'आरएसएस का हाथ, सुब्रमण्यम स्वामी के साथ'

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भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्वीट कर भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यन को बर्खास्त करने की मांग की है. उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में सुब्रमण्यन के भारत के ख़िलाफ़ काम करने का आरोप लगाया है.
लेकिन स्वामी का सुब्रमण्यन पर निशाना साधने का असल कारण क्या है?
पढ़िए सुब्रमण्यम स्वामी और बीजेपी के रिश्तों पर वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामासेषन की राय:
बीजेपी उन्हें गंभीरता से ले या नहीं, लेकिन आरएसएस सुब्रमण्यम स्वामी को बहुत गंभीरता से लेती है. राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) यह बात भूल जाती है कि साल 1999 में यही सुब्रमण्यम स्वामी थे जिन्होंने वाजपेयी सरकार को गिराया था.
उन्होंने उस वक्त एक पार्टी का आयोजन किया था जिसमें सोनिया गांधी और जयललिता आए थे और एक तरह से उन्होंने जयललिता को एनडीए से तोड़ लिया था.
कभी वो बीजेपी का साथ देता है, कभी बाहर रहते हैं. इस लिहाज़ से उनका कोई बहुत विश्वसनीय इतिहास नहीं रहा है.
लेकिन आरएसएस की नज़रों में स्वामी बहुत बड़े अर्थशास्त्री हैं जो हावर्ड में पढ़े हैं और उन्होंने वहां पढ़ाया भी है.

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सुब्रमण्यम स्वामी जो कुछ भी करते हैं या कहते हैं, उसमें आरएसएस का समर्थन होता है. चूंकि सुब्रमण्यम स्वामी के साथ आरएसएस का हाथ है इसलिए बीजेपी को भी उनकी बात बहुत हद तक माननी पड़ती है.
अरविंद सुब्रमण्यन के ख़िलाफ़ सुब्रमण्यम स्वामी के ख़िलाफ़ ट्वीट किए और ये भी कहा कि वो मोदी सरकार की नीतियों के मुताबिक़ नहीं चल रहे हैं.
इसके बाद अरूण जेटली ने अरविंद सुब्रमण्यन का बचाव किया.
लेकिन तभी स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संयोजक अश्विनी महाजन ने ट्वीट करके कहा कि अरविंद सुब्रमण्यन को अपना पद छोड़ देना चाहिए क्योंकि उन्होंने जो रूख अपनाया है वो सरकार के ख़िलाफ़ है.
अरविंद सुब्रमण्यन ने हाल ही में कहा था कि इंडिया की जो ट्रेड पॉलिसी है वो कन्फ़्यूज़्ड है.
तब वाणिज्य और उद्योग मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) निर्मला सितारमन को बयान देना पड़ा था कि कोई कन्फ़ूयज़न नहीं है.

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भले ही जेटली अरविंद सुब्रमण्यन के योगदान को बहुत महत्वपूर्ण बता रहे हों लेकिन संभवत: ऐसी बात होने लगेगी कि सुब्रमण्यम स्वामी जो कर रहे हैं, वो सही कर रहे हैं और देश के भले के लिए कर रहे हैं.
सरकार को अपने बताए रास्ते पर रखने के लिए आरएसएस के पास राष्ट्रवाद का मज़बूत कार्ड है.
जिस तरह से अटल बिहारी वाजेपेयी ने सुब्रमण्यम स्वामी को दूर रखा था वैसा नरेंद्र मोदी शायद ना करे पाएं.
वो कभी उन्हें खुश करेंगे तो कभी नाखुश. सुब्रमण्यम स्वामी बीजेपी और सरकार से जो 'इम्पॉर्टेंस' चाहते हैं, उसका नरेंद्र मोदी पूरा ख्याल रखेंगे.
इस चक्कर में हो सकता है कि उन्हें अपने सहयोगियों को नाराज़ करना पड़े लेकिन वो सुब्रमण्यम स्वामी को नज़रअंदाज़ करने से बचेंगे.

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हो सकता है कि बीजेपी के अंदर अरूण जेटली को ना पंसद करने वाले, या उनके ख़िलाफ़ कुछ लोग, सुब्रमण्यम स्वामी का इस्तेमाल करें.
सुब्रमण्यम स्वामी व्यक्तिगत रूप से भी अरूण जेटली के प्रति खुन्नस रखते हैं क्योंकि उनका मानना है कि इतने दिनों तक बीजेपी में उनके रास्ते को अरूण जेटली ने ही रोक रखा था.
ये नरेंद्र मोदी के लिए परीक्षा की घड़ी है कि वो सुब्रमण्यम स्वामी की बात मानते हैं या अरविंद सुब्रमण्यन को अपनी जगह पर बरकरार रखते हैं.
बहरहाल, रघुराम राजन के कार्यकाल के बाद, अरविंद सुब्रमण्यन को अगला आरबीआई गवर्नर बनाने की अटकलें भी लगाई जा रही हैं.
(ये वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन के निजी विचार हैं. उनसे बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी ने बात की है.)
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