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पाकिस्तान: राहिल के 'मुस्लिम नैटो' की अगुवाई करने पर विवाद
- Author, श्रुति अरोड़ा
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
पाकिस्तान के पूर्व आर्मी चीफ़ राहिल शरीफ़ के सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन के मुखिया बनने की तैयारी को लेकर पाकिस्तान की राजनीति में दो धड़े हो चुके हैं.
इस सैन्य गठबंधन में 41 मुस्लिम देशों की फ़ौजें शामिल होंगी. इस सैन्य गठबंधन को नैटो की तर्ज़ पर तैयार करने का प्रस्ताव रखा गया है.
हाल ही में पाकिस्तान की सरकार ने पूर्व आर्मी चीफ़ राहिल शरीफ़ को इस सैन्य गठबंधन की कमान संभालने की इजाज़त दी है.
लेकिन इस फ़ैसले के बाद से पाकिस्तान की विदेश नीति से जुड़ी आशंकाएं ज़ाहिर की जाने लगी हैं.
कई लोगों का मानना है कि जनरल राहील शरीफ़ के इसमें शामिल होने से ऐसा लगेगा कि पाकिस्तान मध्य पूर्व में जारी खींचतान में किसी एक पक्ष का साथ दे रहा है.
अब तक पाकिस्तान ने ख़ुद को इस मामले में निष्पक्ष बनाए रखा है.
इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने 25 मार्च को कहा कि इस सैन्य गठबंधन की अगुवाई करने की इजाज़त जनरल शरीफ़ को दे दी गई है.
इस सैन्य गठबंधन का नाम होगा इस्लामिक मिलिट्री एलांयस टू फ़ाइट टेररिज्म (आईएमएएफ़टी) और यह चरमपंथ के ख़िलाफ़ जंग करने के लिए तैयार की जा रही है.
इस सैन्य गठबंधन की घोषणा साल 2015 के दिसंबर में हुई थी.
लेकिन पाकिस्तान के इस फ़ैसले को लेकर तब से अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई थी.
ईरान ने सऊदी अरब की इस पहल की आलोचना की है और कहा है कि यह शिया ईरान के ख़िलाफ़ सुन्नी बहुल मुस्लिम देशों की मुहिम है.
पाकिस्तान ने हमेशा सऊदी अरब और ईरान के बीच अपने रिश्ते को संतुलित रखने की कोशिश की है.
सऊदी अरब और ईरान दोनों ही मध्य पूर्व की राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश में लगे रहते हैं.
हालांकि पाकिस्तान ने ईरान को कथित तौर पर आश्वस्त किया है कि वो इस सैन्य गठबंधन को पक्षपातपूर्ण नहीं होने देगा.
'द नेशन' अखबार ने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के हवाले से लिखा है, "हमने ईरान को कहा था कि पाकिस्तान चरमपंथ विरोधी गठबंधन का हिस्सा है, ना कि ईरान-विरोधी किसी गठबंधन का."
साल 2015 में पाकिस्तान ने यमन के ख़िलाफ़ हुई कार्रवाई में सऊदी अरब का साथ देने से इंकार कर दिया था.
जिससे सऊदी अरब थोड़ा निराश था.
इसलिए अभी पाकिस्तान के लिए इस फ़ैसले को सऊदी अरब के तुष्टिकरण के रूप में भी देखा जा रहा है.
पाकिस्तान के मुख्य विपक्षी दलों ने पाकिस्तान सरकार के फ़ैसले की आलोचना की है. वे इस मुद्दे को संसद में उठाने की तैयारी में हैं.
पाकिस्तान की तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी ने इसे 2015 में संसद में पारित उस प्रस्ताव का उल्लंघन बताया है, जिसमें पाकिस्तान को यमन संघर्ष में सऊदी अरब की मदद करने से रोका गया था.
वहीं पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने कहा है कि सरकार को 'संसद को विश्वास में लेकर यह फ़ैसला लेने तक इंतज़ार करना' चाहिए था.
पाकिस्तानी मीडिया ने भी इस दलील का समर्थन किया है.
अंग्रेजी अख़बार 'डॉन' ने 29 मार्च को लिखा है, "अब सरकार कैसे इस सैन्य गठबंधन में अपनी फ़ौज भेजने की मांग का विरोध कर पाएगी? पाकिस्तान के पूर्व आर्मी चीफ़ के नेतृत्व में इस गठबंधन के गठन ने पाकिस्तान को एक ऐसी स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है जहां से उसके लिए मध्यपूर्व के संघर्ष से बचना मुश्किल होगा.''
उर्दू अखबार जिन्ना ने 27 मार्च के अपने संपादकीय में लिखा है, "पाकिस्तान के शासक लंबे समय से सऊदी अरब के शाही परिवार के मेहमान रहे हैं. क्या उनके इस फ़ैसले के पीछे इस आवभगत की कुछ भूमिका भी हो सकती है?"
कुछ अखबारों ने सरकार के फ़ैसले का बचाव भी किया है और इसे पाकिस्तान के लिए एक मौके के तौर पर देखा है.
'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' ने 28 मार्च को लिखा, "आलोचना करने वाले जो महत्वपूर्ण बात भूल रहे हैं वो ये है कि यह सैन्य गठबंधन चरमपंथ के ख़िलाफ़ तैयार किया जा रहा है, ये कोई अतिक्रमण करने वाली ताक़त गठित नहीं की जा रही है. जनरल शरीफ़ इस सैन्य गठबंधन के अंदर पाकिस्तानी फ़ौज का नेतृत्व नहीं करने जा रहे हैं और ना ही देश के प्रतिनिधि के तौर पर हैं. इसलिए हमें किसी नतीजे पर पहुंचने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए."
आलोचनाओं के बावजूद शायद ही पाकिस्तान की सरकार अपने इस फ़ैसले से पीछे हटने वाली है. इससे सरकार की साख़ पर बुरा असर पड़ सकता है.
हालांकि पाकिस्तान की सत्तारूढ़ पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग फ़ौज को नाराज़ करने का जोख़िम शायद ही ले.
उसी तरह विपक्ष भी शायद ही फ़ौज के ऊपर कोई टिप्पणी संसद में करें. इसके बदले विपक्ष कोशिश करेगी कि वो सरकार को अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिए संसद में घेरती हुई नज़र आए.
2018 में पाकिस्तान में आम चुनाव होने वाले हैं.
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