हार्दिक की तरह ही अचानक उभरे जिग्नेश मेवाणी

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली से
कुछ महीनों पहले तक जिग्नेश मेवाणी को अहमदाबाद के बाहर ज़्यादा लोग नहीं पहचानते थे.
जो उन्हें जानता भी था तो मुकुल सिन्हा के संगठन जन संघर्ष मंच की वजह से जिसने 2002 में गुजरात में हुए दंगों के पीड़ितों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी.
आज जिग्नेश देश भर के दलित नौजवानों का चेहरा बनकर सामने आये हैं. उनका संगठन ऊना दलित अत्याचार लड़त समिति बस कुछ ही दिनों पहले अस्तित्व में आया है.

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वो भी अहमदाबाद से ऊना तक की दलितों की पदयात्रा से ठीक पहले.
अहमदाबाद के एचके आर्ट्स कालेज से अंग्रेज़ी में स्नातक की डिग्री लेने के बाद जिग्नेश को डाक्यूमेंट्री बनाने में काफ़ी रुचि जागी.
कुछ ही दिनों में जिग्नेश ने फ़िल्म निर्माता राकेश शर्मा के साथ मिलकर सौराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या पर डाक्यूमेंट्री बनाने का काम शुरू कर दिया.

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फिर एक गुजराती मैगज़ीन में काम करने के बाद वो मुकुल सिन्हा के संगठन से जुड़ गए.
समाज शास्त्री अच्युत याग्निक का कहना है कि जिस तरह हार्दिक पटेल ने अचानक गुमनामी से बाहर निकालकर पटेलों के आंदोलन को नेतृत्व दिया उसी तरह जिग्नेश का भी उदय हुआ है.
जबकि, इस आंदोलन से पहले उन्हें कोई जानता भी नहीं था.

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याग्निक कहते हैं की ऊना में दलितों की पिटाई के बाद शुरू हुआ आंदोलन नेतृत्व विहीन ही चल रहा था. फिर आंदोलन से बड़े पैमाने पर दलित युवक जुड़ने लगे और इसी तरह जिग्नेश मेवाणी भी जाकर शामिल हो गए.
याग्निक मानते हैं कि जिग्नेश पढ़ी लिखी दलित युवा पीढ़ी का चेहरा बनकर आगे आये हैं.
वहीं दलित चिंतक और नागपुर विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर भाऊ लोखांडे कहते हैं कि गुजरात में शुरू हुआ दलित आंदोलन एक नए अध्याय की शुरुआत है.

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बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि 1980 के दशक के दौरान और पहले दलितों ने गुजरात में अपने ऊपर हो रहे अत्याचार के ख़िलाफ़ आंदोलन चलाया था.
उनका कहना है कि 1990 के दशक में संघ परिवार ने गुजरात को अपनी प्रयोगशाला बनाया.
उन्होंने कहा, "गोधरा काण्ड के बाद भी दलितों का इस्तेमाल हुआ. मगर ऊना की घटना ने सारे समीकरण बदल डाले."

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जिग्नेश मेवाणी की ज़िंदगी में भी नया मोड़ तब आया जब मुकुल सिन्हा के यहां उनकी मुलाक़ात कुछ अल्पसंख्यक महिलाओं से हुई जिनके पति घर लौटकर नहीं आये थे.
बाद में पता चला कि उनके पति हिरेन पंड्या की ह्त्या में अभियुक्त बनाये गए थे.
अपने समाज के लिए उन्होंने पहली लड़ाई तब लड़ी जब उन्होंने अदलात में याचिका दायर की उन दलितों के लिए जिन्हें लैंड सीलिंग एक्ट के तहत ज़मीन आवंटित तो की गई मगर उन्हें उस ज़मीन पर कभी क़ब्ज़ा नहीं मिल सका.
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