सूखे पर सरकारों के आँसू ज़्यादा काम कम

पंकजा मुंडे

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    • Author, ज्यां द्रेज
    • पदनाम, अर्थशास्त्री, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

सूखे के वक्त भारत में राहत कार्यों की लड़ी लग जाया करती थी. बड़े पैमाने पर सरकारी काम शुरू होते थे, बहुत बार एक ज़िले में एक लाख से ज़्यादा मज़दूर लगा दिए जाते थे.

काम करने से लाचार बेआसरा लोगों के लिए खाद्य-सामग्री का वितरण होता था. क़र्ज से राहत देने, पशुओं के लिए शिविर लगाने, पानी पहुंचाने जैसे राहत के कई काम होते थे.

महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान जैसे पश्चिमी राज्यों में सूखे के बीच राहत पहुंचाने की प्रणाली कहीं ज़्यादा बेहतर ढंग से विकसित हुई थी. बाकी जगहों पर भी बुनियादी ढांचा कमोबेश एक ही जैसा रहता था, भले ही इसके लागू करने में कुछ कमी रह जाए.

256 ज़िलों को सूखा-प्रभावित करार दिए जाने के बावजूद राहत-प्रदान करने के मोर्चे पर ऐसी बेचैनी इस साल नहीं दिखाई पड़ती. बेशक, सूखे की मार अपने दम पर झेल पाने की ताकत लोगों में एक सीमा तक बढ़ी है: आमदनी बढ़ी है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विविधिता पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा है और जलापूर्ति की सुविधा में भी सुधार आया है.

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ग्रामीण भारत में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना अधिनियम (नरेगा), सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), मिड डे मील तथा सामाजिक सुरक्षा पेंशन जैसे स्थाई आय-सहायक उपायों के ज़रिए सामाजिक सुरक्षा की एक ढाल भी तैयार हुई है. इससे भी सूखे के साल में किए जाने वाले राहत के विशेष उपायों पर लोगों की निर्भरता कम हुई है.

बहरहाल, इन बातों का मतलब यह नहीं कि सूखे के हालात में हस्तक्षेप करने की ज़रूरत ख़त्म हो गई है.

तेज़ आर्थिक वृद्धि के बावजूद गंवई भारत में गरीब-जन भयावह अभाव और असुरक्षा के बीच जी रहे हैं और कुछ मामलों, विशेषकर पानी की कमी के मामले में सूखे का असर पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा विकट जान पड़ता है.

बुंदेलखंड तथा अन्य जगहों से आने वाली हाल की खबरों से यह बात पुष्ट होती है कि राहत के फौरी उपाय न किए जाएं तो लाखों लोग सूखे कारण असहनीय कठिनाइयों में पड़ेंगे.

ज़रूरी हस्तक्षेप का तरीका एक हद तक बदला है. आज सूखे के हालत में भुखमरी से बचाने का सरल सा तरीका है ऊपर बताए गए स्थाई आय-सहायक उपायों में तेज़ी लाना. यानि नरेगा के अंतर्गत रोज़गार गारंटी में इजाफ़ा करना, पीडीएस के ज़रिए विशेष राशन प्रदान करना तथा स्कूलों में मिड डे मील की विशेष व्यवस्था करना.

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इतना करना पर्याप्त नहीं हो सकता तो भी शुरुआत के लिहाज़ से इसे अच्छा माना जाएगा.

लेकिन ऐसा होने के लक्षण नहीं दिख पड़ते. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2015-16 में नरेगा के तहत 230 करोड़ दिन के बराबर रोज़गार पैदा हुआ. इससे नरेगा के अंतर्गत हुआ रोज़गार सृजन एक बार फिर से उस स्तर पर जा पहुंचा है जहां वह केंद्र में नई सरकार के आने के पहले था.

नई सरकार के आने के बाद 2014-15 में नरेगा के अंतर्गत रोजगार सृजन केवल 166 करोड़ दिन के बराबर व्यक्ति-दिवसों पर सिमट गया था. बहरहाल, रोजगार सृजन में हुए इस इज़ाफ़े के लिए वित्त-मंत्रालय ने अपनी तरफ़ से कुछ नहीं दिया.

यह साल 2015-16 के आखिर में नरेगा के मद में खड़े बकाया राशि के पहाड़ (12000 करोड़ रुपये से अधिक) का नतीजा है. इसके बावजूद वित्तमंत्री ने नरेगा की राशि में साल दर साल कमोबेश ठहराव बनाए रखने की अनकही नीति (जिसकी शुरुआत यूपीए सरकार में हो गई थी) जारी रखी.

अगर पिछले वर्ष हुए रोजगार-सृजन के स्तर को इस साल भी बरकरार रखना है तो इसके लिए केंद्र को कम से कम 50,000 करोड़ रुपये ख़र्च करने होंगे जो बकाया राशि के निपटारे को मिलाकर 60,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है- जो कि एक वैधानिक दायित्व भी है क्योंकि नरेगा के मजदूरों को 15 दिनों के भीतर भुगतान पाने का हक हासिल है.

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तो भी नरेगा के लिए इस साल का बजट मात्र 38,500 करोड़ रुपये का है. जब तक केंद्र सरकार यह नहीं मान लेती कि नरेगा में और ज़्यादा रकम लगाने की ज़रूरत है, नरेगा में रोजगार सृजन को एक बार फिर सिकुड़ना ही है या फिर मजदूरी के भुगतान को कुछ समय के लिए टालना पड़ेगा.

ये दोनों ही बातें सूखे की मार वाले साल में एक और विपदा से कम नहीं, साथ ही कानून में प्रदान की गई लोगों की हक के उल्लंघन का सवाल तो है ही.

तर्क दिया जा सकता है कि सूखे में राहत प्रदान करने के लिहाज से पीडीएस नरेगा की तुलना में कहीं ज़्यादा उपयोगी साधन है. पीडीएस के अंतर्गत दिया जाने वाला मासिक राशन नरेगा के काम की तुलना में कहीं ज़्यादा नियमित और भरोसेमंद है.

इसके दायरे में कहीं ज़्यादा बड़ी ग्रामीण आबादी शामिल है- राष्ट्रीय खाद्य-सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत 75 फ़ीसदी आबादी पीडीएस के दायरे में है. भोजन की कमी और भुखमरी से बचाने के लिहाज से पीडीएस का सुव्यवस्थित संचालन एक बड़ा सुरक्षा-कवच है.

अचरज नहीं कि भुखमरी की सबसे खेदजनक ख़बरें उत्तरप्रदेश से आ रही हैं जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू करने के मामले में एकदम फिसड्डी है.

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम से जितना लाभ लेने की स्थिति में उत्तरप्रदेश है उतना कोई और राज्य नहीं. अधिनियम के लागू होने से पहले उत्तरप्रदेश की बस एक चौथाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी (बीपीएल) में पीडीएस की लाभार्थी थी.

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बाकी को कुछ भी नहीं मिलता था क्योंकि एपीएल (गरीबी रेखा से ऊपर की श्रेणी) कोटे का अनाज भ्रष्ट बिचौलिए खुले बाजार में बेच दिया करते थे और फिर, बीपीएल कार्ड भी अधिकतर सही हाथों में नहीं थे.

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम इस गड़बड़झाले को ख़त्म करने और 80 प्रतिशत ग्रामीण आबादी को सुधरे हुए पीडीएस के दायरे में लाने के लिहाज से उत्तरप्रदेश के लिए एक अवसर की तरह है, जैसा कि बहुत से गरीब राज्यों ने एक हद तक किया भी है.

दुर्भाग्य से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के बारे में उत्तरप्रदेश से आने वाली ख़बरें बेहद ख़तरनाक हालत की ओर संकेत करती हैं. हाल में मुरादाबाद, रायबरेली तथा लखनऊ ज़िले (जहां से राज्य की विधानसभा बस 23 किलोमीटर दूर है) में की गई त्वरित जांच से समान निष्कर्ष सामने आया है कि: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का कार्ड बांटा जाना बाकी है, बहुत से लोग अधिनियम के बारे में नहीं जानते और इस बीच वही गिरी-ढही व्यवस्था पहले की तरह जारी है.

तिस पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के तेवर यह कि उन्होंने गर्वोक्ति की, "हमने भोजन का अधिकार कानून लागू कर दिया है" (7 अप्रैल 2016 को उन्होंने ऑन रिकार्ड ऐसा दो बार कहा).

हैरत होती है यह सोचकर कि क्या उन्हें इस बात का भान है कि उत्तरप्रदेश में अगले साल चुनाव होने वाले हैं और क्या वे मानकर चल रहे हैं कि यही चुनाव जीतने का तरीका है. जान पड़ता है कि विपक्षी दल भी हालात को लेकर समान रूप से बेख़बर हैं.

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अन्य राज्यों में खाद्य सुरक्षा अधिनियम की स्थिति अलग-अलग है. कहीं यह एकदम सिफ़र है जैसे कि राजस्थान में जबकि कहीं स्थिति आशाजनक जान पड़ती है जैसे कि पूर्वी राज्यों में. अफ़सोस कि इन बातों पर विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा.

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के सफलतापूर्वक लागू करने से ज़्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा अभी की हालत में शायद ही कोई हो, तो भी यह मुद्दा केंद्र सरकार के राडार से ग़ायब नज़र आता है. मिसाल के लिए वित्तमंत्री ने हाल के बजट-अभिभाषण एक बार भी इसका ज़िक्र नहीं किया और न ही उन्होंने पोषण के बारे में कुछ कहा.

दरअसल केंद्र सरकार (जो प्रधानमंत्री कार्यालय की रहनुमाई में चल रही है) पीडीएस के लाभार्थियों के आधार-केंद्रित बायोमीट्रिक सत्यापन पर जोर देकर स्थिति को और ज़्यादा जटिल बना रही है.

पूरी तरह से अनुचित इस प्रौद्योगिकी ने राजस्थान में पहले ही पीडीएस का बंटाधार कर रखा है और केंद्र सरकार अपने रुख पर कायम रही तो पूरे देश में पीडीएस को बाधा पहुंचना तय है.

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भारत में पहली बार सार्वजनिक सहायता का एक मजबूत ढांचा मौजूद है जिसका सिद्धांततः सूखे के सालों में भोजन की कमी और भुखमरी रोकने के लिए विस्तार किया जा सकता है.

बहरहाल, चलन अब भी 'जो है सो है' वाला ही प्रतीत होता है और यह चलन भारी कठिनाई झेल रहे और जानोमाल का नुकसान उठा रहे लोगों को आगे और गरीबी के जाल में धकेलने वाला साबित हो रहा है.

(लेखक रांची विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में विजिटिंग प्रोफेसर हैं.)

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