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#100Women: 'जब एक ब्लॉग ने मेरा जीवन बदल दिया'
जापान में लोग आम तौर पर कैंसर के बारे में बात नहीं करते हैं. वहां केवल ये सुनने को मिलता है कि किस तरह से एक शख़्स ने कैंसर को हरा दिया है या फिर उससे ज़िंदगी की जंग हार गया.
लेकिन 34 साल की न्यूज़ रीडर माओ कोबयाशी ने अपने ब्लॉग से इस चुप्पी को तोड़ने का काम किया है. उन्होंने अपनी बीमारी और उससे जीवन के प्रति बदलते नज़रिए को ब्लॉग पर लिखना शुरू किया और अब ये ब्लॉग देश में सबसे पॉपुलर ब्लॉग में शुमार है.
#100Women की हमारी ख़ास सिरीज़ में वे अपने अनुभव बता रही हैं. पढ़िए उन्हीं की ज़ुबानी
"दो साल पहले जब मैं 32 साल की थी, तब मुझे स्तन कैंसर हो गया. मेरी बेटी तीन साल की थी, जबकि बेटा एक साल का. मैंने सोचा कि कोई बात नहीं हैं, कैंसर का इलाज हो जाएगा और मैं पहले की तरह ठीक हो जाऊंगी, लेकिन यह इतना आसान नहीं था. मेरे शरीर में आज भी कैंसर है.
लंबे समय तक मैंने अपनी बीमारी के बारे में छुपाया भी, क्योंकि मेरा काम टीवी पर आने से जुड़ा था. मुझे डर लग रहा था कि लोगों को मेरी बीमारी के बारे में पता ना चल जाए.
मैंने अस्पताल के दौरान लोगों की नज़रों से बचने की कोशिश की, लोगों से बातचीत करना बंद कर दिया.
मैं कोशिश कर रही थी कि मैं पहले जैसी हो जाऊं लेकिन वास्तविकता में परछाई में बढ़ती जा रही थी. मैं जैसी शख़्स होना चाहती थी, उससे दूर होती जा रही थी.
करीब 20 महीने तक इस हालात में रहने के बाद मेरे डॉक्टर ने मुझे कहा कि तुम्हें मानसिकता बदलने की ज़रूरत है.
डॉक्टर ने कहा कि कैंसर के पीछे मत छिपो और तब मुझे महसूस हुआ कि क्या हो रहा था.
दरअसल, मैं हमेशा अपने को दोष देती रहती थी और ख़ुद को ऐसे देखती थी कि मैं पहले जैसा जीवन जीने में सक्षम नहीं हो पाऊंगी. मैं अपने दर्द के पीछे छिपने की कोशिश कर रही थी.
उससे पहले मैं घरेलू जीवन के हर पहलू में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती थी, जैसे मेरी मां लेती थीं. लेकिन बीमार होने के बाद मैं ने कुछ भी करना बंद कर दिया. मैं अस्पताल पहुंच गई, मुझे बच्चों का साथ छोड़ना पड़ा.
हालांकि मैं परफेक्ट मां बनने की कोशिश कर रही थी, ये सोच मेरे शरीर और आत्मा दोनों के लिए किसी टॉर्चर जैसा था. लेकिन मुझे महसूस हुआ कि ये सब बलिदान देने की जरूरत नहीं है.
मेरे परिवार वालों, ने भी समझ लिया कि मैं उनके लिए खाना नहीं बना सकती, उन्हें स्कूल तक ना तो ड्रॉप कर सकती ना ही ला सकती, बावजूद इसके उन लोगों का मुझ पर भरोसा बना हुआ था. वे मुझे हमेशा की तरह प्यार करते रहे, एक मां और एक पत्नी के रूप में.
ऐसे में एक दिन में मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया, कोकोरू नाम से जिसमें मैं ने अपने कैंसर की लड़ाई के बारे में लिखा. इसने कई लोगों को प्रभावित किया और उन्होंने मेरे लिए प्रार्थनाएं कीं.
उन्होंने कमेंट के जरिए अपने अनुभव मुझसे शेयर किए, कैसे वे अपनी मुश्किलों से पार पाने में कामयाब हुए, जैसी चीजें. मुझे लोगों से काफ़ी प्यार मिला और आज दस लाख से ज़्यादा लोग मेरे ब्लॉग को पढ़ते हैं.
अगर आज मैं मर जाती हूं तो लोग क्या सोचेंगे, केवल 34 साल की थी, दो बच्चे छोड़ गई. मैं नहीं चाहती कि लोग मेरे बारे में इस तरह से सोचें क्योंकि मेरी बीमारी मेरे जीवन को परिभाषित नहीं कर सकती.
मेरे जीवन के अपने अनुभव हैं- समृद्ध और कई आयाम वाले. मैंने अपने सपनों को पूरा किया है. अपने जीवन के अनुभव को देखती हूं कि मैं अपने प्यार से मिली, दो प्यारे प्यारे बच्चे हैं मेरे. मेरा परिवार मुझसे प्यार करता है और मैं उन्हें प्यार करती हूं.
इसलिए मैंने तय किया मैं अपनी बीमारी के बारे में सोच सोचकर समय जाया नहीं करूंगी. मैं जो बनना चाहती हूं वो बनूंगी.
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