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पुणे: बसपा तोड़ पाएगी कलमाडी के वोट? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
महाराष्ट्र का पुणे शहर दुनिया के उन पंद्रह शहर में से एक है जिनमें सबसे तेज़ी से विकास हो रहा है. लेकिन कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले पुणे लोकसभा चुनाव क्षेत्र में इस बार कांग्रेस को कड़ी चुनौती मिल रही है. अठारह लाख मतदाताओं के इस चुनाव क्षेत्र में 36 उम्मीदवार मैदान में हैं. शहर की चरमराती ढांचागत व्यवस्था यहाँ का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है. पुणे के महत्व के बारे में यहाँ से दो बार जीत चुके कांग्रेस उम्मीदवार सुरेश कलमाडी बताते हैं कि यह मोटर उद्दोग और सूचना प्रौद्योगिकी का सबसे बड़ा केंद्र है. सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से पुणे से 25000 करोड़ रुपए का निर्यात होता है लेकिन तेज़ी से उभरते इस शहर में सड़कों पर ट्रैफ़िक चलता नहीं रेंगता है. इसके अलावा पर्यावरण प्रदूषण से भी लोग बेहाल हैं. चुनावों की सरगर्मी धीरे-धीरे ज़ोर पकड़ रही है और उतनी ही मुखर हो रही हैं यातायात व्यवस्था में सुधार की मांग. लेकिन कांग्रेस की रैली में उसके उम्मीदवार सुरेश कलमाडी के प्रचार के लिए आए राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख स्थानीय मुद्दों पर बात नहीं करते बल्कि केंद्र सरकार की उपलब्धियाँ गिनाने लगते हैं. त्रिकोणीय मुकाबला पिछले पंद्रह साल से ज्यादा समय से भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष रहे सुरेश कलमाडी यह आरोप झेलते रहे हैं कि उन्होंने खेल पर ज़्यादा शहर के विकास पर कम ध्यान दिया है. लेकिन वे कहते हैं कि खेल के ज़रिए पुणे के लिए 2500 करोड़ रुपए लाए हैं. पुणे में 36 उम्मीदवारों की मौजूदगी के बावजूद मुकाबला त्रिकोणीय है. भाजपा के उम्मीदवार और नगरसेवक अनिल शिरोल जाना माना नाम नहीं हैं लेकिन वो पूछते हैं कि सुरेश कलमाड़ी के हाई प्रोफ़ाइल होने का पुणे को क्या फ़ायदा हुआ.? वे कहते हैं, "अगर 25 बरस से कलमाडी साहब सांसद हैं फिर भी आज पुणे में समस्या क्यों है? पब्लिक ट्रांसपोर्ट ठीक नहीं हैं, झुग्गी झोंपड़ियाँ बढ़ रही हैं, अनेक स्थानों पर पानी नहीं मिल रहा है. सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं हैं. सब नदी में जा रहा है." दरअसल गोपीनाथ मुंडे के क़रीबी माने जाने वाले अनिल शिरोल भले ही सुरेश कलमाडी के नज़दीकी प्रतिद्वंद्वी हों, पुणे में भाजपा की भीतरी अंतर्कलह से भी उन्हें जूझना पड़ रहा है. सुरेश कलमाड़ी पिछली बार 70 हज़ार से ज्यादा वोटों से जीते थे. वे शरद पवार के पुराने चेले और मित्र माने जाते हैं. उनके लिए शरद पवार तीन बार रैलियां भी कर चुके हैं. पर इस बार प्रेक्षकों का कहना है कि उनके कई समर्थक उनका साथ नहीं दे रहे. उधर बहुजन समाज पार्टी उम्मीदवार डीएस कुलकर्णी सुरेश कलमाडी के लिए खासी बड़ी समस्या खड़ी कर रहे हैं. ग़रीबी से उठ कर आज पुणे की एक सबसे बड़ी भवन निर्माण कंपनी के मालिक डीएस कुलकर्णी बहुजन समाज पार्टी के दलित और बाह्मण वर्ग की सोशल इंजीनियरिंग का चेहरा हैं. दलित वोट बहुजन समाज पार्टी उम्मीदवार डीएस कुलकर्णी की नज़र है पुणे के 15 प्रतिशत दलित और लगभग उतनी ही संख्या में मौजूद ब्राह्मण वोटरों पर. डीएस कुलकर्णी मानते हैं कि यह सोशल इंजीनियरिंग समाज को जोड़ने का काम करेगी.
वे कहते हैं, "यह नटबोल्टिंग है, इसका फ़ायदा भी होता है. मेरी पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग का लक्ष्य अभी भले ही राज्य की कुर्सी हो लेकिन व्यावहारिक रूप से यह समाज की शांति के लिए है. अगर यह सोशल इंजीनियरिंग पूरे भारत में चले तो 26/11 दोबारा नहीं हो सकता, यह मेरा विश्वास है." पुणे में कांग्रेस दलित वोटों पर अपना कब्ज़ा मान कर चलती रही है. मगर प्रेक्षकों का कहना है कि कुलकर्णी भले ही हार जाएं लेकिन अगर वो दलित वोट में सेंध लगा दें तो सुरेश कलमाड़ी को वही झेलना पड़ेगा जो पिछली बार बसपा की वजह से प्रफ़ुल्ल पटेल को झेलना पड़ा था. लेकिन सुरेश कलमाडी ऐसा नहीं मानते. उनका कहना है, "दलित वोट पूरी तरह मेरे साथ है. मैंने उन्हें 350 घर देने का वायदा किया था, वह हो ही चुका है. अभी एक-दो साल में आप देखेंगे कि सबको 350 वर्ग फ़ुट के फ़्लैट मिलेंगे. पुणे के लोग मुद्दा सिर्फ़ एक ही जानते हैं - घर का, बाक़ी के समीकरण नहीं." सुरेश कलमाडी भले ही वज़न में अपने प्रतिद्वंदियों से भारी हों लेकिन इस बार उनके भाग्य का फ़ैसला बहुत हद तक इस बात पर निर्भर है कि बसपा कितने वोट तोड़ती है. लिहाज़ा इस बार पुणे में कांग्रेस के लिए काफ़ी कठिन है डगर पनघट की.... |
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