गंगा किनारे काशी में 'क्लासिकल वंदेमातरम्'

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    • Author, रोशन जायसवाल
    • पदनाम, वाराणसी से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए

राष्ट्र पर्व के मौके पर देशभक्ति के तराने तो फिजाओं में गूंजने लगते हैं.

लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि हमारे देश में एक ऐसी भी जगह है जहां राष्ट्रगीत 'वन्दे मातरम्' के दर्जनभर से अधिक शास्त्रीय रूप मौजूद हैं.

वाराणसी में राष्ट्रगीत के 'क्लासिकल वर्जन' का दुर्लभ संग्रह है.

यह संग्रह मौजूद है संगीत साधक 61 साल के कृष्ण कुमार रस्तोगी के पास. कृष्ण कुमार काशी संगीत समाज के संयोजक भी हैं.

हम सब जानते हैं कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने राष्ट्रगीत 'वंदेमातरम्' की रचना की और मशहूर लेखक और कवि रविंद्रनाथ टैगोर ने इसे स्वर दिया.

लेकिन सबसे ज्यादा अगर किसी की गायकी लोकप्रिय हुई तो वो थे पंडित ओंकारनाथ ठाकुर. उन्होंने आज़ादी की लड़ाई के वक्त इस गीत को 'बंगीय काफी राग' में गाया था.

कृष्ण कुमार रस्तोगी ने बीबीसी हिंदी को बताया कि पहले स्वतंत्रता दिवस पर यही कम्पोजिशन दिल्ली में पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने गाया था. पण्डित जी की आवाज में राष्ट्रगीत 'वन्देमातरम्' 78 आरपीएम पर ग्रामोफोन की दुर्लभ डिस्क आज भी उनके 'धरोहर' नाम के संग्रहालय का हिस्सा है.

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इसके अलावा अलाउद्दीन खाँ साहब ने पुराने वक्त में जो बैंड बनाया था उसमें भी उनके शिष्य रहे, कई बांग्ला फिल्मों में मशहूर गानों को संगीत देने वाले तिमिर बरन ने 'वंदेमातरम्' को संगीत दिया था. इसकी एक काॅपी आज भी उनके संग्रह का हिस्सा है.

लता मंगेशकर की मशहूर आवाज़ में 'वंदेमातरम्' भले आज डीवीडी और सीडी की शक्ल में दिख जाती है, लेकिन 'धरोहर' संग्रहालय में आज भी ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड में इसे सुना जा सकता है.

'वन्देमातरम्' को रविंद्रनाथ टैगोर ने स्वर दिया और अपनी आवाज में गाया भी. इसका प्रमाण कृष्ण कुमार के कलेक्शन में मौजूद है.

कृष्ण कुमार बताते हैं कि उस वक्त रविंद्रनाथ टैगोर के "वन्देमातरम्" की गाये गीत को तांबे के तार पर रिकॉर्ड किया गया था, फिर वो तार जर्मनी गया था, फिर वहां से ग्रामोफ़ोन का रिकॉर्ड बनकर भारत लाया गया था.

महाराष्ट्र के दिग्गज शास्त्रीय संगीतज्ञ केशवराव भोले की आवाज में इसकी एक काॅपी भी उनके पास है.

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'वन्देमातरम्' कृष्ण कुमार के संग्रह से कभी भी सुना जा सकता है.

इसके अलावा महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, मालवीय जी और सुभाषचंद्र बोस के हस्ताक्षर किए हुए भाषणों के दुर्लभ ग्रामोफोन डिस्क भी उनके संग्रहालय की शान है.

वे बताते हैं कि लगभग 45 सालों से वे इनका संग्रह कर रहे हैं. कुछ कलेक्शन तो उनको उनके पिता स्वर्गीय श्री लक्ष्मी नारायण जी रस्तोगी से मिला है. फिर धीरे धीरे दुर्लभ संगीत के कलेक्शन करने की उनकी भूख बढ़ती गई.

एलपी किसी से उपहार में तो किसी से खरीद कर वो इनका संग्रह करते चले आ रहे हैं.

आज उनके पास ग्रामोफोन के रूप में दुर्लभ शास्त्रीय गायन के रिकॉर्ड ही सैकड़ों की संख्या में है. अब तो इसमें से कुछ खास ढूंढ़ पाना बालू में सूई ढूढंने जैसा है.

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उनका संग्रहालय 'धरोहर' राजा-रजवाड़ों और काशी के जमींदारों की 1906 में बनाई गई संस्था 'काशी संगीत समाज' का हिस्सा है. इसमें ग्रामोफ़ोन के रिकॉर्ड्स के अलावा कई दुर्लभ वाद्ययंत्र, तस्वीरें और किताबें भी शामिल हैं.

संगीत नाट्य अकादमी उत्तर प्रदेश के पूर्व उपाध्याक्ष डा. राजेश्वर आचार्य ने बीबीसी हिंदी को बताया कि गुलाम भारत में 'वन्देमातरम्' स्वतंत्रता का मंत्र बन गया था. कितने जवान फांसी के फंदे पर 'वन्देमातरम्' बोलते हुए झूल गए.

पंडित ओंकारनाथ ठाकुर जी ने 'वन्देमातरम' को शास्त्रीय गायकी का रूप दिया. आजादी के बाद 'वन्देमातरम' को पूरा गाने के शर्त पर ही पंडित ओंकारनाथ ठाकुर जी ने दिल्ली जाकर गाने की बात मानी. क्योंकि उस वक्त 'वन्देमातरम्' के कुछ अंश पर रोक थी.

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