क्या है भारत में देशद्रोह का क़ानून?

कन्हैया कुमार

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सेडिशन लॉ यानी देशद्रोह क़ानून एक औपनिवेशिक क़ानून है, जो ब्रितानी राज ने बनाया था. लेकिन भारतीय संविधान में उसे अपना लिया गया था.

भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 124 A में देशद्रोह की परिभाषा दी गई है जिसमें लिखा है कि अगर कोई भी व्यक्ति सरकार-विरोधी सामग्री लिखता है या बोलता है या फिर ऐसी सामग्री का समर्थन भी करता है तो उसे आजीवन कारावास या तीन साल की सज़ा हो सकती है. हालांकि ब्रिटेन ने ये क़ानून अपने संविधान से हटा दिया है, लेकिन भारत के संविधान में ये विवादित क़ानून आज भी मौजूद है.

भारत पर ब्रितानी राज के समय इसे महात्मा गांधी के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया गया था.

अरुंधति रॉय

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जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष कन्हैया कुमार और कई छात्र नेताओं के ख़िलाफ़ ये आरोप लग चुका है. कन्हैया कुमार और उमर ख़ालिद को भी गिरफ़्तारी के बाद ज़मानत मिल गई.

गुजरात में हार्दिक पटेल पर भी देशद्रोह के तहत मामला दर्ज किया गया है. बाद में अदालत ने उन्हें सशर्त ज़मानत दी है.

अब मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के ख़िलाफ़ ये मामला दर्ज किया गया है.

इससे पहले अरुंधति रॉय और बिनायक सेन पर भी देशद्रोही का आरोप लग चुका है. मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन को तो देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सज़ा सुना दी गई थी, जिसके खिलाफ उन्होंने उच्चतम न्यायालय में केस लड़ा. वहाँ से उन्हें ज़मानत मिली.

एमनेस्टी इंटरनेशनल

कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को कार्टूनों के आधार पर राष्ट्रीय चिन्हों का अपमान करने, संविधान को नीचा दिखाने और देशद्रोही सामग्री छापते के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. उन्हें भी बाद में ज़मानत मिली.

एक ओर भारतीय संविधान में देशद्रोह को एक अपराध है. दूसरी ओर संविधान में भारतीय नागरिकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी भी दी गई है. ऐसे में देशद्रोह के आरोप में हुई गिरफ्तारियों की मानवाधिकार कार्यकर्ता व संस्थाएं आलोचना करती रही हैं.

मानवाधिकार कार्यकर्ता आरोप लगाते हैं कि देशद्रोह से जुड़े क़ानून की आड़ में सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार करती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस क़ानून की कड़ी आलोचना होती रही है और इस बात पर बहस छिड़ी है कि अंग्रेज़ों के ज़माने के इस क़ानून की भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जगह होनी भी चाहिए या नहीं.

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