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मुसलमानों और समलैंगिकों का प्रवेश निषेध
- Author, एरिका बेंके
- पदनाम, बीबीसी मुंडो
'यह मुस्लिम संस्कृति के ख़िलाफ़ एक लड़ाई है.' ये शब्द हंगरी के एक गांव में 'धर्मयुद्ध' की मुहिम के हिस्सा हैं. यहां न केवल मुस्लिम वस्त्रों के इस्तेमाल पर पाबंदी है बल्कि नमाज़ भी प्रतिबंधित है. इसके साथ ही इन्हें उम्मीद है कि यूरोप के उन ईसाइयों को आकर्षित करने में मदद मिलेगी, जो अपने देश में अलग-अलग संस्कृतियों का विरोध करते हैं.
बीबीसी से लास्लो तोरसकई ने कहा, ''पहले हमलोगों ने पश्चिमी यूपोपीय देशों के लोगों का स्वागत किया. ये वे लोग थे जो अलग-अलग संस्कृतियों वाले समाज में नहीं रहना चाहते थे.'' तोरसकई दक्षिणी हंगरी के मैदानी इलाके में एक हाशिए के गांव एसोथलम के मेयर हैं. यहां राजधानी बुडापेस्ट से जाने में दो घंटे का वक़्त लगता है.
उन्होंने कहा, ''गांव की परंपरा को सुरक्षित रखने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है. अगर बड़ी संख्या में यहां मुसलमान आएंगे तो वे ईसाई समुदाय में घुल-मिल नहीं पाएंगे. हमलोगों ने पश्चिमी यूरोप में बड़े मुस्लिम समुदायों को देखा है. हमलोग नहीं चाहते कि यही समस्या यहां भी हो.''
उन्होंने कहा, ''मैं चाहता हूं कि यूरोप यूरोपियन के लिए हो, एशिया एशियाइयों के लिए और अफ़्रीका अफ़्रीकियों को लिए हो. यह बहुत ही सरल सी बात है.''
शरणार्थियों के संकट के कारण यूरोप में प्रवासी-विरोधी भावनाओं को बल मिला है और हंगरी भी इससे अछूता नहीं है.
यह संकट इतना गहरा है कि हर दिन 10 हज़ार लोग सर्बिया की सीमा पार कर हंगरी पहुंच रहे हैं. एसोथलम सहरद से कुछ मिनट की दूरी पर है.
मेयर को इन्हीं चिंताओं की बुनियाद पर फ़ायदा मिल रहा है. इन्हीं तर्कों के आधार पर नया क़ानून लाया जा रहा है. नए स्थानीय क़ानून के मुताबिक़ अब मुस्लिम लिबासों को बैन कर दिया गया है. लोग अब हिजाब नहीं पहन सकते हैं और नमाज़ भी अदा नहीं कर सकते हैं. सार्वजनिक स्थान पर समलैंगिक प्रेम पर भी पाबंदी लगा दी गई है.
इसके साथ ही मस्जिदों के निर्माण पर भी पबांदी लगाने की तैयारी है. हालांकि यहां दो मुस्लिम ही रहते हैं. कई वक़ीलों का मानना है कि इस नियम से हंगरी के संविधान का उल्लंघन होगा. इस स्थानीय क़ानून की समीक्षा की जा सकती है. हालांकि इस स्थानीय नियम को ईसाई समुदाय से समर्थन मिल रहा है.
इनिको नाम के एक निवासी ने कहा, ''बड़ी संख्या में गांव से होते हुए शरणार्थियों का निकलना काफी डरावना है. मैंने अपने घर में अपने छोटे बच्चे के साथ बहुत वक़्त गुज़ारा है. मुझे याद है कि यह सब देखते हुए काफी डर लगता था.'' गांव में रह रहे दो मुस्लिमों ने बीबीसी से बात करने से इनकार कर दिया.
हालांकि गांव के एक आदमी ने कहा कि ये दोनों पूरी तरह से गांव में घुल-मिल गए हैं. उन्होंने कहा, ''वे किसी को भड़काते नहीं हैं. वे नक़ाब का भी इस्तेमाल नहीं करते हैं. वे किसी को प्रताड़ित भी नहीं करते हैं. मैं इन्हें निजी तौर पर जानता हूं.''
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