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उत्तर प्रदेश में पार्टियों की खींचतान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में जहाँ लोकसभा के लिए हुए चुनावों के मतगणना से पहले राजनीतिक जोड़-जोड़ अपने चरम पर है, वहीं उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ़ नया मोर्चा खोल दिया है. उन्होंने राज्यपाल टी राजेश्वर राव से मिलकर एक ज्ञापन दिया है, जिसमें मायावती सरकार पर आरोप लगाया है कि वह पत्थर से बनी विधानसभा भवन की ऐतिहासिक इमारत को सफ़ेद रंग से रंगवा कर एक धरोहर को नष्ट कर रही हैं, जिसे तुंरत रोका जाए. रीता जोशी के इस क़दम को इस बात का एक संकेत माना जा रहा है कि फ़िलहाल राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के बीच सहयोग संभव नहीं. एक सवाल के जवाब में रीता जोशी ने खुल कर कहा कि चूँकि मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने परमाणु समझौते पर केंद्र सरकार का साथ दिया था इसलिए पहली और स्भाविक पसंद वहीं हैं, बाक़ी इस बात पर निर्भर करेगा कि उनकी कितनी सीटें आती हैं और सरकार बनाने में वह कितनी सार्थक भूमिका अदा करते हैं. वैसे प्रेक्षकों का कहना है कि मुलायम सिंह यादव के पास कांग्रेस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में शामिल होने के अलावा विकल्प नहीं है. रिश्ते ठीक करने की कोशिश
मुलायम सिंह यादव ने दिल्ली में डेरा डाल दिया है और उन्होंने कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह से रिश्ते ठीक कर लिए हैं. उत्तर प्रदेश में अभी मायावती की बहुमत वाली सरकार है और उनसे लड़ने के लिए मुलायम सिंह यादव को केंद्र सरकार का सहारा चाहिए. आगे की राजनीति को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी भी बहुजन समाज पार्टी का साथ लेने या देने के पक्ष में नहीं है. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी का कहना है,"मायावती से समर्थन लेना पड़ा तो बड़ा ख़तरनाक होगा, हम राज्य में साफ़ हो जाएँगे. मायावती से कोई बात नहीं हो रही है." बहुजन समाज पार्टी की तरफ़ से भी कहा जा रहा है कि भाजपा या कांग्रेस से तालमेल पर कोई बात नही चल रही है. बसपा की पहली कोशिश यही है कि तीसरे मोर्चे के सहयोग से मायावती प्रधानमंत्री बने. लेकिन इन सब से हटकर लोक दल नेता अजित सिंह पर निगाह रखने की ज़रूरत है, क्योंकि माना जाता है कि वह कभी भी और कहीं भी जा सकते हैं. अजित सिंह ने भाजपा के साथ सीटों का तालमेल किया है और उनको उसका लाभ भी मिल सकता है. |
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