साक्षी-सिंधू के देश में अब उगेंगी बेटियां

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

सवा अरब आबादी वाले देश भारत में एक-दो ओलंपिक पदक मिलने से लोग इतने जोश में हैं तो ताज्जुब नहीं क्योंकि हमारे लिए हर ओलंपिक में पदकों का अकाल रहा है.

पीवी सिंधु और साक्षी मालिक को मिली सफलता से यदि पूरा देश मचल उठा है तो आश्चर्य नहीं क्योंकि इस बार इन दोनों लड़कियों ने देश की लाज रख ली. इनके कारण पदक तालिका में अब भारत का नाम भी शामिल हो गया.

लेकिन ये जश्न, ये जोश उस समय फीका लगने लगता है जब हम लड़कियों की लगातार घटती आबादी पर नज़र डालते हैं, खासतौर से 0-6 आयु वर्ग की. ज़रा ग़ौर कीजिये, 1961 के जनगणना के अनुसार 0-6 की उम्र वाले हर 1000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या 975 थी.

जब 2011 की जनगणना के नतीजे सामने आए तो कन्याओं की संख्या घट कर 906 हो गयी. इस सामाजिक अपराध में हरियाणा और पंजाब सबसे आगे है.

हमें मालूम है कि कन्या भ्रूण हत्या बच्चियों की इस घटती संख्या का प्रमुख कारण है. सरकार भी इसे स्वीकार करती है.

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लड़कियों का अनुपात बेहतर करने के लिए कई योजनाएं आयी हैं लेकिन अब तक इसमें कोई अधिक फायदा नहीं हुआ है. नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद लड़कियों के प्रोत्साहन के लिए लड़की बचाओ, लड़की पढ़ाओ का नारा दिया है.

कुछ साल पहले महाराष्ट्र में प्रशासन ने 300 लड़कियों का एक समारोह में नामकरण किया. उनकी उम्र 15-16 थी लेकिन उनके माता-पिता ने उन्हें अब तक कोई नाम नहीं दिया था.

उन्हें केवल नकुशा कह कर बुलाया जाता था क्योंकि वो अपने परिवार में पैदा होने वाली दूसरी या तीसरी बेटियां थीं. उनकी जगह उनके माता-पिता बेटे की उम्मीद कर रहे थे. इसलिए उन्हें नकुशा कहा गया यानी अनचाही और बेनाम औलाद.

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ये उम्मीद रखने में कोई हर्ज नहीं कि सिंधु और साक्षी की कामयाबी से लाखों ऐसे माता-पिता प्रेरित होंगे जो बेटी नहीं बेटा चाहते हैं.

और ये माता-पिता लड़कियों और बेटियों पर कोई एहसान नहीं करेंगे. ये तो आम बात है. विकसित समाज में बेटी बेटे से कम नहीं होती.

अगर अब भी बेटियों से घृणा करने वाले परिवारों ने सबक़ नहीं सीखा तो हमारे देश में सिंधु और साक्षी जैसी बेटियाँ कैसे पैदा होंगी?

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