हर घर कुछ कहता है!

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- Author, खुशबू दुआ
- पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
खिड़कियां और दरवाज़े हमारे घरों के बारे में बहुत कुछ बयां करते हैं और मुंबई में विविध जगहों पर मिलने वाला वास्तु शास्त्र देखने लायक़ है.
मुंबई की गलियों में घूमते हुए ली गई खिड़की दरवाज़ों की यह तस्वीरें आपको मुंबई के वास्तु, इतिहास और संस्कृति के अलावा यहां के लोगों के रहन-सहन, पसंद-नापसंद और शायद उनके धर्मों के बारे में भी कुछ बता सकती हैं.

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इस तरह की खिड़कियां 19वीं या 20वीं सदी की आवासीय इमारतों में पाई जाती थीं.
यह पत्थर से ढंकी होती थीं. महंगी होने के कारण इनका यहां होना इनके उच्च श्रेणी के होने का प्रमाण है. चमकते हुए दरवाज़ों पर चौखट और छड़ें होती थीं और ऐसा निर्माण थोड़ा बहुत शास्त्रीय पुनरुद्धार शैली से प्रभावित था.

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सागौन की लकड़ी की पॉलिश के साथ प्लास्टर के अगवाड़े (फ़्रेम) पर बनी इन खिड़कियों में 19 वीं सदी की मुंबई की झलक मिलती है.
दक्षिणी मुंबई में मौजूद एक टूटी हुई इमारत की इस दीवार में मुंबई आनेवाले अंग्रेज़ी, पुर्तगाली और ईरानी सभ्यताओं की मिली जुली झलक है.

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एक बहुत ऊंचे चबूतरे पर प्लास्टर की चिनाई वाली इस इमारत में लगी ग्रिल पर कारीगरी पुरानी दिखती है क्योंकि अब ऐसी कारीगरी कम ही मिलती है.
मशीनी कट और हाथ के बनाए काम में आसानी से फर्क पहचाना जा सकता है. इस तरह का काम आज हाथ से करवाने के लिए आपको लाखों देने पड़ सकते हैं ऐसे में ज़ाहिर है कि यह एक ‘वेल्थी’ घर है.

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ऊंचे पत्थर के चबूतरे और एक बंद आर्केड का एक ठेठ घरेलू या स्थानीय संस्कृति वाला घर और इस पर मराठी सभ्यता की झलक है क्योंकि इसमें चबूतरा अंदर की ओर है जिससे बारिश का पानी आपको परेशान नहीं करेगा.

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एक वीरानी संपत्ति जिसकी बालकॉनी नक्काशीदार और लकड़ी के खानों की शायद स्टील के खम्बे से मरम्मत की गई है. मकान के हालात बता रहे हैं कि इसे फ़िलहाल छोड़ दिया गया है.

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18वीं सदी की मुंबई की एक उच्च श्रेणी की इमारत. शायद एक पारसी घर, जिसमें आठकोण है, अग्नि पूजा के लिए आदर्श स्थान और इसकी झरोखेदार खिड़कियों से बारिश के समय में लगातार ठंडी हवा आती है.

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यह एक ठेठ 19 वीं या 20 वीं सदी की इमारत है और इसमें ईरानी संस्कृति की झलक मिलती है, हालांकि रेनोवेशन के चलते इसके अंदर काफ़ी बदलाव आए हैं लेकिन सजावटी प्लास्टर, अधिकखिड़कियों, सागौन के झरोखे यह ज़ाहिर करते हैं कि किसी ज़माने में इसे किसी विदेशी ने बनाया होगा क्योंकि वो खुले, हवादार और रोशनी वाले घरों में रहना पसंद करते थे.

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यह एक लाजवाब पत्थर से बनी ईमारत का आगे का चेहरा है और पुरातन कला शिल्प का नमूना यह घर मॉर्डन त्रिआयामी शीशों के इस्तेमाल से और भी रंगीन दिख रहा है.

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मुंबई की एक चाल, यह प्रचलित घर हैं और चाल में मौजूद हर कमरे में एक अलग परिवार किराए पर रहता है.
19वीं सदी के अंत में मज़दूरों के लिए बनाए गए इन आशियानों में सागौन की लकड़ी का काफ़ी काम हुआ है लेकिन यह कलाकारी नहीं सिर्फ़ इमारत को मज़बूती देने के लिए किया गया है. आजकल चॉल लकड़ी के न होकर टिन या सीमेंट से ही बना दिए जाते हैं जिन्हें एसआरए या स्लम रिडिवेलेपमेंट एरिया के नाम से भी जाना जाता है.
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