आग लगाने वाली 'नूरजहाँ दुपट्टे में..'

माचिस

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ये 1950 के दशक की माचिस है. माचिस की डिबिया पर उस ज़माने में कई फ़िल्मों की तस्वीरें होती थीं. यहाँ तक कि इन पर पाकिस्तानी फ़िल्मों को भी फ़ीचर किया जाता था. माचिस के डब्बों पर फ़िल्मों का प्रोमोशन 1950 के दशक में अपने शीर्ष पर था.

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माचिस पर भावनगर राजघराने का संकेत. हालाँकि इस पर जो संदेश दिए गए हैं उससे बहुत कुछ पता नहीं चल पा रहा है. माना जाता है कि यह माचिस राजघराने का ही था. भारत में माचिस के डब्बों के बारे में बहुत कम ही जानकारी मिल पाती है, क्योंकि उनका रिकार्ड नहीं रखा जाता था.

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अंबरनाथ और विमको माचिस अदन और बाक़ी कई अरब देशों तक निर्यात होता था. भारतीय भाषाओं में विमको लेबल के बहुत कम माचिस तैयार किए गए थे और यह बहुत दिनों तक नहीं चल सका.

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एई माचिसवाला लेबल के सल्फ़र की माचिस की डिबिया. यह कंपनी अपने ब्रांड के साथ शुरू में बंबई से माचिस का व्यवसाय करती थी. बाद में इसनें बंबई में ही माचिस उत्पादन के लिए बंबई में फ़ैक्ट्रियाँ स्थापित की. एई माचिसवाला दूसरे विश्व युद्ध के बाद तक माचिस का व्यापार करती रही.

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स्वदेशी आंदोलन की निशानी के रूप में माचिस की डिबिया पर बांग्ला में लिखा लेबल. बंगाल विभाजन के बाद ब्रिटिश वस्तुओं के बहिस्कार की अपील की गई थी. इस दौरान कई सारे वस्तुओं पर भारतीय भाषाओं में लेबल लगे होते थे और इसमें राष्ट्रीय भावना छुपी होती थी. 1920-30 के दशक में कई वस्तुओं पर लिखे गए लेबल में आज़ादी की लड़ाई के संघर्षों को देखा जा सकता था और उसमें माचिस की डिबिया भी एक थी.

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चमकते सूरज की निशानी के साथ विमको माचिस के बारह डब्बों के 'कलेक्टर्स एडिशन' का सेट. कलेक्टर्स एडिशन. 1970 और 1980 के दशक की शुरुआत में कार्डबोर्ड के माचिस के डब्बे बनाने में विमको सबसे आगे रहा था. उसने सीमति संख्या में कलेक्टर्स एडिशन तैयार किया था.

माचिस के इन डब्बों को इकट्ठा करने वाले गौतम हेमाडी का कहना है वो हमेशा से माचिस के डब्बों और उसके लेबल का संग्रह बनाना चाहते थे, लेकिन ये काम वो 2012 में ही शुरू कर पाए.

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