अख़बार नवाए वक्त ने लिखा है, "ना जाने इन अरब देशों को कब अक्ल आएगी जो भारत से दोस्ती और आपसी संबंध बढ़ाने के गम में दिन रात घुले जा रहे हैं. जबकि भारत में रह रहे 22 करोड़ मुसलमानों की ज़िंदगी हिंदू चरमपंथियों ने मुश्किल बना रखी है."
अख़बार के मुताबिक भारतीय मुसलमानों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं, मगर अरब के भाई लोग "या शेख अपनी अपनी देख" के फलसफे पर बढ़ते नज़र आ रहे हैं.
अख़बार के मुताबिक भारत से अच्छे संबंधों के सिलसिले में अरब रणनीतिकारों की बुनियादी दलील यही थी कि इससे वहां से बसने वाले करोड़ों मुसलमानों को फ़ायदा होगा.
"ये अच्छा तरीका है जहां इस बुते-हिंद पर सौ जान फ़िदा हो रहे होते हैं, इधर ये बुते-हिंद कबूतरान हराम को जब्ह करके सबाब कमाते हैं."
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