अमरीका तो मतलब का दोस्त है: पाक मीडिया

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमरीकी दौरे और बढ़ते भारत-अमरीका संबंधों पर पाकिस्तान के उर्दू मीडिया में काफ़ी तल्ख़ टिप्पणियां की गई हैं.
‘जंग’ लिखता है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अज़ीज़ ने रक्षा मामलों में अमरीका की तरफ़ से भारत पर नवाज़िशों की बारिश और पाकिस्तान के साथ भेदभाव वाले सलूक पर चिंता जताई है.
अख़बार के मुताबिक़ अज़ीज़ ने कहा है कि अमरीका मतलब परस्त दोस्त है जो मतलब पड़ने पर पाकिस्तान के पास आ जाता है और मतलब निलकने पर बात तक नहीं पूछता.
अख़बार लिखता है कि इस ऐतिहासिक सच को कोई नहीं झुठला सकता कि पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद सोवियत संघ जैसी सुपरपावर को नज़रअंदाज कर सात समंदर पार अमरीका से दोस्ती का हाथ बढ़ाया.
अख़बार की राय में उस वक़्त अमरीका ने भी ऐसा ही इशारा दिया था कि वो भारत के रूस समर्थक होने की वजह से उससे नाराज़ है, लेकिन बाद के हालात ने साबित किया कि वो पाकिस्तान के साथ वफ़ादार नहीं है.

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‘अमरीकी बेवफाइयों’ को गिनाते हुए अख़बार ने लिखा है कि अमरीका 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े हो जाने पर ख़ामोश रहा, कश्मीर मुद्दे पर ख़ामोश रहा, आख़िरी वक़्त तक पाकिस्तान पर परमाणु परीक्षण न करने का दबाव बनाता रहा और अब वो भारत को एनएसजी में शामिल करवाने के लिए सरगर्म है जबकि 9/11 के बाद अपने 60 हज़ार लोगों की क़ुरबानी पाकिस्तान ने दी और सवा खरब डॉलर का नुकसान सहा.
‘नवा-ए-वक़्त’ लिखता है कि मोदी के अमरीका दौरे के मौक़े पर दोनों देशों के बीच एक दूसरे की सैन्य प्रणाली इस्तेमाल करने पर बनी सहमति भी पाकिस्तान के लिए चिंता की बात है.
अख़बार के मुताबिक़ पाकिस्तान की चिंता को समझते हुए अमरीका ने अपना एक प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान भी भेजा.
‘नवा-ए-वक्त’ ने भी यह लिखा कि अमरीकी मतलब पड़ने पर आते हैं और मतलब निकलने पर छोड़ जाते हैं. लेकिन अख़बार की राय है कि इस बात के लिए अमरीका को ज़िम्मेदार ठहराने की बजाय पाकिस्तानी हुकमरानों को अपनी नीतियां राष्ट्रीय हित के मुताबिक़ बनानी चाहिए.

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रोज़नामा ‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि भारत और अमरीका के बढ़ते रिश्तों को देखते हुए लगता है कि अब इस क्षेत्र में अमरीका को पाकिस्तान की नहीं, भारत की ही ज़रूरत है.
अख़बार की राय में जिस तरह भारत पर अमरीकी नवाज़िशें जारी हैं, ऐसे में ये कहना मुश्किल नहीं है कि आने वाले समय में भारत इस क्षेत्र की बड़ी ताक़त बन जाएगा जो दरअसल अमरीका का बड़ा सहयोगी होगा.
अख़बार के मुताबिक़ भारत और अमरीका के इस गठजोड़ ने पाकिस्तान और चीन की सुरक्षा के लिए ख़तरे की घंटी बजा दी है.
अख़बार के मुताबिक़ कई विश्लेषक तो यहां तक क़यास लगा रहे हैं कि कल को अगर अमरीका ने दहशतगर्दी के ख़ात्मे की आड़ में भारतीय सरज़मीं से पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर या इस्लामाबाद के किसी इलाके में ड्रोन हमला किया तो उसे कौन रोक पाएगा.

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अन्य ख़बरों में पाकिस्तान में क़ुरान को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के फ़ैसले को रोज़नामा ‘औसाफ़’ ने अहम बताया है और ये भी कहा है कि सभी स्कूल और कॉलेज में क़ुरान की पढ़ाई अनिवार्य होगी.
अख़बार लिखता है कि अगर माता पिता बच्चों को घर पर और अध्यापक स्कूल कॉलेजों में दीन की शिक्षा देंगे तो एक साफ-सुथरा ही नहीं बल्कि अपराध और चरमपंथ से मुक्त समाज वजूद में आएगा.
वहीं ‘जसारत’ ने क़ुरान की पढ़ाई के लिए सिर्फ़ 15 मिनट का समय निर्धारित करने के लिए सरकार की आलोचना की है.
उसकी राय में इसके लिए कम से कम एक घंटा तो रखा ही जाना चाहिए.
अखबार के मुताबिक़ ये भी देखना होगा कि क्या प्राइवेट स्कूलों और ख़ासकर अंग्रेजी मीडिया स्कूलों से इस फैसले पर अमल कराएगा जाएगा जो इतने बेलगाम है कि कोई सरकारी पाबंदी नहीं मानते हैं.

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उधर ‘दुनिया’ ने पाकिस्तान में इज़्ज़त के नाम पर होने वाली हत्याओं को रोकने के क़ानून बनाने के लिए सीनेट में सत्ता पक्ष और विपक्ष की सहमति का ज़िक्र किया है.
अख़बार लिखता है कि एबटाबाद, मरी और लाहौर में हाल के दिनों में महिलाओं को ज़िंदा जलाने की घटनाएं बताती हैं कि हम सामाजिक तौर पर किस क़दर पिछड़ेपन की तरफ़ जा रहे हैं.
रुख़ भारत का करें तो ‘हमारा समाज’ का संपादकीय है- पाकिस्तान के बदलते सुर.
अख़बार लिखता है कि अमरीका के प्रति पाकिस्तान के तल्ख़ रवैये से लगता है कि वो भारत और अमरीका के बढ़ते रिश्तों से ख़ुश नहीं है.
अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान और अमरीका के रिश्तों में भले कितने उतार चढ़ाव रहे हों लेकिन पाकिस्तान के रवैये से लगता है कि भारत के साथ बातचीत के जो रास्ते खोले गए थे उनमें अचड़न आ सकती है.

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‘रोज़नामा ख़बरें’ की टिप्पणी है कि जहां प्रधानमंत्री मोदी भारत को ग़रीबी से मुक्त करने के लिए अमरीकी उद्योगपतियों से भारत में निवेश की अपील कर रहे हैं, वहीं उनके ख़ासमख़ास अमित शाह भारत को कांग्रेस मुक्त बनाने के लिए उत्तर प्रदेश में राम मंदिर के सहारे चुनाव में उतरने का इशारा दे रहे हैं.
अख़बार लिखता है कि देश को अगर किसी से मुक्ति चाहिए तो नफ़रत फैलाने वालों से, बेरोज़गारी, नशा, भुखमरी और भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहिए. लेकिन ये बुनियादी मुद्दे किसी भी पार्टी के एजेंडे में नहीं है.
वहीं ‘हिंदोस्तान एक्सप्रेस’ ने बिहार में टॉपर्स घोटाले के मद्दनेज़र राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाया और उसमें मौजूद नकल, भ्रष्टाचार और अध्यापकों की कमी जैसे मुद्दों का ज़िक्र किया है.
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