ट्रंप की जीत भारत के लिए अच्छी ख़बर?

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता दिल्ली

डोनल्ड ट्रंप अमरीका के 45वें राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक ट्वीट में उन्हें मुबारकबाद दी और कहा कि वो उनके साथ मिलकर दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले जाएंगे.

लेकिन क्या डोनल्ड ट्रंप के दौर में भारत और अमरीका के रिश्ते सही मायने में नई ऊंचाई को छू सकते हैं?

अमरीका में डोनल्ड ट्रंप के समर्थक उनकी जीत पर ख़ुशी मना रहे हैं लेकिन भारत में उनकी जीत से पहले ही उन्हें विजयी घोषित करके ख़ुशी मनाई जा चुकी है. ये सही है कि जश्न मनाने वाले ये लोग बहुत थोड़े हैं जिनका सम्बन्ध हिंदू कट्टरपंथी संगठनों से था. वो ट्रंप को बहुत पसंद करते हैं. आज वो लड्डू भी बाट रहे हैं

लेकिन दो देशों के रिश्ते भावनाओं पर आधारित नहीं होते.

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सच तो ये है कि न तो डोनल्ड ट्रंप भारत को ठीक से जानते हैं और न ही भारत उन्हें सही से जानता है. अमरीकी मामलों के वरिष्ठ पत्रकार मनोज जोशी कहते हैं, "ट्रम्प भारत को ठीक से नहीं जानते. वो भारतीय मूल के कुछ गुजरातियों को जानते हैं जिन्होंने 'हिंदूज़ फॉर ट्रंप' नामी एक संस्था खड़ी की है तो शायद वो उससे ख़ुश होंगे. लेकिन बड़े मुल्कों की विदेश नीति अपने-अपने हित पर क़ायम होते हैं. ट्रंप भी अपने देश के हित के पीछे जाएंगे."

चीन और पाकिस्तान बनाम भारत

राष्ट्रपति के बदलने से अमरीकी विदेश नीति में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं आता. दक्षिण एशिया यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर श्वेता सिंह कहती हैं, ''मुल्कों की विदेशी नीति में कॉन्टीन्यूटी होती है. पिछली सरकार की नीतियों को आगे भी बढ़ाया जाता है.''

श्वेता सिंह कहती हैं कि ट्रंप चीन और पाकिस्तान को एक समस्या की तरह से देखते हैं जबकि भारत को एक सोलुशन की तरह. इसलिए उनके अनुसार भारत ट्रंप के लिए एक अहम देश साबित हो सकता है.

श्वेता सिंह कहती हैं, "ट्रंप समस्या के समाधान में भारत को हिस्सेदार मानते हैं, ऐसे में हम अमरीका और भारत के साथ आने वाले दिनों में मज़बूत संबंधों की उम्मीद कर सकते हैं."

लेकिन कई विशेषज्ञ ये मानते हैं कि बराक ओबामा की तरह ट्रंप भी चीन को प्राथमिकता दे सकते हैं. चीन और अमरीका के आपसी सम्बन्ध जटिल हैं और इसके कई परत हैं. दोनों देशों के बीच आपसी व्यापर लगभग 700 अरब डॉलर का है जबकि भारत और चीन के बीच आपसी व्यापर केवल 70 अरब डॉलर का.

मनोज जोशी मानते हैं कि डोनल्ड ट्रंप भारत से अधिक चीन पर फोकस करेंगे लेकिन चीन की बढ़ती हुई आर्थिक और सैन्य शक्ति को रोकने के लिए भारत से दोस्ती और भी मज़बूत करना चाहेंगे.

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आपसी व्यापार

भारत और अमरीका के बीच आपसी व्यापार दस साल पहले राष्ट्रपति बुश के भारत के दौरे के बाद परवान चढ़ने लगा. राष्ट्रपति ओबामा के दौर में इसे 2011 तक 100 अरब डॉलर तक ले जाने का टारगेट रखा गया था जो अब तक 70 अरब डॉलर तक आकर अटक गया है.

मनोज जोशी कहते हैं कि समस्या भारत के साथ है. विनिर्माण में प्रगति नहीं है जिससे निर्यात पर फ़र्क़ पड़ा है.

उनका कहना है, ''भारत और अमरीका के बीच आपसी व्यापर का एक बड़ा हिस्सा इनफ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी या आईटी सेक्टर से जुड़ा है. भारत में बने हुए सामानों के निर्यात की हिस्सेदारी बहुत छोटी है.''

रक्षा सहयोग

विदेशी मामलों की पत्रकार ज्योति मल्होत्रा का कहना है कि रक्षा के क्षेत्र में भारत को अमरीका की ज़रुरत है.

ज्योति कहती हैं, ''सैन्य आधुनिकीकरण भारत की प्राथमिकताओं में से एक है. अमरीका इसमें एक भूमिका निभा रहा है लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इस क्षेत्र में अब तक जितनी बढ़ोतरी होनी चाहिए थी उतनी हुई नहीं.''

श्वेता सिंह की राय में डोनल्ड ट्रंप भारत को इसमें पूरी सहायता देने की कोशिश करेंगे.

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परमाणु डील और उसका व्यवसायिकरण

भारत और अमरीका में सबसे अधिक गर्मजोशी उस समय देखने को मिली थी जब 2006 में राष्ट्रपति बुश भारत आये थे और दोनों देशों के बीच परमाणु समझौता हुआ था. ये दोनों देशों के रिश्ते में एक ऐतिहासिक क्षण था. इस समझौते से परमाणु परीक्षण के कारण भारत पर लगी पाबंदियां ख़त्म हो गईं थीं.

मनोज जोशी के अनुसार परमाणु समझौता भारत के फ़ायदे के लिए था.

उनका कहना है, "दोनों देशों के बीच रिश्ते में जोश की आज अगर कमी है तो उसका कारण ये है कि भारत के आर्थिक विकास का दर काफ़ी ऊंचा था. उस समय भारत आर्थिक रूप से एक अहम देश की तरह से उभरा था."

भारत अब भी ये दावा करता है कि आर्थिक विकास में भारत सभी देशों से आगे है. लेकिन मनोज जोशी के अनुसार भारत के प्रति जोश में कमी आई है.

नौकरियां और ऑउटसोर्सिंग

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डोनल्ड ट्रंप ने चुनावी मुहीम के दौरान भारत और अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के प्रति सकारात्मक रवैया अपनाया था. लेकिन हाल में उन्होंने एक ऐसा बयान दिया जिससे भारत को चिंता हो सकती है.

उन्होंने कहा था कि अमरीकी नौकरियां तेज़ी से भारत और चीन को जा रही हैं और अगर वो राष्ट्रपति बने तो वो इस पर रोक लगा देंगे. इसी तरह की बातें बराक ओबामा ने भी अपनी चुनावी मुहीम के दौरान कही थीं लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

लेकिन चुनावी मुहीम के दौरान कही गई बातें ''चुनावी जुमला'' भी साबित हो सकती हैं, जैसा कि 2008 में राष्ट्रपति ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद हुआ.

मनोज जोशी और श्वेता सिंह दोनों मानते हैं कि वो इसे लेकर गंभीर हैं या नहीं ये तो समय ही बताएगा.

कुल मिलाकर ट्रंप का चुनाव भारत के लिए एक अच्छी ख़बर है लेकिन शुरुआती दौर में दोनों पक्ष एक दूसरे के प्रति बहुत संभल-संभल कर कोई क़दम उठाएंगे.

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