मोदी-महबूबा मुलाक़ात से क्या कश्मीर शांत होगा?

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    • Author, बशीर मंज़र
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

शनिवार को भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली में मिल रहे हैं.

कश्मीर में लोगों को इस मुलाकात से कोई ख़ास उम्मीदें नहीं हैं.

इससे पहले गृहमंत्री राजनाथ सिंह कश्मीर का दो बार दौरा कर चुके हैं.

राजनाथ सिंह ने कहा था कि कश्मीर समस्या पर बातचीत हो सकती है. उन्होंने लोगों की मौत पर दुख जताते हुए पैलेट गन का विकल्प खोजने की बात कही थी.

लेकिन इन सबके बावजूद पिछले 50 दिनों में नई दिल्ली से कोई ऐसी पहल नहीं की गई जिससे कश्मीर का माहौल थोड़ा शांत हो सके. कश्मीरियों को ये लगे कि उनके बारे में कुछ सोचा जा रहा है.

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ऐसे में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की मुलाकात से कोई बहुत उम्मीदें नहीं हैं.

कश्मीर में तनाव शुरू होने के एक महीने बाद महबूबा मुफ़्ती दिल्ली में थीं. लेकिन उस वक्त वे केवल गृह मंत्री और रक्षा मंत्री से तो मिलीं थी. उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री से नहीं हो पाई थी.

इस बार महबूबा खासतौर पर मोदी से मुलाकात के लिए दिल्ली में हैं.

ऐसा इसलिए क्योंकि नई दिल्ली में कहीं न कहीं ये माहौल बन रहा है कि ये मसला केवल कानून-व्यवस्था का मसला नहीं है.

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अब तक ये बातें उठती रहीं कि कश्मीर में तनाव के पीछे पाकिस्तान का हाथ है, या ये कानून व्यवस्था का मसला है.

लेकिन आज 50 दिन गुजर गए. बहुत सारे लोगों की जानें गईं हैं. ये अशांति थमने का नाम नहीं ले रही है.

कश्मीर कर्फ्यू, हड़ताल और पाबंदियों का देश बन गया है. विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं, जुलूस भी निकाले जा रहे हैं.

मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती का कहना है कि कश्मीर के 95 फीसदी लोग समस्या का शांतिपूर्ण तरीके से समाधान चाहते हैं.

वहीं राज्य के विपक्षी दलों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार इस समस्या पर एक ही तरीके से सोचते हैं.

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ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री मिल रहे हैं ताकि इस समस्या पर राजनीतिक नज़रिए से सोचा जाए और हल निकाला जाए.

इस बैठक में संभावना है कि बातचीत में अलगाववादियों को शामिल करने की कोशिश पर बात हो.

अब तक राज्य की पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार और विपक्षी नेशनल कॉन्फ़्रेंस के बीच बातचीत होती रही है.

लेकिन एक बड़ा तबका है जिसमें अलगाववादी है, या जिन्हें आजादी पसंद नेता कहा जाता है उनको बातचीत में शामिल करना जरूरी है. उन्हें अलग रखकर कश्मीर समस्या का हल संभव नहीं है.

यहां अटल बिहारी बाजपेयी का फार्मूला अपनाने की बात होती है. तो ये जरूरी है कि हुर्रियत नेताओं के साथ बातचीत का एक दरवाजा खुलना चाहिए. तब जाकर हालात में कुछ सुधार आ सकता है.

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