हमला रोकने के लिए कितना तैयार था लंदन

    • Author, डोमिनिक कैसियानी
    • पदनाम, होम अफ़ेयर्स कॉरेसपोंडेट

लंदन के वेस्टमिंस्टर ब्रिज और ब्रितानी संसद के पास हुए हमलों से निपटने के लिए ब्रिटेन किस हद तक तैयार था. हमले के बाद ये अहम सवाल कई लोग पूछ रहे हैं.

इस हमले में पांच लोगों की मौत हुई है और हमलावर मारा गया. आतंकवादी हमलों का मकसद किसी की जान लेना भर नहीं होता है.

ये डर फैलाना का जरिया होता है ताकि अव्यवस्था फैल सके और किसी देश या शहर की बुनियाद हिलाई जा सके.

और इस हमलावर ने जहां तक मुमकिन हुआ बिना तकनीक के ज्यादा इस्तेमाल के इसे अंजाम दिया.

वे दिन जब चले गए जब आतंकवादी किसी हमले को अंजाम देने के लिए महीनों योजनाएं बनाया करते थे.

पश्चिमी सुरक्षा एजेंसियां खासकर एमआईफाइव और उसकी सहयोगी एजेंसियां ऐसी साजिशों को बेनकाब करने के लिहाज से काफी होशियार हो गई हैं.

इस तरह के किसी हमले की साजिश बुनने के लिए जितना लंबा वक्त लगेगा, उसमें उतने ही ज्यादा लोग शामिल होंगे.

और इससे सुरक्षा एजेंसियों की नजर में उनके आने की संभावना बढ़ जाएगी.

2005 के हमलों के बाद पुलिस को इस तरह की घटनाओं से निपटने के लिए ट्रेन किया गया है.

ऐसी साजिशें लगातार पेचीदा होती गईं और अपने टारगेट को लेकर पहले से ज्यादा स्पष्ट. चाहे 2008 के मुंबई हमले हों या फिर पेरिस, नीस या फिर दुनिया में कहीं और.

इस ट्रेनिंग में पुलिस को ये भी सिखाया गया है कि वे हमलावर से कैसे निपटें और संकट की सूरत में शहर कैसे चलता रहे, जीता रहे और सांस लेता रहे.

और यही वजह थी कि प्रधानमंत्री टेरेसा मे ये कह पाईं कि लंदन रुकेगा नहीं, अपनी रफ्तार से चलता रहेगा.

हमले की शुरुआत वेस्टमिंस्टर ब्रिज से हुई जहां हमलावर ने लोगों पर गाड़ी चढ़ा दी.

ये तरीका अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे चरमपंथी संगठन अपनाते रहे हैं और उन्होंने इसके प्रचार प्रसार के लिए अंग्रेजी पत्रिकाओं का भी सहारा लिया है.

हमलावर ने यही तरीका क्यों चुना

क्योंकि ये बहुत आसान तरीका था. जब तक इस तरह के हमले को अंजाम न दे दिया जाए, इसके बारे में पहले से पता लगाना बहुत मुश्किल होता है.

साल 2013 के बाद इस तरह की 13 साजिशों को अंजाम देने से रोका गया है. इस साजिशों में कुछ बातें एक जैसी थीं.

हमले में गाड़ी को हथियार बनाना, तेज धार वाले हथियार का इस्तेमाल और इस बात का पक्का इरादा कि इसे किसी भी तरह से अंजाम देना है.

हमला कामयाबक्यों हुआ

ये कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि सुरक्षा बल कहीं चूक गए. हमें नहीं मालूम कि हमलावर उनकी निगरानी में था या नहीं.

पुलिस ने कहा है कि वह 'अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद' से प्रेरित था.

अगर ये हमलावर पहले से पुलिस की निगरानी में था तो भी हमें नहीं मालूम कि उसने कुछ ऐसा किया था या नहीं जिससे निगरानी सूची में दूसरे खतरों से ज्यादा तरजीह दी जाती.

इसलिए संकट की घड़ी में पुलिस फौरन हरकत में आ जाती है कि हमलावर अकेला था या फिर वह किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा.

इलेक्ट्रॉनिक निशानदेही

पुलिस इस मामले में हर उस एंगल से तफ्तीश करेगी जिससे कोई सुराग निकल सके. उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज की पड़ताल की जाएगी.

हमलावर की कार का नंबर प्लेट काफी कुछ सुराग दे सकता है. विशेषज्ञ उसके मोबाइल फोन से इसका पता लगाएंगे कि वह कहां-कहां गया था और किनके संपर्क में था.

मुमकिन है कि हमें इसकी कभी खबर न मिले लेकिन खुफिया एजेंसियां उसके बैंक खातों से कोई न कोई सुराग निकाल लेंगी.

और आखिरकार पुराने तौर तरीकों वाला पुलिस का कोई जासूस या फिर कोई अनाम फोन कॉल कोई अहम सुराग दे दे.

जांच से जुड़े लोगों को अभी दिन-रात एक करना है. सड़कों पर अब पहले से ज्यादा सशस्त्र गार्ड दिखाई देंगे. पुलिस की गश्त भी बढ़ाई जाएगी.

और सबसे आखिरी सवाल रह ही जाता है कि संसद के प्रवेश द्वार पर गार्ड्स थे लेकिन संसद के दूसरे हिस्सों की तरह वैसी चौकसी नहीं थी.

इसी वजह से ये बात पूछी जा रही है कि संसद के प्रवेश द्वार पर क्या पर्याप्त सुरक्षा थी.

लेकिन हमलावर के कातिलाना मकसद को देखें तो वह हमला करने की कोशिश तो फिर भी करता ही.

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