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भाजपा तय करे- सत्ता की पार्टी बनना है या प्रेशर ग्रुप | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इस चुनाव को 26 नवंबर के हमलों से जोड़कर देखना होगा और अगर उस हिसाब से देखें तो जब भी संकट का समय आता है लोग सरकार के साथ आ जाते हैं, उन्हें चाहे जितनी भी शिकायत हो. उस समय भाजपा ने लोगों की नाराज़ग़ी समझने में ग़लती की, उन्हें लगा कि लोग सरकार से या कांग्रेस से नाराज़ हैं मगर उस समय लोग स्थिति से नाराज़ थे पार्टी से नहीं. बड़े शहरों से भाजपा का सफ़ाया हो गया है यानी भाजपा ने लोगों की मनःस्थिति नहीं समझी. हमलों के बाद लोगों के मन में वितृष्णा हुई और उसमें मनमोहन सिंह लोगों को अराजनीतिक नज़र आए. लालकृष्ण आडवाणी ने मनमोहन सिंह को जो कमज़ोर प्रधानमंत्री बताने का अभियान चलाया वो भी लोगों को पसंद नहीं आया. आडवाणी को पाकिस्तान यात्रा के दौरान उनके बयान के बाद जिस तरह पद से हटाया गया उससे पार्टी में वाजपेयी के बाद सबसे बड़े क़द वाले नेता के तौर पर उनकी विश्वसनीयता ख़त्म हो गई. एक समय तो उन्हें विपक्ष के नेता के पद से भी हटाने की बात हुई. पार्टी की हालत तो ये है कि पार्टी अध्यक्ष और संसदीय दल के नेता एक दूसरे को देखना-सुनना नहीं चाहते हैं. पार्टी में इतना ज़्यादा विभाजन शायद ही कभी रहा हो. वाजपेयी और आडवाणी का नेतृत्त्व
इसके अलावा ये जनसंघ या भाजपा के गठन के बाद से पहली बार था जब सामने अटल बिहारी वाजपेयी नहीं थे. उनका नेतृत्त्व एक ऐसी चीज़ था जो पार्टी से बाहर के लोगों को भी पार्टी से जोड़ता था. उनके विरोधी भी कहते थे कि वाजपेयी आदमी अच्छे हैं बस ग़लत पार्टी में हैं. साथ ही उनकी लोकप्रियता कभी किसी राज्य के नेता से कम नहीं रही. वाजपेयी की लोकप्रियता मोदी से कभी कम नहीं थी. इस चुनाव के साथ ही आडवाणी का राजनीतिक जीवन समाप्त हो गया है. अब अगर पार्टी को अगले लोकसभा की तैयारी करनी है और भविष्य के बारे में सोचना है तो उसे नए नेतृत्त्व के बारे में सोचना चाहिए. अब पार्टी को तय करना होगा कि उसे करना क्या है, पार्टी अब किधर जाएगी. पार्टी को देखना होगा कि वह केंद्र में सत्ता में आना चाहती है या महज़ एक 'प्रेशर ग्रुप' बनकर रह जाना चाहती है. नरेंद्र मोदी दूसरी राह के विकल्प हैं. मोदी भाजपा के नेता तो हो सकते हैं मगर उनका देश का नेता होना मुश्किल है. इस देश का मानस सबको साथ लेकर चलने वाला है. यहाँ के हिंदू भी हिंदुओं के मसलों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या भाजपा की कुछ बातों से इत्तेफ़ाक़ रख सकते हैं मगर तब भी वो विभाजनकारी नीति स्वीकार नहीं करते. नीतियों पर पुनर्विचार इसीलिए अगर पार्टी ने तय कर लिया हो कि उसे सत्ता में नहीं आना है तो कोई बात नहीं पर अगर देश की सत्ता में आने का सपना हो तो विचारधारा, कार्यक्रमों और नीतियों पर पुनर्विचार करना होगा. साथ ही अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी सोचना होगा क्योंकि वो भी 75 साल पहले की पार्टी नहीं है और भारत भी अब 75 साल पहले का भारत नहीं है. नई पीढ़ी की सोच अलग है और अगर आरएसएस पार्टी को उसी राह पर चलाते रहना चाहता है तो पार्टी जनसंघ के समय की पार्टी ही बनकर रह जाएगी जब उसकी 15-20 सीटें आती थीं. इस संबंध में संघ प्रमुख मोहन भागवत की सोच अब देखनी होगी कि वह पार्टी के लिए किस तरह का निर्देश देते हैं. उन्हें पूर्ववर्ती लोगों से अलग कहा जाता है तो अब उनके काम और व्यवहार से और आरएसएस और भाजपा के लिए नीतियों से दिखेगा कि वो कार्यरूप में भी अलग हैं या नहीं. पार्टी को सुधार कार्यक्रम की ज़रूरत है क्योंकि रोज़मर्रा की ज़रूरतों, रोज़गार के लिए लोग अब सत्ता में आने वाली पार्टियों की ओर देखते हैं. वे मंदिर या भावनात्मक मुद्दों से थोड़े समय के लिए प्रभावित हो सकते हैं मगर लंबे समय तक ऐसे मुद्दों से लोग पार्टी के साथ नहीं रह सकते. |
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