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क्या है मुस्लिम पार्टियों की राजनीति? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय ने पंद्रहवीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव में न सिर्फ़ अपनी राजनीतिक पार्टियाँ बनाई हैं बल्कि अपने उम्मीदवार भी खड़े किए. अब तक मुसलमान हिंदू कट्टरपंथी दलों को हराने के लिए दूसरी पार्टियों को वोट देते आए हैं. ऐसा करके वे न केवल धर्मनिरपेक्ष होने का सबूत देते रहे बल्कि लोकतंत्र को मज़बूत भी करते रहे. लेकिन चुनाव से ठीक पहले उलेमा काउंसिल और पीस पार्टी जैसी अचानक पैदा हुईं आधा दर्जन मुस्लिम पार्टियों की अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का अचानक ख़्याल पैदा होना कुछ ऐसी बातें हैं जो आम मुसलमानों के गले नहीं उतर रही हैं. अपना फ़ायदा
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि ये पार्टियाँ अपना उल्लू सीधा करने के लिए सामने आई हैं. वरिष्ट पत्रकार और मुस्लिम बुद्धिजीवी मोहम्मद ज़ियाउल हक़ का मानना है कि ये लोग बहती गंगा में हाथ धोने के लिए सामने आए हैं. कई समाचार पत्रों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, “इनको भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का समर्थन हासिल है क्योंकि भाजपा ये जानती है कि मुसलमान उन्हें वोट देने से रहे, चलो इसी बहाने उनके विरोधियों का अच्छा-ख़ासा वोट कट जाएगा. इससे उनकी जीत आसान हो जाएगी.” जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर और समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ अहमद का कहते हैं, "भारत का भूगोल कुछ ऐसा है कि यहाँ कोई भी समुदाय सिर्फ़ अपने बलबूते चुनाव नहीं जीत सकता और जहाँ तक मुसलमानों की बात है यह 15 फ़ीसदी के बस की बात नहीं है." उन्होंने कहा कि केरल का मलप्पुरम हो या पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद वहाँ भी मुसलमानों का सिर्फ़ अपने बलबूते पर चुनाव जीतना बहुत मुश्किल है. प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ के मुताबिक़ असम और कश्मीर जहाँ मुसलमानों का सही मायनों में ज़्यादा दिन तक राज नहीं रहा वहाँ मुसलमानों की संख्या उन राज्यों के मुक़ाबले बहुत अधिक है जहाँ उन्होंने निरंतर राज किया. सांप्रदायिक राजनीति दूसरी ओर समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के समर्थन से जीतने वाले राज्यसभा सांसद मोहम्मद अदीब कहते हैं, "देश में मुसलमान संप्रदायिकता के ख़िलाफ़ एकजुट रहे हैं ऐसे में किसी मुसलमान पार्टी का सामने आना दूसरी तरह की संप्रदायिकता ही तो हुई." उन्होंने कहा, "मैं सपा और कांग्रेस के समर्थन से सांसद बना लेकिन जब सपा में कल्याण सिंह को शामिल करने की बात आई तो हम सपा प्रमुख मुलायम सिंह जी को समझाने की कोशिश करते रहे, लेकिन वे नहीं माने." उन्होंने कहा, "हम लोगों ने बाबरी मस्जिद गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले एक व्यक्ति के लिए सपा का साथ छोड़ा और पूरी तरह कांग्रेस के समर्थन में सामने आए." अलीगढ़ में पढ़े मोहम्मद अदीब ने कहा, "उलेमा काउंसिल या दूसरी पार्टियों की नीयत तो ठीक हो सकती है लेकिन उसका असर उल्टा पड़ेगा वे संप्रदायिकता का विरोध करते हुए संप्रदायिक शक्तियों को ही मज़बूत करेंगी." प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ कहते हैं, "मुस्लिम पार्टी होने में कोई दिक़्क़त नहीं है लेकिन उनके साथ दूसरे लोग भी हों, उनका एजेंडा किसी एक समुदाय के लिए न हो बल्कि उसमें सबके लिए समानता हो." उन्होंने कहा कि इस मापदंड पर भाजपा भी खड़ी नहीं उतरती इसलिए हम उसे सांप्रदायिक पार्टी कहते हैं और उसका विरोध करते हैं.
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को ऐसे क़दम उठाने चाहिए जिसमें किसी पार्टी को मान्यता देने की कसौटी ऐसी हो जिससे सांप्रदायिक पार्टियों को मान्यता ही न मिल पाए. प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ के मुताबिक़ मुसलमानों को आम मुद्दों पर सामने आना चाहिए न कि समुदाय केंद्रित मुद्दों की बात उठानी चाहिए. अगर भारत आर्थिक रूप से प्रगति करेगा तो ज़ाहिर हैं कि इसमें मुसलमानों की भी प्रगति शामिल है. मुसलमानों के हित उन्होंने मुसलमानों की ओर से इस तरह की राजनीति को मुसलमानों और देश के लिए घातक बताया. उन्होंने कहा कि ख़ुशी इस बात की है कि आम मुसलमान मतदाता ज़्यादा समझदार है और वह इन लोगों के झांसे में नहीं आता है. आज़मगढ़ सीट से उलेमा काउंसिल के उम्मीदवार डॉक्टर जावेद अख़्तर कहते हैं, " मैं राजनीति में केवल चुनाव लड़ने नहीं आया हूँ बल्कि वे विरोध की आवाज़ को सरकार तक पहुँचाने के लिए मैदान में आया हूँ." |
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