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'भाजपा संकीर्ण विचारधारा, ग़लत रणनीति का शिकार' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
16 मई, 1600 IST: मैं इन परिणामों को क्षेत्रीय दलों के ख़िलाफ़ जनादेश के रूप में नहीं देखता हूँ. बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में क्षेत्रीय दल ने अच्छा प्रदर्शन किया है. उधर तमिलनाडु में द्रमुक ने काफ़ी अच्छा प्रदर्शन किया है. मैं इसे विभिन्न राज्यों में बेहतर सरकार (प्रशासन) देने के जनादेश के रूप में देखता हूँ. जिन राज्य सरकारों ने बेहतर काम किया उन्हें पुरस्कार दिया गया और अन्य सरकारों को सुशासन न दे पाने का हरजाना भरना पडा. जहाँ तक भारतीय जनता पार्टी का सवाल है, भाजपा ने शुरुआत से ही अपनी शक्ति का आकलन ग़लत किया था. भाजपा अपने तमाम विकास-चढ़ाव के बावजूद देश के कुछ इलाक़ों में सिमटी छोटी पार्टी है. यदि वह उन इलाक़ों में बहुत ज़्यादा वोट ले पाती है तब तो वह अच्छा प्रदर्शन करती है लेकिन ये तय है कि कांग्रेस उसके मुकाबले एक बड़ी पार्टी है भाजपा ने इस चुनाव के दौरान दो तरह की ग़लती की है. एक तो यह कि उसका एनडीए गठबंधन छोट होता चला गया, क्योंकि उसके सहयोगी उसे छोड़कर जाते गए. इसका कारण यह है कि भाजपा की संकीर्ण विचारधारा में ये संकीर्णता उसके राजनीतिक सहयोगियों को रास नहीं आती है. दूसरा यह कि भाजपा अपनी रणनीति तय नहीं कर पाई कि वह सरकार को किस मुद्दे पर घेरना चाहती है. या फिर यूँ कहें कि सरकार ने भाजपा को मौक़ा ही नहीं दिया कि वह उसे घेरे. फ़िलहाल परिणामों के गहरे आकलन में तो बाद में जाएँगे. लेकिन राज्यों के जोड़ और घटाव के अलावा इस परिणाम से कांग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के पक्ष में हल्की सी राष्ट्रीय लहर तो नहीं लेकिन हवा का असर दिखता है. अंगल बिहार, झारखंड को छोड़ दिया जाए जहाँ विशेष परिस्थितियों के कारण अलग परिणाम आए हैं, तो कांग्रेस और सहयोगियों को जितनी संभावना थी, उसे उससे भी ज़्यादा सीटें मिली हैं. कांग्रेस का गुजरात, कर्नाटक, छत्तीगढ़ और मध्यप्रदेश में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन रहा है. शायद लोगों को कई साल बाद एक ऐसी सरकार मिली जिसके खिलाफ़ चुनाव में सत्ता विरोधी लहर नहीं थी. निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की साफ़-सुधरी साख का कांग्रेस को फ़ायदा हुआ है. जब यूपीए अध्यक्ष सोनिया ने लाभ-के-पद मुद्दे पर इस्तीफ़ा दिया था, उससे भी उनकी नैतिक छवि अन्य नेताओं के मुकाबले में बेहतर नज़र आई. ये कहना जल्दबाज़ी होगी कि मनमोहन या सोनिया का करिश्मा चल गया. हक़ीकत तो यह है कि मनमोहन सिंह की भूमिका चुनाव में बहुत ही सीमित रही है. ये चुनावी दंगल कांग्रेस ने सोनिया गांधी के नेतृत्व में जीता है, यह एक राजनीतिक अस्तित्व है. जहाँ तक पश्चिम बंगाल का सवाल है, वहाँ एक बुनियादी बदलाव हुआ है. उस राज्य में काफ़ी समय से ख़ास तरह का असंतोष फैल रहा था. लेकिन उसकी अभिव्यक्ति के लिए जगह नहीं थी और इसे सीटों में बदलने लायक कोई गठबंधन भी नहीं था. इस बार जनता को वह अवसर मिल गया और इसके चलते ‘ऐस्टेबलिशमेंट’ यानी सत्ताधारी पार्टी को जनता ने झकझोड़ दिया. पश्चिम बंगाल में जनता ने गुस्से का इज़हार किया है. 16 मई, 1000 IST: यह स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को इस चुनाव में साफ़ बढ़त मिली है. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) गठबंधन पिछड़ता लग रहा है. अब तक के रुझानों के मुताबिक यूपीए गठबंधन एनडीए के गठबंधन से 40 या 50 सीटें आगे रह सकता है. सरकार बनाने के खेल में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यूपीए का पलड़ा भारी हो सकता है. 16 मई, 0900 IST: भारत की 15वीं लोकसभा के लिए हुए चुनावों में मतगणना का काम जारी है और शुरुआती रुझान आने शुरु हो गए हैं. शुरुआती रुझानों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट ने स्पष्ट बढ़त बना ली है. कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी ने बढ़त बनाई है लेकिन ऐसा नहीं है कि वह पूरे राज्य में आगे चल रही हो. तो कर्नाटक से आ रहे रुझानों से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि स्थिति पिछली बार जैसी ही हो सकती है. इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल शुरु होने के बाद हमारा अनुभव ये बताता है कि शुरुआती रुझानों और अंतिम परिणामों में काफ़ी अंतर हो सकता है. |
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