'पीएम के जजों पर न बोलने से निराश हूँ'

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भारत के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से अपने भाषण में जजों की नियुक्ति के मुद्दे का कोई ज़िक्र नहीं किया जिससे वो प्रधानमंत्री के भाषण से निराश हुए हैं.

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जस्टिस ठाकुर ने कहा कि, "मुझे लगता है कि मैं अपने करियर के उस मुकाम पर पहुंच गया हूं जहां मैं अपने मन की बात कह सकता हूं. मैंने प्रधानमंत्री और क़ानून मंत्री का भाषण सुना. उम्मीद थी कि जजों की नियुक्ति पर कुछ कहा जाएगा. मैं सरकार से निवेदन करता हूं कि वो न्यायपालिका को कमज़ोर कर रहे मुद्दों पर तवज्जो दे, ख़ासतौर से जजों की नियुक्ति के मसले पर."

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अंग्रेजों के ज़माने में दस साल में फैसले आ जाते थे, लेकिन अब न्यायपालिका की दिक्कतों की वजह से देरी होती है.

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री देश से जुड़े हर विषय पर बोलते हैं, जो अच्छी बात है, लेकिन उन्हें न्यायपालिका की समस्याओं पर भी बोलना चाहिए.

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भारत के मुख्य न्यायधीश की टिप्पणी प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस के भाषण पर आई है जिसमें मोदी ने ऐसे क़ानूनों का जिक्र किया था जिन्हें सरकार खत्म कर रही है.

मोदी ने कहा था,"हमने क़ानूनों के जंजाल का बोझ कम करने का भी काम किया. हमने ऐसे 1700 क़ानून ढूंढ निकाले हैं जिसे निरस्त करने का काम किया जा रहा है."

मुख्य न्यायाधीश के इस बयान पर सोशल मीडिया में खूब चर्चा हो रही है.

अभिषेक मिश्रा(@1abhishekmishra) ने लिखा, "नेशनल जुडीशियरी अप्वाइंटमेंट कमीशन को खारिज किया जाना स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे काला दिन था."

वहीं विशाल गौतम (@gauttamvishal) ने ट्विटर पर लिखा, "सीजेआई टीएस ठाकुर साहब आपको बस अपनी भ्रष्ट न्यायपालिका की पड़ी है और पीएम साहब पूरे देश की सोच रहे हैं."

परेश रावल ने (@Babu_Bhaiya) लिखा, "मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर जी और दूसरे जजों की आलोचना करना ग़लत है. उन्होंने बहुत अच्छा काम किया है जैसे कि एक फ़ोन कॉल पर तीस्ता सीतलवाड़ को जमानत देना."

इससे पहले इसी साल अप्रैल में मुख्य न्यायाधीश ने एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में जजों की कमी और मुकदमों के लंबित होने पर एक भावनात्मक अपील की थी.

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