फ़सल डूबी तो भी नहीं डूबेंगे किसान!

- Author, समीर हाशमी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई
भारत सरकार ने किसानों की मुश्किलें कम करने के लिए एक नई बीमा योजना शुरू की है.
कोशिश यह है कि फ़सल ख़राब होने से किसान की जान पर संकट न आ जाए. लेकिन क्या यह योजना काम कर पाएगी?
महाराष्ट्र के किसान सुधाम पगार के लिए ये बसंत भी मुश्किलें ही लेकर आया है. जनवरी में बेमौसम बरसात ने उनकी अनार की फ़सल बर्बाद कर दी थी. ये लगातार तीसरी बार है जब मौसम की वजह से उनकी फसल नष्ट हुई है.
पिछली गर्मियों में बारिश की कमी की वजह से उनका प्याज बर्बाद हो गया था.

वह कहते हैं, "घर पर खाने को भी पर्याप्त नहीं है. हमें जितना खाना चाहिए हम उसका आधा ही खाते हैं. मैं अपने बच्चों को पढ़ा नहीं सकता. मुझ पर सवा पांच लाख रुपए से ज़्यादा का कर्ज़ है. बैंक और साहूकार मुझे कर्ज़ चुकाने के लिए परेशान करते रहते हैं लेकिन मुझे समझ नहीं आता कि मैं यह करूं कैसे."
राज्य के अन्य गांवों में भी तस्वीर कुछ जुदा नहीं है. ख़ासकर अंगूर के खेतों में.
महाराष्ट्र के कई इलाक़े अंगूर की खेती के लिए मशहूर हैं. कुछ किसान इसे फल के रूप में बेचते हैं तो बाक़ी वाइन बनाने के लिए. लेकिन पिछले महीने ओला गिरने से अंगूर की फ़सल नष्ट हो गई.
जिन किसानों के पास बीमा नहीं था उनका सारा पैसा डूब गया है. यहां के ज़्यादातर किसानों के लिए यह एक डरावनी हक़ीक़त है जिनके साथ ऐसी कोई गड़बड़ होने पर किसी तरह के सुरक्षा इंतजाम नहीं हैं.

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क्या सरकार की नई बीमा योजना इस स्थिति को बदल सकती है?
अन्य बीमा योजनाओं से सस्ती और बेहतर फ़ायदे का वादा करने वाली इस बीमा योजना से देश के कम से कम आधे किसानों को फ़ायदा मिलना चाहिए.
लेकिन किसान अभी इस पर यकीन करने को तैयार नहीं हैं.
नासिक के किसान संघ के प्रमुख हंसराज वाडघुले कहते हैं, "सबसे बड़ी समस्या पुरानी बीमा योजनाएं हैं. भारी प्रीमियम देने के बावजूद सिर्फ़ पांच से दस फ़ीसदी किसानों को ही मुआवज़ा मिला था. ज़रूरी यह है कि नई योजना की शर्तें किसानों के हित में हों और जब उन्हें नुक़सान हो तो बिना किसी झंझट के उन्हें पूरा पैसा मिल जाए. तभी हमारे लिए इस योजना का कोई मतलब है."

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भारत ने इस बीमा योजना के लिए 52.94 अरब रुपए से ज़्यादा का प्रावधान किया है. और इसे चलाने वाले बैंक और बीमा कंपनियों को यक़ीन है कि इस बार यह सफल होगी.
एचडीएफ़सी, ग्रामीण बैंकिंग के भारत प्रमुख असीम ध्रू कहते हैं, "उन्होंने इस योजना को इस मायने में बहुत सरल बना दिया है कि उनका कहना है कि जिस भी किसान ने बैंक से लोन लिया है उसे ये बीमा योजना लेनी ही होगी."
"दूसरी बात यह है कि उन्होंने पूरा बीमा किसी एक बीमा कंपनी को नहीं दिया है. इसलिए बीमा कंपनियों ने बोली लगाकर राज्यवार प्रोजेक्ट ले लिए हैं ताकि वह ज़मीनी स्तर पर सेवा देना सुनिश्चित कर सकें. तीसरी बात है कि तकनीक का इस्तेमाल कर दावों को तुरंत निपटाने को कहा गया है."
यह नई योजना जल्द ही शुरू की जाएगी.

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और तमाम आशंकाओं के बावजूद किसान शिद्दत से ऐसे किसी समाधान की राह तक रहे हैं तो उनके आर्थिक बोझ को कम कर सके.












